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‘मैं सासंद-विधायक नहीं जो बिक जाऊं’, शेखर सुमन ने अपने शो से भरी हुंकार, बोले- मेरी आवाज कोई नहीं दबा सकता

Shekhar Suman Tonite Show: अभिनेता और होस्ट शेखर सुमन ने हाल ही में अपने व्यंग भरे अंदाज में कहा कि उनकी आवाज अब जनता की आवाज बन चुकी है।
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Shekhar Suman Tonite Show

Shekhar Suman Tonite Show (सोर्स- @shekhartonite)

Shekhar Suman Tonite Show: अभिनेता, होस्ट और लेखक शेखर सुमन इन दिनों अपने नए शो 'शेखर सुमन टुनाइट' की वजह से लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। शो के कई वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनमें वह समसामयिक मुद्दों पर व्यंग्य करते हुए नजर आते हैं। हाल ही में सामने आए एक वीडियो में उन्होंने अपनी बेबाक शैली में राजनीति, मीडिया और जी-7 शिखर सम्मेलन को लेकर ऐसा तंज कसा कि दर्शकों के बीच चर्चा छिड़ गई। क्या है पूरा मामला, चलिए जानते हैं।

शेखर सुमन बोले- मेरी आवाज जनता की आवाज

शो के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या कोई उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है, तो शेखर सुमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि अब उनकी आवाज सिर्फ उनकी नहीं रही, बल्कि जनता की आवाज बन चुकी है और उसे दबाना आसान नहीं है। इसके बाद उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि लोग उनके इशारों को भी अलग-अलग मतलब निकाल लेते हैं।

जी-7 सम्मेलन पर शेखर सुमन ने कसा तंज

इसी बातचीत के दौरान उन्होंने जी-7 सम्मेलन के दौरान वायरल हुए म्यूट वीडियो पर भी कटाक्ष किया। शेखर ने व्यंग्य करते हुए कहा कि बिना आवाज वाले वीडियो देखकर भी अलग-अलग तरह की कहानियां बना दी जाती हैं। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कई ऐसी सुर्खियों का जिक्र किया, जिनमें दावा किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के नेताओं को करारा जवाब दिया, सबको रास्ता दिखाया या फिर दुनिया उनके नेतृत्व से प्रभावित हो गई। शेखर का यह व्यंग्य सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है और लोग इसे उनके पुराने व्यंग्यात्मक अंदाज की वापसी मान रहे हैं।

सरनेम नहीं, काम से पहचान बनाना चाहते थे पिता

इसी बीच एक इंटरव्यू में शेखर सुमन ने अपने नाम को लेकर सालों पुराना राज भी खोला था। उन्होंने बताया था कि वो जानबूझकर अपने नाम के साथ पारंपरिक जातिगत सरनेम नहीं लगाते। उनके अनुसार, 'सुमन' कोई पारंपरिक उपनाम नहीं बल्कि उनके पिता की सोच का प्रतीक है।

उन्होंने बताया कि उनके पिता का मानना था कि इंसान की पहचान उसके काम, विचार और व्यक्तित्व से होनी चाहिए, न कि उसकी जाति या उपनाम से। उस दौर में बिहार में जातिगत भेदभाव काफी देखने को मिलता था। ऐसे माहौल में उनके पिता ने फैसला किया कि उनके बच्चों की पहचान किसी जाति विशेष से नहीं जुड़नी चाहिए।

शेखर ने अपने नाम को लेकर दिया था बयान

शेखर ने बताया कि यही वजह है कि उनके सभी भाई-बहनों के नाम के साथ भी 'सुमन' शब्द जोड़ा गया। जब वह बड़े शहरों में पहुंचे तो कई लोगों ने उनके नाम से उनकी जाति जानने की कोशिश की, लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया। उनके मुताबिक, यही उनके पिता की सबसे बड़ी सफलता थी।