
Indian Economy: अमेरिका और ईरान के बीच पीस डील ने भारत को एक बड़ी आर्थिक राहत दी है। मिडिल ईस्ट में तनाव कम होने के साथ ही क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट आई है, जिससे महंगाई, रुपये और आयात बिल पर दबाव कम होने की उम्मीद बढ़ गई है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। एक तरफ तेल सस्ता हो रहा है, तो दूसरी तरफ कमजोर मानसून और अल नीनो की आशंका नई चिंता खड़ी कर रही है।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव खत्म होने की खबर आते ही वैश्विक बाजारों का मूड बदल गया। ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से फिसलकर 80 डॉलर के आसपास पहुंच गईं। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत जैसे देश को मिलता है, जो अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 88 प्रतिशत से ज्यादा आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में हर गिरावट सीधे सरकारी खर्च, महंगाई और विदेशी मुद्रा की मांग पर असर डालती है। तेल सस्ता होने से आयात बिल कम होगा, डॉलर की मांग घटेगी और महंगाई को काबू में रखने में मदद मिलेगी। इसी सकारात्मक माहौल का असर शेयर बाजार और रुपये पर भी दिखा। भारतीय शेयर बाजार में आज करीब 1 फीसदी की बढ़त दर्ज हुई है। जबकि रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 50 पैसे मजबूत हुआ है।
मिडिल ईस्ट में संघर्ष का असर भारत के व्यापार पर भी पड़ा था। मिडिल ईस्ट के देशों को होने वाला निर्यात प्रभावित हुआ था। इंजीनियरिंग सामान, पेट्रोलियम उत्पाद, कपड़ा, खाद्य सामग्री और केमिकल जैसे सेक्टर्स को झटका लगा था। अब हालात सामान्य होने की उम्मीद के साथ निर्यातकों को राहत मिल सकती है। शिपिंग और बीमा लागत घटने से व्यापार की रफ्तार फिर बढ़ सकती है। उद्योग जगत का मानना है कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता आने से भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर भी खुलेंगे।
हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दिख रही है, लेकिन इसका पूरा लाभ तुरंत मिलना आसान नहीं होगा। कई महीनों के तनाव के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। कुछ तेल टैंकर फंसे रहे, जबकि बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ गई थी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि युद्ध रुकने के बाद भी तेल आपूर्ति को पूरी तरह सामान्य होने में समय लगेगा। इसलिए बाजार में राहत दिखने के बावजूद जमीनी स्तर पर असर धीरे-धीरे दिखाई देगा।
जहां तेल के मोर्चे पर अच्छी खबरें हैं, वहीं मौसम से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 1 जून से 14 जून के बीच देश में सामान्य से करीब 28 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। अगर यही रुझान जारी रहा तो बारिश की कमी और बढ़ सकती है। चिंता की दूसरी वजह अल नीनो है। मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि जून से सितंबर के दौरान मध्यम से मजबूत अल नीनो की स्थिति बन सकती है। इतिहास बताता है कि ऐसे ज्यादातर वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश हुई है।
कम बारिश का सबसे पहला असर खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर दिखता है। सब्जियां, दालें और अनाज महंगे हो सकते हैं। खासतौर पर टमाटर, प्याज और आलू जैसी रोजमर्रा की चीजों के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों की आय और खर्च पर भी असर पड़ सकता है। कृषि आज भी देश के करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। बारिश कमजोर रहने पर खेती प्रभावित होगी, जिससे गांवों में खरीदारी की क्षमता घट सकती है। इसका असर एफएमसीजी, टू-व्हीलर, ट्रैक्टर और अन्य उपभोक्ता उत्पादों की मांग पर भी पड़ सकता है।
अच्छी बात यह है कि भारत पहले की तुलना में ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए ज्यादा तैयार है। जलाशयों में पानी का स्तर बेहतर है और खाद्यान्न भंडार भी मजबूत स्थिति में हैं। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार हुआ है और अर्थव्यवस्था अब पहले जितनी खेती पर निर्भर नहीं रही। फिर भी सभी राज्यों की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में सिंचाई की कमी और फसल पैटर्न के कारण जोखिम ज्यादा बना हुआ है। इसलिए आने वाले महीनों में मानसून की चाल पर सरकार और बाजार दोनों की नजर रहेगी।
अमेरिका-ईरान डील ने भारत को बाहरी मोर्चे पर राहत जरूर दी है। तेल की कीमतों में गिरावट से महंगाई और आयात लागत कम हो सकती है। लेकिन अब देश के सामने नई चुनौती कमजोर मानसून और अल नीनो के रूप में खड़ी है। आने वाले महीनों में यह तय करेगा कि भारत की अर्थव्यवस्था राहत की राह पर आगे बढ़ती है या फिर खाद्य महंगाई और ग्रामीण मांग की कमजोरी नई मुश्किलें खड़ी करती है।