
विख्यात कथावाचक विश्वेश्वरी देवी
भोपाल. कोई उन्हें इंजीनियर बनाना चाहता था तो कोई उन्हें डॉक्टर बनाने का सपना देखने लगा था। परिजन अपने अपने ख्वाब बुन रहे थे लेकिन माधुरी का मन तो अध्यात्म में रम गया था। जब घरवालों को उन्होंने यह बात बताई तो हर कोई हैरान रह गया पर आखिरकार माता पिता तैयार हो गए। माधुरी ने गुरु से दीक्षा ले ली और अब वे कथावाचक विश्वेश्वरी देवी के रूप में देश—विदेश में विख्यात हो चुकी हैं।
दुनियाभर में अपनी कथा के लिए जानीं जातीं कथावाचक विश्वेश्वरी देवी का बचपन का नाम माधुरी ही था। ग्वालियर के डबरा के पास उनका जन्म हुआ। उनके पिता सरकारी विभाग में नौकरी करते थे। पांच बच्चों के इस परिवार में माधुरी का बचपन भी हंसते—खेलते बीत रहा था। आठ साल तक माधुरी ने सामान्य जीवन ही जिया पर इसके बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई।
बताते हैं कि एक बार वे अपने ननिहाल गईं जहां कथा चल रही थी। उस समय महज आठ साल की उम्र में नानाजी ने उन्हें मंच पर चढा दिया। तब भी माधुरी ने ऐसी कथा सुनाई कि लोग मंत्रमुग्ध रह गए। इसी के साथ वे कथावाचक बन गईं। उन्हें धर्म कर्म भाने लगा, अध्यात्म के प्रति उनका लगाव बढ़ने लगा। घर के लोग उनके कैरियर को लेकर कई सपने देखते थे लेकिन वे भगवान की भक्ति में रम गईं थीं।
अंतत: माता पिता भी उनकी जिद के आगे झुक गए और माधुरी ने वृंदावन
के गुरुजी से मंत्र दीक्षा ली। दीक्षा के बाद गुरु ने माधुरी को विश्वेश्वरी देवी नाम दिया। उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और घर बार छोड़कर सन्यासिन बन गईं। उन्होंने गंगा तट पर तपस्या की और बाद में हरिद्वार में आश्रम बना लिया।
आठ साल की उम्र में शुरु हुआ कथा सुनाने का सफर अभी भी जारी है। विश्वेश्वरी देवी अब बहुत विख्यात कथावाचक बन चुकी हैं। स्थिति ये है कि कथा सुनाने मलेशिया, थाइलेंड, नेपाल तक जा रहीं हैं। वे रामकथा, भागवत कथा, शिव महापुराण कथा के साथ हनुमत कथा भी सुनाती हैं।
Published on:
05 Mar 2023 01:43 pm
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