
बेमेतरा के गांवों से भी उठी आजादी की चिंगारी (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Independence Day 2026: देश की आजादी के आंदोलन में बेमेतरा अंचल का योगदान गौरवशाली और ऐतिहासिक रहा है। जिला कार्यालय से उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बेमेतरा और देवकर जैसे नगरीय क्षेत्रों ने जहां आंदोलन को नेतृत्व और वैचारिक दिशा दी, वहीं इसकी व्यापक जनशक्ति ग्रामीण अंचलों से सामने आई। जिले के दूरस्थ गांवों से बड़ी संख्या में लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज बुलंद की और आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई।
उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें तो ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की संख्या नगरीय क्षेत्रों की तुलना में अधिक रही। इन सेनानियों ने खेती-किसानी और रोजमर्रा के कामकाज से ऊपर देश की आजादी को प्राथमिकता दी तथा आंदोलन में भाग लेने के कारण कारावास और अन्य यातनाएं भी सहीं।
बेमेतरा नगर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनजागरण और संगठन का प्रमुख केंद्र रहा। यहां से 11 प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष में भाग लिया। इनमें मुंजन (पिता लल्लू प्रसाद), दयाशंकर (पिता गणेश प्रसाद), झुलाराम (पिता सीताराम), रामदास (पिता बैनदास पिकरी) और ललुवा (पिता शिवराम) शामिल थे। इसी क्रम में शिवशंकर (पिता माधवप्रसाद सप्रे), अवधराम (पिता उन्नतराम कुर्मी), गंगाधर राव (पिता यादवराम तामस्कर), खम्हन लाल (पिता गोवर्धन), टी.एन. ठाकुर (पिता प्रयागराज ठाकुर) तथा उदयसिंह (पिता धनाराम सिंह) ने भी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। इन सेनानियों ने स्थानीय स्तर पर जनजागरण किया, विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया और अंग्रेजी शासन के विरोध में कारावास की सजा भुगती।
देवकर नगर भी स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। यहां के पांच स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने आंदोलन को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। इनमें चंदूलाल (पिता गंगाराम), झगरन (पिता सालिक राम), कोन्दा भाई (पिता सुनहर), झगरू राम (पिता सालिक राम) और नरसिंह प्रसाद (पिता राजाराम अग्रवाल) शामिल थे। इन सेनानियों ने देवकर सहित आसपास के क्षेत्रों में लोगों को संगठित किया और स्वदेशी, कर-बंदी तथा भारत छोड़ो आंदोलन जैसे अभियानों में जनभागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया।
ग्रामीण क्षेत्रों में दाढ़ी और बैजलपुर स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख केंद्रों में रहे। दोनों गांवों से बड़ी संख्या में लोगों ने आंदोलन में भाग लेकर ग्रामीण चेतना को नई दिशा दी। दाढ़ी गांव से लक्ष्मण प्रसाद वैद्य (पिता रामलाल), मल्लूराम (पिता दीनदयाल), लक्ष्मण प्रसाद दुबे (पिता टीकाराम दुबे) और दयाशंकर ने ग्रामीणों को संगठित करने में भूमिका निभाई। वहीं बैजलपुर से थनवार (आत्मज घनिया), पदुमलाल (पिता पंचकॉड), कलीराम (पिता सदाशिव), बुधराम (पिता दीना) और मुकुट (पिता नारायण) ने आंदोलन में भाग लिया। गांवों की चौपालों और जनसंपर्क के माध्यम से आंदोलन का संदेश फैलाया गया। कई सेनानियों को इसके लिए कारावास भी भुगतना पड़ा।
बेमेतरा के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास यह बताता है कि शहरों ने आंदोलन को नेतृत्व और संगठन दिया तो गांवों ने उसे व्यापक जनसमर्थन और ताकत प्रदान की। सीमित संसाधनों के बावजूद ग्रामीण सेनानियों ने अंग्रेजी शासन का विरोध किया और व्यक्तिगत कठिनाइयों की परवाह किए बिना देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। यही सामूहिक भागीदारी आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन को जनांदोलन का स्वरूप देने में महत्वपूर्ण साबित हुई।
बेमेतरा के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में भी स्वतंत्रता आंदोलन की लहर पहुंची थी। जिले के अलग-अलग गांवों से 21 सेनानियों ने आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। इनमें रूरहा (ग्राम बासा), रामस्वरूप (ग्राम धुरसेना), कृपाराम (ग्राम कुसमी), मनशाराम (ग्राम केशडबरी), मधुकर (ग्राम सोढ़), दयाराम (ग्राम बीलाई), नम्मु (ग्राम नकपुरा), बिसाहू प्रसाद (ग्राम जीया), भागवत (ग्राम तेंदुआ), झाड़ूराम (ग्राम भिभौरी), पंडित भगवती प्रसाद (ग्राम अंधियारखोर), सुंदर (ग्राम कुम्ही), नाथूराम (ग्राम सिलघट), लल्लूराम (ग्राम सितमौर), लक्ष्मीदास (ग्राम बछेड़ी), नान्हु राम (ग्राम हरदास), विष्णु प्रसाद शर्मा (ग्राम गिधवा), जेठूमल (ग्राम बिलाई), बुधराम (ग्राम हथमुड़ी), सखाराम (ग्राम भरकसी) और भागवत प्रसाद (ग्राम तेंदूभाठा) के नाम शामिल हैं।
इन सेनानियों की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि बेमेतरा अंचल में स्वतंत्रता आंदोलन केवल शहरों तक सीमित नहीं था। गांवों की चौपालों से लेकर खेत-खलिहानों तक आजादी का संदेश पहुंचा और आम ग्रामीणों ने भी देश की स्वतंत्रता के लिए अपना योगदान दिया।
Updated on:
15 Aug 2026 12:11 pm
Published on:
15 Aug 2026 12:11 pm
