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गुलामी के दौर में अंग्रेजों के हंटर खाए गर्म सलाखें भी दागी गईं, पर जब देश आजाद हुआ तो बल्ब की रोशनी में फहराया था तिरंगा

Independence Day 2020 : पहले अंग्रेजों के हंटर खाए, जेल गए, भोपाल पहुंचे तो विलीनीकरण के आंदोलन के चलते जेल जाना पड़ा, स्वतंत्रता सेनानियों को आज भी याद है आजादी का वो संघर्ष।

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गुलामी के दौर में अंग्रेजों के हंटर खाए गर्म सलाखें भी दागी गईं, पर जब देश आजाद हुआ तो बल्ब की रोशनी में फहराया था तिरंगा

भोपाल/ देश को आज़ाद हुए आज 73 साल पूरे हो गए हैं। इस दिन को हर भारतीय पूरे जोश ओ खरोश के साथ मनाता है। आज़ादी मिलने के बाद हर भारतीय एक स्वतंत्र वातावण में सांस लेता है। अपने हितों की बात रखना अब उसका अधिकार है। वो अपनी मर्जी के मुताबिक, अपना जीवन यापन कर सकता है। लेकिन, हमें ये आज़ादी कई बलिदानों के बाद मिली है। कई स्वतंत्रता सेनानियों ने हमें इस आज़ादी का सुख देने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया, कई तरह की तकलीफों का सामना किया। हज़ारों लाखों कुर्बानियों के बाद कहीं जाकर हमें ये आज़ादी मिली है। ऐसे ही, आज़ादी के दो मतवालों के बलिदानों की दिल को छू लेने वाली कहानी हम आपको बता रहे हैं, उन्हीं की जुबानी।

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शहीद हेमू कालानी के साथ संघर्ष से जुड़े थे लक्ष्मणदास केसवानी


राजधानी बोपाल के पुराने शहर स्थित इतवारा इलाके में रहने वाले 97 वर्षीय वयोवृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लक्ष्मणदास केसवानी आज़ादी के पहले अंग्रजों के जुल्म की दास्तान बयान करते हुए बताया कि, 'पहले मैं सिंध प्रांत में रहता था। मैंने आजादी के लिए शहीद हेमू कालानी के साथ संघर्ष किया। गुलामी का दौर बहुत बुरा था, अंग्रेजों के जुल्म असहनीय थे। वे हंटर से पीटते थे, गर्म सलाखों से दागते और अत्याचार करते थे।'

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गुलामी के बाद आज़ादी का सुख फिर देखा विभाजन का दर्द

आजादी तो पाई पर विभाजन का दर्द भी साथ आया। हमें सिंध प्रांत से यहां आना पड़ा। सन 1949 में मैं भोपाल पहुंचा। तब यहां भोपाल की आजादी के लिए विलीनीकरण आंदोलन चल रहा था। इस आंदोलन में भी मैं शामिल हुआ और 8 दिन जेल में बंद रहा। देश की आजादी के लिए हुए संघर्ष करते हुए उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा। पहली बार वो 19 महीने 4 दिन तक कराची जेल में बंद रहे, इस बीच उन्हें सात माह के लिए अंडमान निकोबार जेल में भी भेजा गया, इसके अलावा वो तीन माह तक सिंध प्रांत के फख्खड़ जेल में भी रहे।

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आज़ादी हर देशवासी के लिए अमूल्य धरोहर

उन्होंने बताया कि, बड़े संघर्ष और वीरों की कुर्बानियों के बाद हमें इस आजादी मज़ा चखने का मौका मिला है, ये हर देशवासी के लिए बेहद अमूल्य धरोहर है। हमें इसकी रक्षा करनी चाहिए। आज के दौर में देशभक्ति जैसी भावना लोगों में कम होती जा रही है। आजादी के लिए जैसे पूरे देश ने एकजुट होकर संघर्ष किया था, उस तरह की एकता और जज्बा अब लोगों में देखने को नहीं मिलता।

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रात 12 बजे मनाया था जश्न

वहीं, एक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेम नारायण मालवीय का कहना है कि, 'उस समय आजादी को लेकर लोगों में खासा उत्साह था। तब मेरी उम्र 17 साल थी। 14 अगस्त की शाम से ही हर देशवासी के भीतर एक खास उत्साह था। तब हमारा प्रजामंडल का कार्यालय चौक में हुआ करता था। हम लोग वहीं इकट्ठे थे और रेडियो पर सुन रहे थे। रात 12 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर जैसे ही हिन्दुस्तान के आज़ाद होने का ऐलान हुआ, मानों जैसे पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। सभी एक दूसरे से मिलकर खुशी से झूम रहे थे। रात 12 बजे ही हमने कार्यालय की छत पर पूरे सम्मान के साथ तिरंगा फहराया और 200 वॉट का बल्ब जलाकर रोशनी की। चारों तरफ से आजादी के तराने गूंज रहे थे। हम भी उसी में मंत्रमुग्ध थे। इसके बाद अगले दिन सुबह जुमेराती में झंडावंदन कार्यक्रम हुआ, जो मेरे जीवन के लिए बेहद खास पल था।'

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