
Achiever Talk: कुछ सपने मैदान पर शुरू होते हैं और संघर्ष की सीढ़ियां चढ़ते हुए इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। बालोद की फुटबॉलर किरण पिस्दा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कभी भाई की चुटकी ने उन्हें बेहतर फुटबॉलर बनने की चुनौती दी, तो कभी भारतीय टीम के कैंप से चयन न होने की निराशा ने उन्हें अपनी कमियां पहचानने के लिए मजबूर किया। उन्होंने दोनों परिस्थितियों को अपनी ताकत बनाया और आज छत्तीसगढ़ की उन चुनिंदा महिला खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
अब किरण के संघर्ष और उपलब्धियों में एक और बड़ा अध्याय जुड़ने जा रहा है। राज्य खेल अलंकरण की शुरुआत वर्ष 2007-08 में होने के बाद पहली बार किसी फुटबॉलर को शहीद राजीव पांडे पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। भारतीय महिला टीम की खिलाड़ी किरण पिस्दा को यह प्रतिष्ठित सम्मान मिलेगा। खेल दिवस के अवसर पर 29 अगस्त को रायपुर के डीडीयू ऑडिटोरियम में मुख्यमंत्री उन्हें सम्मानित करेंगे।
किरण का फुटबॉल से रिश्ता स्कूल के दिनों में शुरू हुआ। भाई के साथ फुटबॉल खेलते-खेलते इस खेल के प्रति उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। स्कूल में खेल के लिए अच्छा माहौल और बड़ा मैदान मिला, जिसने उनकी प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर दिया।
भाई जब उन्हें राष्ट्रीय टीम में चयन को लेकर चिढ़ाते थे, तो किरण ने उन बातों को दिल पर लेने के बजाय चुनौती के रूप में स्वीकार किया। यही चुटकी धीरे-धीरे उनकी प्रेरणा बन गई। उन्होंने स्कूल स्तर पर बेहतर प्रदर्शन किया और फिर छत्तीसगढ़ टीम में खेलने का मौका मिला। यहीं से उनके फुटबॉल करियर ने नई दिशा पकड़ ली।
राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने का सफर हालांकि आसान नहीं था। पहली बार इंडिया कैंप में पहुंचने के बाद किरण का चयन नहीं हुआ। यह उनके लिए निराशाजनक पल था, लेकिन इसी असफलता ने उन्हें खुद को और बेहतर तरीके से समझने का मौका दिया। किरण के मुताबिक उस समय वह मानसिक और शारीरिक रूप से भारतीय टीम के स्तर के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थीं।
चयन नहीं होने के बाद उन्होंने अपनी कमियों पर काम किया और तैयारी को नए सिरे से शुरू किया। उनके लिए यह असफलता रुकावट नहीं बनी, बल्कि कॅरियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। उन्होंने इसे जीवन का बड़ा सबक माना और आगे की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार किया।
किरण की कहानी इस बात की मिसाल है कि किसी खिलाड़ी के करियर में असफलता अंत नहीं होती। सही नजरिया हो तो वही असफलता आगे बढ़ने की सबसे बड़ी वजह बन सकती है। पहले इंडिया कैंप से बाहर होने के बाद किरण ने अपनी फिटनेस, मानसिक मजबूती और खेल की बारीकियों पर काम किया। लगातार मेहनत का नतीजा रहा कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई और भारतीय महिला टीम के साथ महत्वपूर्ण मुकाबलों का हिस्सा बनीं।
दुनिया के महान फुटबॉलरों की बात हो तो किरण के पसंदीदा खिलाड़ी लियोनेल मेसी हैं। मेसी का बॉल कंट्रोल, टच और मैदान पर खेलने की शैली उन्हें काफी प्रभावित करती है। किरण के लिए मेसी सिर्फ एक स्टार खिलाड़ी नहीं, बल्कि खेल की बारीकियों को समझने की प्रेरणा भी हैं। वह उनके खेल को देखकर अपने प्रदर्शन में सुधार की कोशिश करती हैं।
भारतीय महिला टीम का हिस्सा बनना किरण की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन उनका सपना यहीं खत्म नहीं होता। उनका लक्ष्य भारतीय महिला टीम के साथ विश्व कप खेलना और देश के लिए शानदार प्रदर्शन करना है। उनका मानना है कि खिलाड़ी को हर उपलब्धि के बाद अगला लक्ष्य तय करना चाहिए। यही सोच उन्हें लगातार बेहतर करने के लिए प्रेरित करती है।
भारतीय महिला टीम के साथ किरण ने कई महत्वपूर्ण मुकाबलों का अनुभव हासिल किया है। इनमें AFC Qualification उनके करियर के सबसे यादगार पड़ावों में से एक है। इस अभियान में भारतीय टीम ने 22 साल बाद AFC के लिए क्वालीफाई किया। थाईलैंड में घरेलू टीम के खिलाफ मुकाबला और उस ऐतिहासिक अभियान का हिस्सा बनना किरण के लिए बेहद खास अनुभव रहा।
उस दौरान टीम की एकजुटता और विश्व कप में खेलने का सपना हर खिलाड़ी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा था। किरण के लिए यह सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि भारतीय महिला फुटबॉल के बड़े सपने का हिस्सा बनने का अनुभव था।
किरण का मानना है कि खिलाड़ियों के लिए खेल के साथ शिक्षा भी जरूरी है। उन्होंने ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है और आगे की पढ़ाई भी जारी रख रही हैं।उनका कहना है कि खिलाड़ी को अपने खेल के साथ पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि शिक्षा भविष्य के लिए मजबूत आधार देती है। यह सोच उन्हें सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार युवा के रूप में भी अलग पहचान देती है।
भाई की चुटकी से शुरू हुई चुनौती, पहले इंडिया कैंप में चयन न होने का झटका और फिर राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने का सफर, किरण पिस्दा की कहानी संघर्ष और आत्मविश्वास की कहानी है। अब शहीद राजीव पांडे पुरस्कार से सम्मानित होना उनके करियर की एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन किरण की नजर अगले लक्ष्य पर है, भारतीय महिला टीम के साथ विश्व कप खेलना और देश का प्रतिनिधित्व करना। उनकी कहानी बताती है कि मैदान पर जीत सिर्फ स्कोर से तय नहीं होती। कई बार असली जीत उस खिलाड़ी की होती है, जो हार और निराशा के बाद भी दोबारा मैदान में उतरने का साहस रखता है।