
धान की फसल (Photo-IANS)
CG News: बेमेतरा जिले में इस वर्ष औसत से कम वर्षा होने के कारण भूजल स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। भूगर्भ वैज्ञानिकों ने भी जिलेवासियों को भूजल के अंधाधुंध दोहन से बचने की सलाह दी है। इसी पृष्ठभूमि में जिले की 425 ग्राम पंचायतों ने सर्वसम्मति से आगामी रबी सीजन में ग्रीष्मकालीन धान की खेती न करने का प्रस्ताव पारित किया है।
बता दें कि इस साल 39 प्रतिशत से कम वर्षा हुई। सबसे खराब स्थिति बेमेतरा तहसील की रही। जिले में इस वर्ष औसतन केवल 557 मिमी वर्षा हुई, जो पिछले 10 वर्षों के औसत 906 मिमी से लगभग 39 प्रतिशत कम है। 9 तहसीलों में से बेमेतरा तहसील की स्थिति सबसे गंभीर रही, जहां सिर्फ 483 मिमी वर्षा दर्ज की गई। अन्य तहसीलों में भिभौरी में औसत का 48%, दाढ़ी 53%, बेरला व देवकर 59%, नवागढ़ 62%, नांदघाट 73%, साजा 75% और थानखम्हरिया में 90% बारिश हुई। कुल मिलाकर जिले में औसत के मुकाबले केवल 61.5 प्रतिशत वर्षा हुई है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक (ओडिशा) ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है कि ग्रीष्मकालीन धान की खेती से भूजल पर भारी दबाव पड़ता है, जो पर्यावरण और कृषि दोनों के लिए हानिकारक है। संस्थान ने किसानों को सुझाव दिया है कि वे धान के स्थान पर कम पानी वाली फसलें जैसे मूंग, उड़द, चना, मक्का, तिलहन, सब्जियां, तरबूज और खरबूजा आदि की खेती करें।
कलेक्टर रणवीर शर्मा ने किसानों से अपील की है कि वे ग्राम पंचायतों द्वारा पारित संकल्प का पालन करें। उन्होंने कहा कि कम वर्षा और घटते भूजल को देखते हुए ग्रीष्मकालीन धान की खेती से बचना बेहद आवश्यक है। किसान वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करें ताकि आने वाले समय में जल संकट से राहत मिल सके।
जिले की 10.84 लाख की आबादी में 90 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्र में निवास करते हैं। ऐसे में 425 ग्राम पंचायतों का यह सामूहिक निर्णय जल संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक और अनुकरणीय पहल माना जा रहा है।
पिछले रबी सीजन में जिले के 1.73 लाख हेक्टेयर रकबे में से 26,680 हेक्टेयर (करीब 65 हजार एकड़) में ग्रीष्मकालीन धान की खेती की गई थी। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार 1 किलोग्राम धान उत्पादन के लिए 2500 से 3000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस कारण गर्मी के मौसम में भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन हुआ, जिससे जिले के कई गांवों में हैंडपंप और ट्यूबवेल सूख गए।
भूजल गिरने से पीने के पानी की किल्लत, बिजली खपत में वृद्धि, भूमि की उपजाऊ शक्ति में कमी और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएं सामने आईं।
Updated on:
30 Oct 2025 10:16 am
Published on:
30 Oct 2025 10:16 am
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