TMC MPs join NCPI: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों ने NCPI ज्वाइन कर ली है। संविधान के दल बदल कानून से बचने के लिए टीएमसी सांसदों ने एक गुमनाम पार्टी का हाथ थामा है। अब सुप्रीम कोर्ट और लोकसभा अध्यक्ष के फैसले से तय होगा कि केवल सांसदों का समूह पार्टी बदल सकता है या मूल दल की मंजूरी जरूरी है।

TMC MPs join NCPI: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों की बगावत ने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र देकर खुद को नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय करने का दावा किया है। हैरानी की बात यह है कि NCPI देश में कहीं भी एक भी निर्वाचित सीट नहीं रखने वाली छोटी और लगभग गुमनाम पार्टी है। इस कदम के पीछे सबसे बड़ा कारण दल बदल विरोधी कानून से बचना माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या केवल सांसदों का समूह किसी दूसरी पार्टी में विलय का दावा कर सकता है, या इसके लिए मूल राजनीतिक दल की सहमति भी जरूरी होती है। यही कानूनी पेच अब इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बन गया है।
भारत में दल बदल विरोधी कानून 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था। इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया। इसका उद्देश्य आया राम, गया राम जैसी राजनीति पर रोक लगाना था, जहां विधायक और सांसद सत्ता या पद के लालच में बार-बार पार्टी बदलते थे। इस कानून के तहत अगर कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ता है या सदन में पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट करता है, तो उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है। शुरुआत में कानून में स्प्लिट यानी विभाजन की छूट थी। यदि किसी पार्टी के एक तिहाई विधायक या सांसद अलग हो जाते थे, तो उन्हें अयोग्यता से बचाव मिल जाता था। लेकिन 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए इस प्रावधान को हटा दिया गया, क्योंकि इसका दुरुपयोग बड़े पैमाने पर होने लगा था। अब केवल मर्जर यानी विलय का विकल्प बचा है।
दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल का दूसरी पार्टी में विलय होता है और उस दल के कम से कम दो तिहाई सांसद या विधायक इस विलय का समर्थन करते हैं, तो उन्हें दल बदल कानून के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। यहीं सबसे बड़ा कानूनी विवाद पैदा हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कानून की भाषा यह संकेत देती है कि दो शर्तें जरूरी हैं। पहली, मूल राजनीतिक दल का वास्तविक विलय का फैसला। दूसरी, विधायी दल यानी सांसदों या विधायकों के दो तिहाई सदस्यों की सहमति। लेकिन कई मामलों में केवल सांसदों की संख्या के आधार पर विलय का दावा किया गया है।
तृणमूल कांग्रेस के भीतर बगावत बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तेज हुई। पार्टी के कई बड़े चेहरे नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे थे। इनमें काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंदोपाध्याय, शताब्दी राय, दीपक अधिकारी, सायोनी घोष, जून मालिया, यूसुफ पठान और प्रसून बनर्जी जैसे नाम शामिल हैं। इन 20 सांसदों ने NCPI में विलय का दावा किया। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक NCPI को इसलिए चुना गया क्योंकि यह एक पंजीकृत राजनीतिक दल है, लेकिन उसकी कोई बड़ी राजनीतिक पहचान नहीं है। इससे बागियों को तकनीकी रूप से मर्जर का रास्ता अपनाने में आसानी दिखी।
बीजेपी के एक सांसद ने दावा किया कि NCPI को इसलिए चुना गया ताकि बंगाल से जुड़ाव बना रहे और पूर्वोत्तर तक राजनीतिक विस्तार का संदेश भी दिया जा सके। अगर यह विलय मान्य हो जाता है तो लोकसभा में TMC की ताकत 28 से घटकर सिर्फ 8 सीटों तक पहुंच सकती है। वहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संख्या बढ़कर 314 हो जाएगी।
इस पूरे विवाद में 2023 का महाराष्ट्र राजनीतिक संकट मामला बेहद अहम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में कहा था कि राजनीतिक दल और विधायी दल दोनों अलग इकाइयां हैं। अदालत ने साफ किया था कि केवल विधायकों या सांसदों का बहुमत किसी राजनीतिक दल की पहचान तय नहीं कर सकता। TMC इसी फैसले का हवाला देकर कह रही है कि सांसदों का समूह खुद से पार्टी का विलय घोषित नहीं कर सकता। पार्टी नेता अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कहा कि TMC एक अखंड राजनीतिक दल है और उसके भीतर किसी अलग गुट को मान्यता नहीं दी जा सकती। वरिष्ठ वकील और सांसद कपिल सिब्बल ने भी कहा कि केवल सांसद दूसरी पार्टी में नहीं जा सकते, जब तक मूल राजनीतिक दल विलय का फैसला न ले।
हालांकि मामला इतना सीधा नहीं है। 2022 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने गोवा में कांग्रेस विधायकों के बीजेपी में शामिल होने के मामले में कहा था कि यदि दो तिहाई विधायक साथ हैं तो इसे वैध विलय माना जा सकता है। अदालत ने यह जरूरी नहीं माना कि मूल राजनीतिक दल ने भी विलय का औपचारिक फैसला लिया हो। यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसी फैसले से तय होगा कि भविष्य में दल बदल कानून की व्याख्या कैसे होगी। यदि अदालत केवल दो तिहाई संख्या को पर्याप्त मानती है, तो राजनीतिक दलों में बड़े पैमाने पर टूट की संभावना बढ़ सकती है।
फिलहाल सबसे बड़ी भूमिका लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की होगी। वह पहले 20 सांसदों के हस्ताक्षर और दावों की जांच करेंगे। इसके बाद तय होगा कि यह वैध विलय है या दल बदल। जब तक फैसला नहीं आता, ये सांसद तकनीकी रूप से TMC के ही सदस्य माने जाएंगे। यानी यदि वे पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करते हैं तो उनके खिलाफ अलग से अयोग्यता की कार्रवाई हो सकती है। कानून में यह भी तय नहीं है कि स्पीकर को कितने समय में फैसला देना जरूरी है। यही वजह है कि ऐसे मामलों में लंबे समय तक संवैधानिक अनिश्चितता बनी रहती है।