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खेलने-कूदने की उम्र में हम देश आजाद हो गया…चिल्लाने लगते थे

1937 में जन्मी स्नेहलता धारीवाल बोली, शिक्षा को लेकर समानांतरण वातावरण था
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भीलवाड़ा

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Varun Kumar Bhatt

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Updated: 10 Aug 2022, 9:21 PM IST

खेलने-कूदने की उम्र में हम देश आजाद हो गया...चिल्लाने लगते थे

खेलने-कूदने की उम्र में हम देश आजाद हो गया...चिल्लाने लगते थे

भीलवाड़ा. 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, तब मेरी उम्र महज दस वर्ष थी। आजादी को लेकर हर तरफ उत्सवी माहौल था। लोग नारे लगा रहे थे। हम तब बचपन की मस्ती में थे, ज्यादा कुछ समझ नहीं थी, लेकिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम हमारी भी जुबां पर था। शहर में जब जश्न की रैली निकलती तो हम भी देश आजाद हो गया....., हमारा देश आजाद हो गया ......जोश के साथ चिल्लाने लगते थे। यह कहना है पुराना भीलवाड़ा निवासी 85 वर्षीय स्नेहलता धारीवाल का। आजादी के दिनों में अनुशासन सहित अन्य िस्थतियों का जिक्र करते हुए धारीवाल ने तत्कालीन समय की शिक्षा, अनुशासन, देश भक्ति सहित अन्य व्यवस्थाओं का जिक्र करते हुए देश को सोने की चिडि़या कहने के पीछे के कारणों को साझा किया।

शिक्षा को लेकर समान वातावरण

20 मई 1937 में जन्मी धारीवाल बताती हैं कि देश के आजादी का जब दौर था, तब हमारी खेलने-कूदने की उम्र थी। आजादी के पहले भी शिक्षा को लेकर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता था। इंग्लिश मीडियम स्कूल का जमाना था। हमारी भी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में ही हुई। शिक्षा को तब भी सर्वोपरि माना जाता था। यहीं कारण रहा कि मेरी पढ़ाई भी मैटि्रक तक उस समय में सहजता से पूरी हुई। वे कहती हैं कि लड़कों के समानांतर ही लड़कियों की शिक्षा पर भी फोकस था। मैं अपनी पढ़ाई आगे भी जारी रखना चाहती थी, लेकिन पारिवारिक कारणों से आगे की पढ़ाई नहीं हो पाई। वे कहती है कि शिक्षा से जुड़ाव का ही कारण है कि अब भी जैन शिक्षा पाठ्यक्रम को लेकर सक्रियता से जुड़ाव हैं।

भ्रष्टाचार जैसे हालात चिंताजनक

स्वाध्याय संघ अध्यक्ष एवं विभिन्न सामाजिक सेवा कार्यों से जुड़ी धारीवाल कहती है कि देश की आजादी के अमृत महोत्सव का दौर देखकर बहुत प्रसन्नता हो रही है। देश में इन दिनों अलग ही माहौल है। बदलाव की ओर हम धीरे-धीरे आगे भी बढ़ रहे है, लेकिन भ्रष्टाचार जैसे हालात चिंताजनक है। इन पर प्रभावी अंकुश को लेकर जन-जन को संकल्पबद्ध होना होगा।