
संघर्ष से अपनी अलग पहचान बना रहे धनंजय (photo source- Patrika)
Business Story: बालोद के बुधवारी बाजार में हर बुधवार और रविवार को खास रौनक देखने को मिलती है। बाजार में जहां अलग-अलग तरह की दुकानें और ठेले लोगों को आकर्षित करते हैं, वहीं एक छोटा सा ठेला ऐसा भी है, जहां छत्तीसगढ़ के पारंपरिक स्वाद की खुशबू लोगों को अपनी ओर खींचती है। इस ठेले पर घर में तैयार किए गए चना, मुर्रा, चिप्स, मिक्चर और कई तरह के पारंपरिक खाद्य पदार्थ मिलते हैं।
इस कारोबार को बालोद के मरार पारा निवासी धनंजय ढीमर संभालते हैं। खास बात यह है कि धनंजय इस व्यवसाय की तीसरी पीढ़ी हैं। उनके परिवार को इस काम से जुड़े हुए 30 साल से भी ज्यादा समय हो चुका है। आज भी वह अपने परिवार की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए लोगों तक वही पुराना स्वाद पहुंचा रहे हैं।
धनंजय के ठेले पर बाजार में मिलने वाले सामान्य पैकेटबंद स्नैक्स के बजाय घर में तैयार किए गए कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ मिलते हैं। इनमें मुरकु, पापड़, सादा मुर्रा, फ्राई मुर्रा, नड्डा, मिक्चर, पापड़ी और चिप्स प्रमुख हैं। इसके अलावा फूटा चना, जिसे छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में खैरी चना के नाम से भी जाना जाता है, लोगों को खूब पसंद आता है। हरा मटर चना, पीला चना और भूंजा मूंगफली भी उनके ठेले की खास पहचान हैं। इन सामानों की खासियत सिर्फ उनका स्वाद नहीं है, बल्कि इन्हें तैयार करने का तरीका भी परिवार की पुरानी परंपरा से जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि बाजार में आने वाले कई ग्राहक उनके ठेले से पारंपरिक स्नैक्स खरीदना पसंद करते हैं।
बारिश के मौसम में चटपटे और कुरकुरे नाश्ते की मांग बढ़ जाती है। धनंजय बताते हैं कि इस मौसम में उनके यहां फूटा चना और मिक्चर की बिक्री सबसे ज्यादा होती है। बुधवारी बाजार में खरीदारी के लिए आने वाले लोग इन चीजों को नाश्ते के तौर पर खरीदकर ले जाते हैं। कई ग्राहकों के लिए ये सिर्फ खाने की चीजें नहीं, बल्कि पुराने स्वाद और बचपन की यादों से जुड़ा हिस्सा भी हैं। बाजार में इस तरह के पारंपरिक खाद्य पदार्थों की मौजूदगी स्थानीय स्वाद और खान-पान की पुरानी परंपरा को भी जिंदा रखे हुए है।
धनंजय की कहानी सिर्फ एक छोटे कारोबारी की कहानी नहीं है, बल्कि संघर्ष और जिम्मेदारी की भी कहानी है। उन्होंने बताया कि एक समय वह कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे। उनके भी सपने थे और वह अपनी पढ़ाई पूरी कर आगे बढ़ना चाहते थे। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। दूसरी ओर उनके पिता अकेले इस कारोबार को संभालने में मुश्किल महसूस कर रहे थे। ऐसे समय में धनंजय के सामने परिवार और अपने भविष्य के बीच फैसला लेने की स्थिति आई।
आखिरकार उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़कर परिवार की जिम्मेदारी संभालने का फैसला किया। यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था। पढ़ाई छोड़ना उनके सपनों से समझौता था, लेकिन परिवार की जरूरत उनके लिए ज्यादा बड़ी थी। उन्होंने पिता के साथ कारोबार में हाथ बंटाना शुरू किया और धीरे-धीरे इसी काम को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया।
समय के साथ धनंजय के पिता का निधन हो गया। इसके बाद परिवार के इस पुश्तैनी कारोबार की पूरी जिम्मेदारी धनंजय के कंधों पर आ गई। जिस काम को कभी उनके पिता संभालते थे, आज उसी की पूरी बागडोर वह खुद संभाल रहे हैं। धनंजय कहते हैं कि पुश्तैनी काम होने का मतलब यह नहीं कि इसमें मेहनत की जरूरत नहीं होती। कारोबार को चलाने के लिए रोज मेहनत करनी पड़ती है। ग्राहकों का भरोसा बनाए रखना और सामान की गुणवत्ता बरकरार रखना उनके लिए सबसे जरूरी है।
धनंजय के मुताबिक बुधवारी बाजार में उनके ठेले से एक दिन में करीब 7 से 8 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है। हालांकि यह कमाई हर दिन एक जैसी नहीं होती और बिक्री बाजार, मौसम और ग्राहकों की संख्या पर निर्भर करती है। जिस परिवार के लिए कभी आर्थिक स्थिति इतनी चुनौतीपूर्ण थी कि धनंजय को पढ़ाई तक छोड़नी पड़ी, आज उसी पुश्तैनी कारोबार से परिवार को आर्थिक सहारा मिल रहा है। धनंजय ने हालात को अपनी कमजोरी बनने देने के बजाय उसे जिम्मेदारी में बदल दिया।
धनंजय के ठेले की सबसे खास बात यह है कि यहां सिर्फ खाद्य पदार्थ नहीं बिकते, बल्कि तीन पीढ़ियों की मेहनत और परंपरा भी साथ चल रही है। उनके परिवार ने जिस काम की शुरुआत वर्षों पहले की थी, उसे अब धनंजय आगे बढ़ा रहे हैं। बदलते दौर में जहां लोग आधुनिक और पैकेटबंद स्नैक्स की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं धनंजय जैसे छोटे कारोबारी आज भी घर में तैयार पारंपरिक खाद्य पदार्थों के स्वाद को जिंदा रखे हुए हैं। उनकी कहानी यह भी बताती है कि सफलता हमेशा बड़ी दुकान, बड़ी कंपनी या बड़े निवेश से नहीं मिलती।
कभी-कभी परिवार की जिम्मेदारी उठाकर शुरू किया गया छोटा सा काम भी इंसान को अपनी पहचान दे सकता है। धनंजय के लिए यह कारोबार सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि उनके पिता की विरासत और परिवार की तीन पीढ़ियों की मेहनत का हिस्सा है। आज वह उसी विरासत को अपने हाथों से संभाल रहे हैं और बुधवारी बाजार आने वाले लोगों तक छत्तीसगढ़ के पारंपरिक स्वाद को पहुंचा रहे हैं।
Updated on:
20 Aug 2026 11:39 am
Published on:
20 Aug 2026 11:39 am
