
मानवता के विकास के लिए स्वार्थवृत्ति का करें त्याग
मैसूरु. सुमतिनाथ जैन संघ के महावीर भवन में जैनाचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि जीवन में मानवता के विकास के लिए स्वार्थवृत्ति का त्याग अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि जहां स्वार्थान्धता है वहा मांत्र स्व के सुख-दुख का ही विचार और प्रयत्न होगा और जहां निस्वार्थ वृत्ति होगी, वहां स्व का नहीं, सर्व के सुख दुख का विचार होगा।
अतिथि सत्कार और दीन अनुकम्पा भारतीय संस्कृति के प्राण हैं। भारतीय संस्कृति के प्रचीन इतिहास पर दृृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि इस संस्कृति के अनेक महान सपूतों ने स्व प्राणों का बलिदान देकर भी अन्य जीवों की रक्षा की है। रविवार को सुबह 9.15 बजे सन्नारी के आदर्श गुण विषय पर प्रवचन होगा।
आनंद सागर की जयंती मनाई
बेंगलूरु. नाकोड़ा पाŸवनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर राजाजीनगर में आचार्य आनंदसागर की जयंती मनाई गई। मुनि अभिनंदन चंद्र सागर ने कहा कि आज जिनशासन के पास आगमों की जो बदौलत है उसके पीछे आचार्य की अहम भूमिका है। आगम की प्रति प्राप्त करना, दुर्लभ था, वैसे समय में उन्होंने आगम का अभ्यास किया।
आदमी चला जाता है, नाम रह जाता है
बेंगलूरु. आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर जयनगर में आचार्य कुमुद नंदी ने कहा कि आज का विद्यार्थी कल का प्रोफेसर बन सकता है। हर विद्यार्थी ग्रेजुएट हो सकता है। आज भले बालक केजी में पढ़ रहा, बड़ा होकर आइएएस, आइपीएस बन सकता है। आज का सेवक कल मालिक बन कता है। हर प्राणी के पास परमात्मा बनने की योग्यता है, मां के पेट से मिला शरीर, पुरुषार्थ करके परमात्मा बन सकता है। संगीतकार चला जाता है संगीत रह जाता है। गीतकार चला जाता है गीत रह जाता है।
आदमी चला जाता है नाम रह जाता है। यदि साधु मुनि साधक स्वयं में मजबूत हो तो स्वर्ग की अप्सराएं भी उसे प्रभावित नहीं कर सकतीं। वासना में आकर्षण है मन के मार्ग से विकार शरीर में प्रवेश करते हैं। भौतिक सामान के माध्यम से मन फंसता है।
Published on:
12 Aug 2018 06:46 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
