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अलवर में प्रजामंडल से निकली थी आजादी के आंदोलन की राह

सन् 1938 में हुई थी अलवर राज्य प्रजामंडल की स्थापना भारत छोड़ो आंदोलन में भी रही अलवर की विशेष भूमिका
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अलवर

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Prem Pathak

•

Updated: 15 Aug 2020, 12:55 AM IST

अलवर में प्रजामंडल से निकली थी आजादी के आंदोलन की राह

अलवर में प्रजामंडल से निकली थी आजादी के आंदोलन की राह

अलवर. भारत की आजादी के आंदोलन का अलवर जिला भी साक्षी रहा। अलवर राज्य प्रजामंडल ने स्वतंत्रता आंदोलन की जिले में अलख जगाई। भारत छोड़ो आंदोलन में भी अलवर जिले ने खासी भूमिका निभाई। राज्य में जनजागृति के अग्रदूत पं. हरिनारायण शर्मा ने अपने परिवार का मंदिर हरिजनों के लिए खोल राज्य में तहलका मचा दिया, वहीं राज्य में किसानों का लगान वृद्धि के विरोध में नीमूचाना में किया गया आंदोलन देश भर में सनसनी फैला गया। नीमूचाना में किसानों पर हुआ नरसंहार अंग्रेजों की हुकूमत की नींव हिलाने वाला साबित हुआ। दिल्ली के निकट होने कारण ब्रिटिश भारत में होने वाले आंदोलनों की हवा के झौंकों का अलवर राज्य के वायुमंडल को प्रभावित करना स्वभाविक था। वर्ष 1923 में पं. हरिनारायण शर्मा ने अस्पृश्यता निवारण संघ, वाल्मीकि संघ और आदिवासी संघ की स्थापना की। उन्होंने खादी व स्वदेशी वस्तुओं के उत्पादन और उपयोग का प्रचार किया व नागरिक समितियों के माध्यम से सद्भावनापूर्ण वातावरण बनाया। राज्य के हर स्तर पर हिंदी समितियों का गठन कर राष्ट्र भाषा का प्रचार किया। उस दौरान शर्मा ने उन गतिविधियों को जारी रखा, जो ब्रिटिश भारत में महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम की अंग थी। इससे जनता में जागृति आई। तत्कालीन अलवर के शासक पूर्व महाराजा जयसिंह ने भी उनसे प्रभावित होकर राज्य के शासन सुधार और विकास सहित सभी महत्वपूर्ण मामलों में शर्मा का सहयोग लिया।

तब खादी टोपी व खादी वस्त्र पहन राजनीतिक अलख जगाई

उस दौरान गांधी टोपी व खादी वस्त्र अंग्रेजीराज के प्रति विद्रोह के प्रतिक बन गए थे। वर्ष 1931 में कुंजबिहारी लाल मोदी ने खादी टोपी व खादी वस्त्र पहन राज्य में राजनीतिक लहर पैदा की। उन्होंने उसी वर्ष स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में अलवर में जगह-जगह तिरंगा झंडा फहराने का सफल आयोजन किया।

शर्मा की गिरफ्तारी से अलवर की जनता में फैली उत्तेजना

अलवर में पैदा हुए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख नेता भवानीसहाय शर्मा को अप्रेल 1932 में 1818 के बंगाल रेग्यूलेशन के अंतर्गत गिरफ्तार कर अनिश्चितकाल के लिए दिल्ली में जेल में डाल दिया गया। इस घटना से अलवर राज्य की जनता में उत्तेजना फैली। शर्मा को करीब 7 साल जेल में रहने के बाद महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप कर मार्च 1939 में रिहा कराया। पूर्व महाराजा जयसिंह को देश से निर्वासित किया ब्रिटिश सरकार ने 1933 में पूर्व महाराजा जयसिंह को उनकी राष्ट्रीय गतिविधियों के कारण न केवल गद्दी से हटा दिया, बल्कि उन्हें देश से भी निर्वासित कर दिया। 19 मई 1937 को उनका संदिग्ध अवस्था में निधन हो गया। उस दौरान कुछ युवाओं ने अलवर में पुरजन विहार पर तिरंगा फहरा दिया। उसी अलवर में पहली बार आम सभा का आयोजन किया गया, जिसमें ब्रिटिश सरकार के फैसले की कटु आलोचना की गई। राज्य सरकार ने रातों रात छापा मारकर आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। इनमें प्रमुख थे हरिनारायण शर्मा, कुंजबिहारी लाल मोदी, पं. सीताराम, अब्दुल शकूर जमाली, डॉ. मुहम्मद अली व लक्ष्मीनारायण सौदागर शामिल हैं। उन्हें राजद्रोह के अपराध में विभिन्न सजाएं हुई।

तब प्रजामंडल ने फीस वृद्धि का किया विरोध

पं. हरिनारायण शर्मा और कुंजबिहारीलाल मोदी के प्रयत्नों से वर्ष 1938 में अलवर राज्य प्रजामंडल की स्थापना हुई। राज्य में उसी वर्ष सरकारी स्कूलों में फीस वृद्धि की गई। प्रजामंडल ने इस वृद्धि का विरोध कर आंदोलन छेड़ दिया। इस कारण हरिनारायण शर्मा, लक्ष्मण स्वरूप त्रिपाठी, इंद्रसिंह आजाद, नत्थूराम मोदी, राधा स्वरूप आदि कार्यकर्ता गिरफ्तार किए गए। इस आंदोलन में सरकारी स्कूल के अध्यापक भोलानाथ को राजद्रोह की प्रवृतियों के कारण राज्य सेवा से पृथक कर दिया गया। बाद में वे प्रजामंडल में शामिल हो गए। उस दौरान पुलिस ने प्रजामंडल के अलवर कार्यालय पर कब्जा कर ताला लगा दिया। प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने कार्यालय पर पुन: कब्जा कर वहां तिरंगा फहरा दिया। सरकार ने कार्यकर्ताओं पर मुकदमा चलाया, जिसमें मास्टर भोलानाथ व द्वारिकादास गुप्ता को सजा हुई।

जबरदस्ती चंदा वसूली का विरोध किया

प्रजामंडल ने 1940 में राज्य की ओर से द्वितीय विश्व युद्ध के लिए अलवर की जनता से जबरदस्ती चंदा वसूली का विरोध किया। पं. हरिनारायण शर्मा व मास्टर भोलानाथ को भारत रक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जब राज्य ने किया प्रजामंडल का दमनवर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद अलवर राज्य प्रजामंडल को फरवरी 1947 में पहली बार राज्य के दमन का शिकर होना पड़ा। प्रजामंडल ने खेड़ा मंगलसिंह में जागीरदारों के अत्याचारों के खिलाफ सम्मेलन किया। सम्मेलन में शामिल कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसका जनता ने प्रबल विरोध किया।