
Manoj Bajpayee on Makeup: बॉलीवुड अभिनेता मनोज बाजपेयी ने 'आपकी अदालत' में बातचीत के दौरान अपने करियर, संघर्ष, अभिनय, 'द फैमिली मैन', 'सत्या' और फिल्म 'बंदा' से जुड़े कई दिलचस्प किस्से शेयर किए थे। उस दौरान उन्होंने बताया कि कैसे करियर की शुरुआत में उन्हें लंबे समय तक काम नहीं मिला, कैसे अपने किरदारों को जीवंत करने के लिए उन्होंने खुद रिसर्च की। इसके साथ ही उन्होंने इस बात का भी खुलासा किया कि क्यों आज भी वो अपने चेहरे को देखना पसंद नहीं करते हैं।
जब उनसे पूछा गया कि कहा जाता है कि आप जब मेकअप करा रहे होते हैं तो शीशे में अपना चेहरा नहीं देखते? इस पर मनोज बाजपेई ने मजाकिया अंदाज में कहा, 'नहीं, बिल्कुल नहीं देखता मैं। कुछ देखने के लिए है ही नहीं, क्या देखें, जिसे देखकर खुशी मिले। इसीलिए मैंने सोचा है कि कम से कम मरने से पहले अगर कोई ऐसी टेक्नोलॉजी आ जाए, जिससे मरने से पहले अच्छा चेहरा लगाया जा सके, तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी।
अपने करियर के शुरूआती दिनों को याद करते हुए मनोज बाजपेयी ने कहा, "जब पॉकेट में पैसा नहीं हो और पेट में खाना नहीं हो, तो खोने के लिए कुछ नहीं बचता। पाने के लिए सिर्फ आसमान बचता है।" उन्होंने कहा कि यही सोच उन्हें हर मुश्किल दौर में आगे बढ़ाती रही।
इसके साथ ही मनोज बाजपेयी ने बताया कि फिल्म 'सत्या' के दौरान निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने कहा था कि मुझे राइटर्स चाहिए और जो 'बैंडिट क्वीन' में इतने सारे टैलेंट्स के साथ तुमने काम किया है अलग-अलग डिपार्टमेंट में, मुझे उस तरह के टैलेंट आप ला के दीजिए। सबसे पहले उन्होंने कहा कि मुझे एक बहुत ही क्रांतिकारी राइटर चाहिए जो नए तरीके से लिखे, तब मैं अनुराग कश्यप से मिला था। हम सब लोग यंग थे, वो मुझसे भी छोटा था। और उसके बाद उन्होंने कहा कि डायलॉग राइटर चाहिए, तो सौरभ शुक्ला मेरे बहुत अच्छा दोस्त हुआ करते थे, मैं उनको लेकर के गया।
इसके साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि 'द फैमिली मैन' के श्रीकांत तिवारी के किरदार को उन्होंने अपनी समझ से और ज्यादा वास्तविक बनाया। उन्होंने डायरेक्टर्स से कहा कि ये किरदार बनारस का रहने वाला, दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ा-लिखा और यूपीएससी पास किया हुआ है, और अब जो है इंटेलिजेंस में काम करता है। इसलिए उसकी भाषा, व्यवहार और गालियां भी उसी माहौल के मुताबिक होनी चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि बनारस में बिना गाली के बातचीत अधूरी मानी जाती है, इसलिए उन्होंने किरदार में ये सब जोड़ा। इतना ही नहीं, उन्होंने श्रीकांत तिवारी के उसकी फैमिली को लेकर किए जाने वाले बर्ताव को भी उत्तर भारतीय पिता की सोच के हिसाब से तैयार किया। उनके मुताबिक, बेटे के साथ सख्ती और पत्नी-बेटी के सामने संयम उसी किरदार की पहचान है।
मनोज बाजपेयी ने बताया कि फिल्म 'एक बंदा काफी है' की कहानी उन्हें बहुत पसंद आई, लेकिन उन्होंने निर्माताओं से पूछा कि इसका निर्देशन कौन करेगा। जब निर्माताओं ने ये फैसला उन पर छोड़ दिया तो उन्होंने युवा निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की का नाम सुझाया, जिन्होंने इससे पहले यूट्यूब सीरीज 'एस्पिरेंट्स' बनाई थी। उन्होंने कहा, 'अपूर्व पर भरोसा करना सही फैसला साबित हुआ और 'एक बंदा काफी है' मेरे करियर की बेहतरीन फिल्मों में शामिल हो गई।'
मनोज बाजपेयी ने अपने शुरुआती संघर्ष को याद करते हुए कहा कि 'बैंडिट क्वीन' में उन्होंने मान सिंह का किरदार निभाया था। उन्हें लगा था कि उनकी एक्टिंग लोगों का ध्यान खींचेगी, लेकिन फिल्म रिलीज होने के बाद पांच साल तक उन्हें कोई ढंग का काम नहीं मिला। उन्होंने बताया कि फिल्म के बाकी कलाकारों को लगातार काम मिलता रहा, लेकिन उनके हिस्से में सन्नाटा आया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और एक्टिंग के प्रति अपने जुनून को जिंदा रखा।
'बैंडिट क्वीन' के बाद काम न मिलने से लेकर 'सत्या', 'द फैमिली मैन' और 'एक बंदा काफी है' जैसी यादगार प्रोजेक्ट्स तक का मनोज बाजपेई का सफर इस बात का उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने हुनर और मेहनत पर भरोसा रखने वाले कलाकार एक दिन अपनी पहचान जरूर बना लेते हैं।