
Coal Gasification Project: पश्चिमी एशिया के युद्ध और कतर संकट के बीच भारत सरकार ने विदेशी ऊर्जा की निर्भरता को खत्म करने के लिए 37,500 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दे दी है। भारत अपनी 50% से अधिक एलएनजी (LNG) और 90% मेथोनॉल के लिए विदेशों पर निर्भर है। इस कमजोरी को दूर करने के लिए सरकार ने देश के पांचवें सबसे बड़े कोयला भंडार को 'सिनगैस' (गैस) में बदलने का बड़ा फैसला लिया है। इसके तहत घरेलू कोयले की राख से निपटने के लिए स्पेशल तकनीक का इस्तेमाल कर यूरिया और ईंधन का उत्पादन यहीं किया जाएगा, जिससे भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर बनेगा।
विदेशी ताकतों और प्रतिबंधों की धमकियों के बीच सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय कैबिनेट ने 'स्कीम फॉर प्रमोशन ऑफ सरफेस कोल एंड लिग्नाइट गैसीफिकेशन प्रोजेक्ट्स' के लिए पूरे 37,500 करोड़ रुपये के फंड को मंजूरी दे दी है। इस योजना के तहत भारत अपने विशाल कोयला भंडार को 'सिनगैस' (Syngas) में बदलेगा। यह एक ऐसी गैस है जिससे खाद, केमिकल, मेथोनॉल और सिंथेटिक नेचुरल गैस बनाई जा सकती है। भारत वर्तमान समय में 20% यूरिया और 100% अमोनिया बाहर से मंगाता है।
भारत अपनी कुल जरूरत की करीब 40-50% लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) अकेले कतर से लेता है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर से आने वाली ज्यादातर गैस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर भारत पहुंचती है। यदि युद्ध के दौरान यह समुद्री मार्ग बंद हो जाता है, तो देश में गैस आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
साल 2026 की शुरुआत में ही कतर में प्रोडक्शन ठप होने से भारत के कई उद्योगों में गैस की भारी किल्लत हो गई थी। भारत के पास कच्चे तेल की तरह नेचुरल गैस का कोई बड़ा रणनीतिक रिजर्व भी नहीं है। गैस रुकने का सीधा मतलब है देश में यूरिया और खाद की किल्लत, जिससे सीधे आपकी थाली पर महंगाई का हमला होगा।
देश के पास दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार था। फिर भी भारत विदेशी गैस पर अरबों रुपये क्यों लुटा रहे था। दरअसल, कोयला चार तरह का होता है। पीट, लिग्नाइट, बिटुमिनस और एंथ्रेसाइट। भारत के पास जो कोयला है, वो बिटुमिनस और लिग्नाइट कैटेगरी का है, जिसे घटिया या लो-ग्रेड माना जाता है। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत है हाई ऐश कंटेंट यानी भारी मात्रा में राख का होना। बेहतरीन क्वालिटी का एंथ्रेसाइट कोयला भारत में ना के बराबर है। यही भारतीय कोयले की सबसे बड़ी कमजोरी है।
जब इस कोयले से गैस बनाने की कोशिश होती है, तो भारी मात्रा में निकलने वाली राख मशीनों को डैमेज कर देती है, पाइपलाइनों को ब्लॉक कर देती है और पूरा प्रोसेस फेल हो जाता है। यही वजह है कि पहले के सारे प्रयास नाकाम रहे। लेकिन अब 37,500 करोड़ के इस मिशन में ऐसी स्पेशल तकनीक और इंजीनियरिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो भारतीय कोयले की इस राख को मात दे सके।