
भाजपा की जीत का जश्न मनाते हुए। फोटो: पत्रिका
बाड़मेर। नगर परिषद चुनाव में भाजपा ने 15 साल का वनवास खत्म कर स्पष्ट बहुमत हासिल किया और लंबे समय से चले आ रहे कांग्रेस के दबदबे को एक झटके में पलट दिया। वहीं कांग्रेस तीन लगातार बोर्ड के बाद चौका लगाने से चूक गई। नतीजों ने साफ किया कि निकाय चुनाव में प्रत्याशियों के साथ संगठन की एकजुटता और रणनीति भी जीत-हार तय करती है। भाजपा ने चुनाव से पहले ही मैदान तैयार करना शुरू कर दिया था। सर्वे के आधार पर प्रत्याशियों का चयन किया गया और जातिगत समीकरण साधने की कोशिश की गई। टिकट वितरण के बाद सामने आए बागियों और असंतुष्टों को मनाने में भी पार्टी काफी हद तक सफल रही। चुनाव प्रचार में संगठन एकजुट नजर आया।
मंत्री केके बिश्रोई, जिलाध्यक्ष अनंतराम, विधायक डॉ. प्रियंका चौधरी, आदूराम मेघवाल, पूर्व जिलाध्यक्ष स्वरूपसिंह खारा, दिलीप पालीवाल, महामंत्री महावीरसिंह चूली और रमेशसिंह इंदा सहित प्रमुख नेता अलग-अलग खेमों के बजाय एक साथ मैदान में दिखाई दिए। प्रदेश में भाजपा सरकार का असर भी रहा। वहीं बाड़मेर में कांग्रेस के 15 साल के बोर्ड के दौरान भ्रष्टाचार को भाजपा ने प्रमुख मुद्दा बनाया, जो चुनावी माहौल में प्रभावी रहा।
कांग्रेस में चुनावी तैयारियों के साथ खेमेबाजी भी सामने आने लगी। टिकट वितरण से पहले पूर्व विधायक मेवाराम जैन को अपनी पसंद के प्रत्याशियों के लिए पीसीसी तक जाना पड़ा। इसके बाद उनके कई समर्थकों के टिकट कटने से असंतोष और गहरा गया। नामांकन तक मेवाराम जैन काफी हद तक अमूल अकेले नजर आए। बाद में कुछ नेताओं ने साथ दिया, लेकिन तब तक खेमेबाजी की लकीर खिच चुकी थी। चुनाव प्रचार में मेवाराम जैन ने पूरी ताकत झोंकी, लेकिन पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं की एकजुट सक्रियता नजर नहीं आई। निर्दलीयों और बागियों को साधने में भी कांग्रेस सफल नहीं हो पाई। कई वार्डों में टिकट से नाराज दावेदार मैदान में उत्तर गए और कांग्रेस के वोटों में सेंध लगी। जिलाध्यक्ष लक्ष्मणसिंह गोदारा समेत कई नेता अलग नजर आए। ऐसे में संगठन का बिखराव कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया।
1. सर्वे के बाद टिकटः चुनाव से पहले सर्वे करवाकर प्रत्याशियों के चयन में जातिगत समीकरणों को साधने की कोशिश की गई।
2. संगठन की एकजुटता : टिकट वितरण के बाद असंतोष और बगावत को नियंत्रित किया गया। बड़े नेता एक मंच पर नजर आए।
3. सरकार का फैक्टर: प्रदेश में भाजपा सरकार होने का लाभ पार्टी ने चुनाव प्रचार में लिया।
4. 15 साल के बोर्ड का मुद्दा : कांग्रेस के लगातार 15 साल के बोर्ड के दौरान भ्रष्टाचार को भाजपा ने प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया।
5. नेताओं की सामूहिक सक्रियता : मंत्री, विधायक, जिलाध्यक्ष और पूर्व पदाधिकारी सहित संगठन के प्रमुख नेता चुनाव में सक्रिय रहे।
1. शुरुआत से गुटबाजी : टिकट वितरण से पहले ही कांग्रेस में खेमेबाजी सामने आ गई थी।
2. टिकट वितरण का विवाद : पूर्व विधायक मेवाराम जैन को पीसीसी तक जाना पड़ा। टिकट कटने और पसंद के प्रत्याशियों को टिकट नहीं मिलने से असंतोष बढ़ा।
3. बागी और निर्दलीय: टिकट नहीं मिलने से नाराज प्रत्याशियों और निर्दलीयों को साधने में कांग्रेस सफल नहीं हो पाई। कई वार्डों में इसका सीधा असर परिणाम पर पड़ा।
4. प्रचार में एकजुटता का अभाव : चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के सभी दिग्गज एक साथ मैदान में नजर नहीं आए। इससे कार्यकर्ताओं में भी स्पष्ट संदेश नहीं गया।
5. दो खेमों का असर: पूर्व विधायक मेवाराम जैन और जिलाध्यक्ष लक्ष्मणसिंह गोदारा सहित नेताओं के बीच खिंचाव चुनाव तक बना रहा। संगठन का पूरा तंत्र एकजुट होकर मैदान में नहीं उतर पाया।
| वर्ष | कुल वार्ड | भाजपा | कांग्रेस | निर्दलीय | बोर्ड |
|---|---|---|---|---|---|
| 1994 | 35 | 19 | 0 | 16 | भाजपा |
| 1999 | 35 | 12 | 19 | 4 | कांग्रेस |
| 2004 | 35 | 27 | 5 | 3 | भाजपा |
| 2009 | 40 | 15 | 22 | 3 | कांग्रेस |
| 2014 | 40 | 16 | 19 | 5 | कांग्रेस |
| 2019 | 55 | 18 | 33 | 4 | कांग्रेस |
| 2026 | 55 | 29 | 21 | 5 | भाजपा* |
2009 में कांग्रेस ने भाजपा से बोर्ड छीन लिया था। इसके बाद 2014 और 2019 में भी कांग्रेस बोर्ड बनाने में सफल रही। यानी लगातार तीन चुनाव में कांग्रेस का दबदबा कायम रहा। लेकिन 2026 में भाजपा ने एक ही चुनाव में पूरा समीकरण बदल दिया। 2019 में कांग्रेस ने 55 में से 33 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को 18 और निर्दलीयों को चार सीटें मिली थीं। पांच साल बाद तस्वीर पूरी तरह उलट गई। भाजपा 29 सीटों के साथ सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी, जबकि कांग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई। निर्दलीयों की संख्या चार से बढकर पांच हो गई।
Updated on:
15 Sept 2026 09:04 am
Published on:
15 Sept 2026 09:04 am
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