
क्या है 22 साल पुराना हनुमानगढ़ी नमाज विवाद (फोटो- पत्रिका)
Hanuman Garhi Namaz Controversy: उत्तर प्रदेश के अयोध्या स्थित प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर में नमाज पढ़ने का मुद्दा एक बार फिर से सुर्खियों में आ गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या में एक जनसभा के दौरान विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए 22 साल पुराने मामले 'हनुमानगढ़ी नमाज विवाद' का भी जिक्र किया। अब सवाल यह है कि क्या वाकई कभी हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ी गई थी? आइए विस्तार से जानते हैं इस पूरे विवाद का सच क्या है और 22 साल पहले आखिर अयोध्या में हुआ क्या था?
सीएम योगी ने मंच से सवाल उठाते हुए विपक्ष को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कांग्रेस और सपा के नेताओं से पूछा कि क्या वे कभी जामा मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ करा सकते हैं? योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अगर वे ऐसा नहीं कर सकते तो फिर उन्होंने अयोध्या में यह पाप क्यों किया? सीएम ने कहा कि जो लोग आज बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं और राम भक्ति का दिखावा कर रहे हैं। यह वही लोग हैं जिन्होंने अपने समय में हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाई थी। ऐसे दलों ने हमेशा से बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है।
यह पूरा मामला आज से करीब 22 साल पहले यानी साल 2003 का है। उस समय रमजान का पवित्र महीना चल रहा था। अयोध्या में सांप्रदायिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देने के लिए एक बड़ी पहल की गई थी। हनुमानगढ़ी के तत्कालीन और चर्चित महंत ज्ञान दास ने मुस्लिम समाज के रोजेदारों के लिए एक रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। इस आयोजन को लेकर उस वक्त पूरे देश में काफी चर्चा हुई थी। यह आयोजन नमाज तक सीमित नहीं था, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने की एक कोशिश थी।
इस इफ्तार पार्टी में राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद के मुख्य पैरोकार रहे हाशिम अंसारी सहित अयोध्या के कई बड़े मुस्लिम चेहरे शामिल हुए थे। रोजा खोलने के बाद मगरिब की नमाज अदा करने का समय हो गया था। जिसके चलते इफ्तार के बाद हनुमानगढ़ी परिसर से सटी जगह और मंदिर की सीढ़ियों पर ही नमाज अदा की गई थी। उस वक्त महंत ज्ञान दास ने इसे सांप्रदायिक सौहार्द की पहल बताया था।
बता दें अयोध्या के राम जन्मभूमि विवाद के दौरान महंत ज्ञान दास को हमेशा संवाद और शांति की राजनीति करने वाले प्रमुख संतों की श्रेणी में गिना जाता था। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष पद की अहम जिम्मेदारी संभाल चुके महंत ज्ञान दास शुरू से ही राम मंदिर मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के पक्षधर रहे। उनका कहना था कि हमें खून के दाग से बना राम मंदिर नहीं चाहिए, बल्कि आपसी प्रेम से बनने वाला मंदिर चाहिए।
महंत ज्ञान दास और हाशिम अंसारी की इस पहल का उस वक्त कुछ लोगों ने स्वागत किया था, लेकिन विश्व हिंदू परिषद (VHP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़े कई नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया। विरोध करने वालों का तर्क था कि मंदिर परिसर या उसकी सीढ़ियों पर किसी अन्य धर्म की इबादत करना या नमाज पढ़ना मंदिर की पवित्रता और परंपराओं के सख्त खिलाफ है। इसी विरोध के चलते यह सद्भावना का आयोजन एक बड़े राजनीतिक और धार्मिक विवाद में तब्दील हो गया था।
हनुमानगढ़ी के ही एक अन्य महंत धर्मदास ने इस पूरे मामले को अदालत में चुनौती दी। जिसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में इस मामले पर लंबी सुनवाई हुई। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलों और मंदिर की धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए हनुमानगढ़ी परिसर के अंदर भविष्य में रोजा इफ्तार आयोजित करने पर पूरी तरह रोक लगा दी। बताया जाता है कि 2005 तक इस मुद्दे को लेकर काफी तनाव पैदा हो गया था। बढ़ते विवाद के बाद खुद महंत ज्ञान दास ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अब भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में इस तरह का आयोजन नहीं कराया जाएगा।
भले ही इस घटना को दो दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में आज भी इसकी गूंज गाहे-बगाहे सुनाई दे जाती है। जब भी राजनीतिक दल एक-दूसरे पर तुष्टिकरण की राजनीति या धर्मनिरपेक्षता को लेकर आरोप लगाते हैं तो इस घटना का जिक्र जरूर होता है। सीएम योगी का हालिया बयान भी इसी 22 साल पुरानी राजनीतिक बहस का एक हिस्सा है जिसने 2003 की उस घटना की यादों को एक बार फिर से ताजा कर दिया है।
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Updated on:
10 Jul 2026 07:53 pm
Published on:
10 Jul 2026 07:53 pm
