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दिव्या दत्ता की ‘चिरैया’ ने उठाया बड़ा सवाल, लेकिन कहानी अब भी वहीं ‘1957’ में अटकी है

Mother India to Chiraiya: चिरैया ने वैवाहिक हिंसा, सहमति और पितृसत्ता जैसे मुद्दों को तो उठाया, लेकिन इसकी कहानी भी उसी पुराने ढर्रे पर है, जो कई दशकों से चली आ रह है। जानिए कैसे हिंदी सिनेमा अब भी ‘एक मां, दो बेटे’ वाले ढांचे से बाहर नहीं निकल पाया है।

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May 17, 2026
चिरैया सीरीज और हिंदी फिल्मों का पुराना फॉर्मूला। (फोटो सोर्स: IMDb)

Mother India to Chiraiya: इसी साल मार्च 2026 में आई बॉलीवुड एक्ट्रेस दिव्या दत्ता की वेबसीरीज 'चिरैया' ने एक महिला की जिंदगी के उस पहलू को सामने लेकर खड़ा किया है, जिस पर बात करना आज के दौर में भी जरूरी नहीं समझा जाता है। वो पहलू है 'मैरिटल रेप' यानी (शादी के बाद लड़की की मर्जी के बिना सम्बन्ध बनाना)। बता दें कि 'चिरैया' सीरीज एक ऐसे परिवार की कहानी है, जहां समाज के सामने प्रतिष्ठा है, मान-सम्मान है, लेकिन घर के अंदर औरतों को मुखिया के सामने गलत पर आवाज उठाने की मनाही है। इस घर में रिश्तों में न दिखने वाली दरारें हैं, जो धीरे-धीरे हिंसा और खामोशी में बदल जाती हैं।

चिरैया सीरीज और हिंदी फिल्मों का पुराना फॉर्मूला। (फोटो सोर्स: IMDb)

'चिरैया' सीरीज के केंद्र में एक बीवी और मुंहबोली मां है 'कमलेश' और उसके इर्द-गिर्द हैं उसका पति और देवर जिसको उसने अपने बेटे की तरह पाला है, जो उसका गुरुर है।

मुद्दा नया, पर ढांचा वही पुराना, दो बेटों की कहानी

मगर सशक्त कहानी, किरदार और औरतों से जुड़े मुद्दों पर बात कर रही दिव्या दत्ता की इस सीरीज ने दर्शकों को एक बार फिर दशकों से चले आ रहे उस परिदृश्य में खड़ा कर दिया, जहां दो बेटे हैं, जिनमें जमीन-आसमान का अंतर है। विनय जो संवेदनशील है, जिम्मेदार है, अपनी पत्नी, मां या यूं कहें कि हर औरत की इज्जत करना जानता है। वहीं, दूसरा बेटा अरुण, जो शादी और रिश्तों को अधिकार की तरह देखता है। जिसका मानना है कि शादी का मतलब है अधिकार, बिना शर्त और बिना सहमति के। 'चिरैया' की कहानी वैवाहिक हिंसा, सहमति और पितृसत्तात्मक सोच जैसे गहन मुद्दों को सामने लाती है। इसकी कहानी ये सवाल उठाती है कि क्या बच्चों की परवरिश और घर का माहौल उनके व्यक्तित्व को तय करता है?

हिंदी सिनेमा में एक पैटर्न दशकों से चल रहा है

अब जब पर्दे पर बेटों की परवरिश की बात चली है तो एक बात और सामने आती है कि हिंदी सिनेमा में एक पैटर्न दशकों से चल रहा है। ये हिंदी सिनेमा का सबसे पुराना और घिसा-पिटा फार्मूला है। और इसकी जड़ें उतनी ही गहरी हैं, जितनी आजाद भारत की पहली पीढ़ी की यादें। वो है एक मां के दो बेटे एक लायक और दूसरा नालायक। ऐसी बहुत सारी फिल्में हैं, जिनकी कहानी मां के संघर्ष और उसके दो बेटों की परवरिश की बात करती है, जैसे 'मदर इंडिया', 'दीवार', 'सुहाग', 'गंगा जमुना', और 'राम-लखन' आदि।

इस सभी फिल्मों की खासियत यही है कि इनमें एक बेटे को आदर्शवादी, मर्यादाओं का पालन करने वाला दिखाया गया है, वहीं, दूसरे बेटे को उसके विपरीत एक खलनायक या रास्ते से भटका हुआ दिखाया गया है। आइये अब एक नजर डालते हैं हिंदी सिनेमा की इसी विरासत पर…

हिंदी सिनेमा की सदियों पुरानी विरासत। (फोटो डिजाइन: notebooklm)

मदर इंडिया (1957)

इस फिल्म की कहानी एक मां राधा (नर्गिस) जिसके दो बेटे हैं के संघर्षों के चरों ओर घूमती है। इस मां का एक बेटा रामू (राजेंद्र कुमार), शालीन और कर्तव्यनिष्ठ है और दूसरा बेटा बिरजू (सुनील दत्त) एक विद्रोही और बागी स्वाभाव का है। कहानी मोड़ तब लेती है जब बिरजू डाकू बन जाता है, और अंत में मां अपने ही बेटे को खुद गोली मार देती है।

गंगा-जमुना (1961)

साल 1961 में आई इस फिल्म की भी वही कहानी है, जिसमें मां गोविंदी के दो बेटे गुंगा (दिलीप कुमार), जो जमींदार के अत्याचार से लड़ने के लिए डाकू बन जाता है और जमुना (नासिर खान) जो सच्चाई का हाथ पकड़ कर पुलिस अफसर बन जाता है। दोनों आपस में टकराते हैं।

दीवार (1975)

इसमें एक मां है सुमित्रा (निरुपा रॉय) जिसके दो बेटे हैं विजय (अमिताभ, स्मगलर) और रवि (शशि कपूर, पुलिस अफसर)। फिल्म की कहानी एक मां की बच्चों को पालने की जद्दोजहद है। बड़े होकर दोनों बेटों के विचारों में मतभेद होते हैं और दोनों के रास्ते अलग हो जाते हैं। फिल्म का "मेरे पास माँ है", डायलॉग हिंदी सिनेमा का सबसे फेमास डायलॉग है।

सुहाग (1979)

मां दुर्गा (निरुपा रॉय) के जुड़वां बेटे बचपन में बिछड़ जाते हैं। किशन (शशि कपूर) मां के साथ रहकर पुलिस अफसर बनता और अमित (अमिताभ) गलत रास्तों पर चलकर शराबी और बदमाश।

राम लखन (1989)

इसकी कहानी में मां शारदा (राखी) दो बेटों की मां है, एक राम (जैकी श्रॉफ) जो ईमानदार पुलिसवाला है और लखन (अनिल कपूर) जो मस्तमौला, लालची और भ्रष्ट पुलिसवाला) है। हालांकि, दोनों अलग-अलग रास्तों से एक ही मंजिल तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। सुभाष घई ने उसी घिसे-पिटे फॉर्मूले को नए कलेवर में पर्दे पर उतरा है।

इन फिल्मों के बारे में बात करते हुए जावेद अख्तर का एक बयान यद् आ रहा है, जब उन्होंने कहा था, ''सारी हिंदी फिल्में 'मदर इंडिया' से आती हैं। अब हालिया आई 'Chiraiya' को देखकर उनकी ये बात उतनी ही सच लगती है।"

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