गैस त्रासदी झेली, अपनों को खोया, अब 80 साल की उम्र में 10 किलो आटे के लिए संघर्ष

- गैस राहत की तरफ से मिलती है एक हजार की पेंशन, राज्य सरकार की 600 रुपए, आज के समय में है ना काफी

भोपाल। गैस पीडि़ता बुजुर्ग महिला शांति बाई, प्रेमबाई साहू, चंपाबाई, 35 वर्ष पूर्व हुई गैस त्रासदी में परिवार खोने के बाद से संघर्ष कर रही हैं। मई 2019 से स्थिति ज्यादा खराब है, क्योंकि दो वख्त रोटी के लिए 10 किलो राशन की आस में खाद्य शाखा में चक्कर काटे, खाद्य मंत्री से मिलकर ज्ञापन सौंपा, हाथ में सूखी रोटी लेकर नीलम पार्क में प्रदर्शन किया। लेकिन हर बार एक ही जवाब मिलता, एनआईसी पोर्टल में अपडेशन कार्य बंद है। ये कहानी सिर्फ इन तीन बुजुर्ग पीडि़ताओं की नहीं बल्कि अन्य महिलाओं की है जिनके घर में दिया जलाने वाला कोई नहीं है। उन्हें ही राशन की व्यवस्था करनी है और बनाना भी है।

गुजारा नहीं चल पा रहा है
गैस पीडि़ता होने के नाते इन महिलाओं को एक हजार रुपए पेंशन मिलती है, सरकार की तरफ से दी जाने वाली 600 रुपए की पेंशन अलग है । लेकिन इतने कम रुपयों में उनका गुजारा नहीं चल पा रहा है। समझ में नहीं आता कि दवा खरीदें या राशन। गैस कॉलोनी से कलेक्टोरेट तक आने में ही करीब 10 किलोमीटर की दूरी है। एक बार में आना-जाना 40 रुपए पड़ता है। अगर एक माह में पांच चक्कर इन्होंने राशन के लिए लगाए तो 200 रुपए तो सिर्फ किराए में ही खर्च हो जाते हैं। ऊपर से दिनभर की भागा दौड़ी अलग।

जीवन यापन सही तरीके से हो सके
इन महिलाओं की मांग है कि गैस राहत पेंशन बढ़ाकर दो हजार रुपए और सरकार की तरफ से दी जा रही पेंशन एक हजार रुपए कर दी जाए। जिससे इनका जीवन यापन सही तरीके से हो सके।

 

नए साल में एक और संकट
गैस पीडि़त निराश्रित पेंशन भोगी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष बालकृष्ण नामदेव बताते हैं कि गैस पीडि़त विधावाओं की परेशानी नए साल में और बढ़ जाएगी। केंद्र सरकार ने विधवा पेंशन के लिए 30 करोड़ रुपया खाते में जमा किया था। इसकी ब्याज से विधवाओं को पेंशन दी जाती रही। बीच-बीच में इस एफडी को तोड़कर रुपया भी निकाला। अब ये रुपया खत्म हो गया है, दिसंबर 2019 के बाद नए साल में गैस राहत की तरफ से मिलने वाली एक हजार रुपए की पेेंशन मिलना मुश्किल है। पांच हजार महिलाएं हैं गैस पीडि़त विधवा

दवा देने वाला कोई नहीं
गैस त्रासदी के बाद करीब पांच हजार महिलाएं विधवा पीडि़ता हैं, इनमें से ढाई सौ के करीब महिलाओं की मृत्यु हो चुकी है। बाकी महिलाएं उम्र के इस पड़ाव में पहुंच चुकी हैं कि वे पेंशन और राशन के लिए भी कलेक्टोरेट और गैस राहत शाखा के चक्कर काट नहीं सकतीं। कई बुजुर्ग महिलाओं की उम्र तो अब 90 साल तक हो चुकी है। जो अकेले ही जीवन यापन कर रही है। दवा देने वाला कोई नहीं है।

आवासों में हो गए हैं अवैध कब्जे
हाउसिंग बोर्ड स्थित विधवा कॉलोनी में एक हजार के करीब आवास विधवाओं के लिए हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या में आवासों में कब्जे हो गए हैं। कई पीडि़ताएं तो ऐसी हैं जिनको आवास मिले भी नहीं और उनका जीवन आवास आवंटन में ही गुजर गया। कॉलोनी में साफ सफाई भी नहीं होती, बीच-बीच में कई जगह पानी भरा है। घरों के बाहर गंदगी के ढेर लगे हैं। अब्दुल जब्बार को दी भावभीनी श्रद्धांजलि

गैस त्रासदी की 35 वीं बरसी पर विधवा पीडि़ताओं ने करोंद कॉलोनी स्थित दशहरा मैदान में हादसे में मारे गए अपनों को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी साथ ही जिंदगी भर गैस पीडि़तों के लिए संघर्ष करने वाले अब्दुल जब्बार को भी श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर पीडि़ताओं ने अपनी राशन, पेंशन की मांग को दोहराते हुए यूनियन कार्बाइड कारखाने में फैले हजारों टन कचरे की सफाई करने की मांग की है।


गैस पीडि़त बुजुर्ग महिलाओं की राशन और पेंशन संबंधी जो समस्या है उसका हम निराकरण कराएंगे।
तरुण पिथोड़े, कलेक्टर

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प्रवेंद्र तोमर Reporting
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