
आगरा। ‘मैं अपने लिए, अपनों के लिए हूं’ ध्येय वाक्य को अपने जीवन में उतारने वाले महान समाज सेवक चंडिकादास अमृतराव देशमुख जो बाद में नानाजी देशमुख कहलाए, का मोहब्बत की नगरी आगरा से बेहद खास नाता रहा है। आज भी संघ से जुड़े हुए पुराने लोग नानाजी देशमुख और पंडित दीन उपाध्याय की मुलाकात की गवाह बनी ताजनगरी से जुड़े उनकी यादों को सहेजे हुए हैं।
नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के कडोली नामक छोटे से कस्बे में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका जीवन अभाव और संघर्षों में बीता। छोटी सी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया इसके बाद उनके मामा ने लालन-पालन किया। उन्हें पढ़ाई के लिए रुपए भी सब्जी बेचकर जुटाने पड़े। मन्दिरों में गुजर बसर करनी पड़ी। बाद में पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की।
आगरा में हुई पंडित दीन दयाल उपाध्याय से मुलाकात
1930 के दशक में वे राष्ट्रीय स्वय़ं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ गए। इसके बाद प्रचारक के तौर पर उनका कार्यक्षेत्र उत्तरप्रदेश औऱ राजस्थान रहा। 1940 में, डॉ हेडगेवार के निधन के बाद नानाजी देशमुख ने कई युवकों को आरएसएस की शाखाओं से जोड़ा। इसके बाद वे प्रचारक के रूप में उत्तरप्रदेश भेजे गये। यहां कर्मक्षेत्र के लिए सबसे पहला शहर आगरा चुना। नानाजी देशमुख आगरा प्रवास के दौरान राजामंडी स्थित संघ कार्यालय में ठहरे। यहीं उनकी मुलाकात पहली बार पंडित दीनदयाल उपाध्याय से हुई। पंडित दीन दयाल उपाध्याय से मुलाकात के बाद ही नानाजी देशमुख ने मथुरा और आगरा को संघ का बड़ा केंद्र विकसित करने का मन बनाया। आज नागपुर के बाद संघ गतिविधिय़ों के लिए आगरा और मथुरा को बड़ा केंद्र माना जाता है। ब्रज की माटी में जन्मे पंडित दीन दयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी व नानाजी देशमुख ने मिलकर आगे चलकर राष्ट्रधर्म और पाञ्चजन्य नामक दो साप्ताहिक और स्वदेश (हिन्दी समाचारपत्र) निकालने का फैसला किया। अटल बिहारी वाजपेयी को सम्पादन, दीन दयाल उपाध्याय को मार्गदर्शन और नानाजी को प्रबन्ध निदेशक की जिम्मेदारी सौंपी गयी।
जनसंघ को उत्तर प्रदेश की गली-गली में पहुंचाया
जब आरएसएस से प्रतिबन्ध हटा तो राजनीतिक संगठन के रूप में भारतीय जनसंघ की स्थापना का फैसला हुआ। माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरूजी’ ने नानाजी को उत्तरप्रदेश में भारतीय जन संघ के महासचिव का प्रभार सौंपा। नानाजी के जमीनी कार्य ने उत्तरप्रदेश में में भारतीय जनसंघ को स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी। 1957 तक जनसंघ ने उत्तरप्रदेश के सभी जिलों में अपनी इकाइयां खड़ी कर लीं। इस दौरान नानाजी ने पूरे उत्तरप्रदेश का दौरा किया, जिसके परिणामस्वरूप जल्द ही भारतीय जनसंघ उत्तरप्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गयी। उत्तरप्रदेश की बड़ी राजनीतिक हस्ती चन्द्रभानु गुप्त को नानाजी की वजह से तीन बार कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। एक बार, राज्यसभा चुनाव में कांग्रेसी नेता और चंद्रभानु के पसंदीदा उम्मीदवार को हराने के लिए उन्होंने रणनीति बनायी। 1957 में जब गुप्त स्वयं लखनऊ से चुनाव लड़ रहे थे, तो नानाजी ने समाजवादियों के साथ गठबन्धन करके बाबू त्रिलोकी सिंह को बड़ी जीत दिलायी। १९५७ में चन्द्रभानु गुप्त को दूसरी बार हार को मुँह देखना पड़ा।
समाजवादियों का साथ देकर गैर कांग्रेसी सरकार बनवाई
उत्तरप्रदेश में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि, अटल बिहारी वाजपेयी के वक्तृत्व और नानाजी के संगठनात्मक कार्यों के कारण भारतीय जनसंघ महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गया। 1976 में भारतीय जनसंघ संयुक्त विधायक दल का हिस्सा बन गया और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में सरकार में शामिल भी हुआ। नानाजी के चौधरी चरण सिंह और डॉ राम मनोहर लोहिया दोनों से ही अच्छे सम्बन्ध थे, इसलिए गठबन्धन निभाने में उन्होंने अहम भूमिका निभायी। उत्तरप्रदेश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन में विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट करने में नानाजी जी का योगदान अद्भुत रहा।
शरीर दान करने वाले पहले व्यक्ति
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की संकल्पना एकात्म मानववाद को मूर्त रूप देने के लिये नानाजी ने 1972 में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। सरस्वती शिशु मंदिर की शुरुआत की। नानाजी देश के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपना शरीर छात्रों के मेडिकल शोध हेतु दान करने का वसीयतनामा (इच्छा पत्र) मरने से काफी समय पूर्व 1997 में ही लिखकर दे दिया था। शोध क लिए उनका शव अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली को सौंप दिया गया।
Updated on:
11 Oct 2019 06:50 pm
Published on:
11 Oct 2019 06:42 pm
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