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Republic Day 2018: 69वें गणतंत्र दिवस पर ये खास कहानी आपको भी रुला देगी, देखें वीडियो

69 वें गणतंत्र दिवस पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विजय शंकर चतुर्वेदी से पत्रिका टीम ने बात की,
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आगरा

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Dhirendra yadav

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Updated: 23 Jan 2018, 4:25 PM IST

Republic Day 2018

Republic Day 2018

आगरा। 26 जनवनी को 69 वां गणतंत्र दिवस धूम धाम से मनाने की तैयारियां चल रही हैं। इस दिन सन 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था। भारत के लिये स्वतंत्रता बड़े गर्व की बात है क्योंकि विभिन्न मुश्किलों और बाधाओं को पार करने के बाद ये दिन देखने को मिला। 69 वें गणतंत्र दिवस पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विजय शंकर चतुर्वेदी से पत्रिका टीम ने बात की, तो उन्होंने एक ऐसी ही कहानी सुनाई। इस कहानी को सुनाते सुनाते, उनका दर्द भी फूट पड़ा।

यहां से शुरू हुई कहानी
ओरैया जिले के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विजय शंकर चतुर्वेदी ने बताया कि ये आजादी से पहले की बात है। उस समय इटावा सेंट्रल जेल में उन्हें बंद किया गया था। उस समय वे नाबालिग थे, इसलिए मशक्कत नहीं दी जानी चाहिए थी, लेकिन उन पर काम कराया जाता था। एक राम बांस आता था, जिससे सेर कूटने के लिए दिया जाता था, इससे रेशम बनता था। इस काम में समस्या ये थी, कि राम बांस से खुजली बहुत हो जाती थी। दिमाग खुराफाती थी, तो एक दिन खुराफात करने का मूड़ बन गया। रस्सी बनाना शुरू किया, उसी समय वॉर्डन आया, वॉर्डन ने पूछा ये क्या कर रहे हो, उसे बताया कि देख नहीं रहे, रस्सा बना रहे हैं। उसने पूछा रस्से का क्या करोगा, तो बताया कि ये रस्सा जेल से भागने के लिए बनाया जा रहा है। इतना सुनते ही वॉर्डन दौड़ता हुआ अधिकारियों के पास पहुंचा और उसने पूरा मामला उन्हें बताया।

अधिकारियों की फूल गईं सांसें
इस खबर को सुनते ही अंग्रेजी अधिकारियों की सांसें फूल गईं। वे दौड़ते हुए जेल पहुंच गए। जेल को चारों ओंर से घेर लिया गया। विजय शंकर चतुर्वेदी नाबालिग थे, फिर में उनके पैरों में बेढ़ियां डाल दी गईं। जेल में निरुद्ध अन्य लोगों ने इसे नियम विरुद्ध बताया, लेकिन अंग्रेजी अधिकारियों के आगे किसी की कोई बात नहीं चली। इसके बाद उनका नैनी जेल के लिए ट्रांसफर कर दिया गया। उस समय कैदी पैसेंटर ट्रेन से भेजे जाते थे। जेल के कुछ लोग उनके हितों के लिए भी काम करते थे, इसलिए उनके जाने की खबर, पहले ही गांव पहुंचा दी गई।

गांव पर पहुंचेते ही “इंकलाब जिंदाबाद”
उन्होंने बताया कि ट्रेन जैसे ही उनके गांव के पास स्थित फफूंद रेलवे स्टेशन पर पहुंची, तो वहां भारी संख्या में लोगों की भीड़ थी। इंकलाब जिंदाबाद की गूंज थी। ये गूंज सुनकर कैदी हैरत में पड़ गए, कि इन्हें आखिर मालूम कैसे हुआ, कि वे लोग दूसरी जेल में इस ट्रेन से भेजे जा रहे हैं। तभी विजय शंकर चतुर्वेदी ने ट्रेन से झांकरकर देखा, तो उनके माता पिता के साथ आस पास के गांव के लोग स्टेशन पर जमा हुए थे। पुत्र को बेढ़ियों में देख मां की आंखें आंसुओं से छलक पड़ीं। एक शेर की मां की आंखों में जब आंसूं आए, तो पूरा माहौल गमगीन हो गया। उन्होंने बताया कि गार्ड बार बार सीटी दी जा रही थी, लेकिन गाड़ी नहीं चल पा रही थी।

ऐसे थे देश भक्त
उन्होंने बताया कि इस दौरान गार्ड भी वहां मौजूद था, ये माहौल देख, वो भी बोल उठा, कि कास मेरा भी एक ऐसा बेटा होता, जो देश के लिए कुछ कर पाता। इस पर श्रीचतुर्वेदी ने कहा कि वे भी उनके ही पुत्र हैं। उन्होंने बताया कि उस समय लोगों में देश भक्ति की भावना थी। हमसे भी बड़े देशभक्त वो थे, जो अंग्रेजों के यहां काम करते हुए भी साइकिल पर चढ़कर जवानों के घर सूचनाएं पहुंचा दिया करते थे। नैनी सेंट्रल जेल में उन्हें तन्हाई में बंद कर दिया गया। इसके बाद उनकी मुलाकात पुरुषोत्तम दास खंडेलवाल के साथ अमर शहीद भगत सिंह के साथी शिव वर्मा, फिरोज गांधी से भी हुई।