
Black Magic Cases @गोविंद ठाकरे: छत्तीसगढ़ में जादू-टोने और अंधविश्वास के नाम पर होने वाली घटनाएं समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। नवरात्र से ठीक पहले आरंग क्षेत्र में जादू-टोने के शक में दोहरे हत्याकांड की घटना ने एक बार फिर इस मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। ऐसी घटनाएं न केवल कानून-व्यवस्था, बल्कि समाज की सोच और जागरूकता पर भी सवाल उठाती हैं। जरूरत इस बात की है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के साथ-साथ घटना के लिए उकसाने वालों की भी पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।
इक्कीसवीं सदी में विज्ञान और तकनीक तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद अंधविश्वास के कारण लोगों की जान जाने की घटनाएं चिंता का विषय हैं। छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताड़ना के खिलाफ कानून मौजूद है, फिर भी लोगों को जादू-टोने के शक में प्रताड़ित किए जाने के मामले सामने आते रहते हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक लोग अंधविश्वास और लालच के जाल में फंसते रहेंगे?
अंधश्रद्धा के खिलाफ जागरूकता फैलाने के प्रयास अभी भी व्यापक स्तर पर किए जाने की जरूरत है। कई बार उचित चिकित्सा सुविधाओं और वैज्ञानिक सोच की कमी के कारण लोग बीमारी या दूसरी समस्याओं के समाधान के लिए गुनिया, कथित तांत्रिकों और बाबाओं का सहारा लेने लगते हैं। इसी स्थिति का फायदा उठाकर कुछ लोग डर और चमत्कार के नाम पर लोगों को गुमराह करते हैं। इसका सबसे गंभीर असर महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों पर पड़ता है।
अंधविश्वास के साथ जब लालच जुड़ जाता है, तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं। कहीं लोगों को जादू-टोने का डर दिखाया जाता है, तो कहीं रकम को कई गुना बढ़ाने या रातोंरात अमीर बनाने का लालच दिया जाता है। ऐसे मामलों में ठगी के साथ गंभीर अपराध होने का खतरा भी रहता है। इसलिए कथित चमत्कारों और तंत्र-मंत्र के दावों की आड़ में होने वाली गतिविधियों की जांच जरूरी है।
कोरबा में सामने आई एक घटना में कथित तौर पर पांच लाख रुपये को करोड़ों में बदलने का लालच दिया गया था। इस मामले में एक फार्म हाउस के बंद कमरे में तीन लोगों की मौत होने की बात सामने आई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, उनके गले में फंदा डालकर खींचे जाने की बात भी सामने आई थी। यह घटना बताती है कि अंधविश्वास और आर्थिक लालच का मेल कितना खतरनाक हो सकता है। ऐसे मामलों में अपराध के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए निष्पक्ष और गहन जांच जरूरी है।
कथित तांत्रिकों को प्रभावशाली लोगों से संरक्षण मिलने के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में यदि किसी तरह की मिलीभगत या साजिश की आशंका हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन जांच के दौरान सभी पहलुओं और संभावित जिम्मेदार लोगों की भूमिका की पड़ताल जरूरी है।
छत्तीसगढ़ को अंधविश्वास के इस दंश से मुक्त करना केवल पुलिस और कानून की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए समाज, प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षण संस्थानों और जागरूकता फैलाने वाली संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा। लोगों तक वैज्ञानिक सोच और सही जानकारी पहुंचाना, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना तथा अंधविश्वास के नाम पर होने वाले अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कितने निर्दोष लोगों की जान जाने के बाद समाज अंधविश्वास के खिलाफ मजबूती से खड़ा होगा? जब तक डर, लालच और कथित चमत्कारों के बजाय विवेक, तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को महत्व नहीं दिया जाएगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल रहेगा। जरूरत एक व्यापक सामाजिक और कानूनी मुहिम की है, ताकि किसी भी व्यक्ति को जादू-टोने के शक में प्रताड़ित न किया जाए और अंधविश्वास के नाम पर होने वाले अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।