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नीम करोली बाबा या फिर बजरंग बली? ‘हनुमान अंश’ की कहानी में आए ट्विस्ट ने जीता ऑडियंस का दिल

Hanuman Ansh Movie: फिल्म 'हनुमान अंश' ने जहां एक तरफ बॉक्स ऑफिस पर धमाका कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ उसकी कहानी को लेकर भी सोशल मीडिया पर काफी बज बना हुआ है।
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Hanuman Ansh Movie

हनुमान अंश (फोटो सोर्स- IMDb)

Hanuman Ansh Movie: ‘हनुमान अंश’ इन दिनों आध्यात्मिक और पौराणिक सिनेमा पसंद करने वाले दर्शकों के बीच चर्चा में है। निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की यह फिल्म भगवान हनुमान और नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़ी आस्था को एक अलग नजरिए से सामने रखती है। फिल्म की खास बात यह है कि यहां भक्ति को केवल पूजा-पाठ या चमत्कारों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इंसान के व्यवहार और दूसरों की मदद करने से जोड़कर दिखाया गया है। यही वजह है कि फिल्म दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर जोड़ने में कामयाब होती नजर आ रही है।

आखिर किसकी कहानी है ‘हनुमान अंश’?

फिल्म का नाम सुनकर लगता है कि इसकी पूरी कहानी भगवान हनुमान के इर्द-गिर्द होगी, लेकिन कहानी आगे बढ़ने पर एक दिलचस्प कड़ी सामने आती है। फिल्म में नीम करोली बाबा के जीवन और भगवान हनुमान के प्रति उनकी गहरी आस्था को आपस में जोड़ा गया है। कहानी एक ऐसे बच्चे से शुरू होती है, जो अपनी मां को खोने के बाद उन्हें दोबारा पाने की कोशिश करता है।

बचपन में लक्ष्मी नाम का यह बच्चा सुनता है कि उसकी मां भगवान राम के पास चली गई हैं। वह मासूम मन से सोचता है कि आखिर राम तक पहुंचा कैसे जाए। उसे लगता है कि भगवान राम के सबसे बड़े भक्त हनुमान ही उसे वहां तक पहुंचा सकते हैं। यहीं से उसकी आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है।

मां को खोजने निकला बच्चा, पहुंचा आध्यात्मिक राह पर

मां के प्रति बच्चे का प्रेम धीरे-धीरे उसे भगवान राम और फिर हनुमान की भक्ति की ओर ले जाता है। यही बच्चा आगे चलकर लक्ष्मण दास और फिर नीम करोली बाबा के नाम से पहचाना जाता है। फिल्म इसी सफर को अपना केंद्र बनाती है।

‘हनुमान अंश’ का सबसे बड़ा ट्विस्ट भी यहीं छिपा है। फिल्म भगवान हनुमान और नीम करोली बाबा को दो अलग-अलग कहानियों की तरह नहीं देखती, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी आध्यात्मिक यात्रा के तौर पर प्रस्तुत करती है।

चमत्कार से ज्यादा इंसानियत पर जोर

फिल्म में 1943 के दौर की एक घटना भी दिखाई गई है, जब ब्रिटिश शासन के समय एक क्रांतिकारी छिपकर रह रहा था और कई दिनों से भूखा था। इसी दौरान एक संत उसके पास भोजन लेकर पहुंचते हैं। यह प्रसंग किसी बड़े चमत्कार की तरह दिखाया जा सकता था, लेकिन फिल्म का फोकस चमत्कार से ज्यादा उस संत की इंसानियत पर रहता है।

यही ‘हनुमान अंश’ की खासियत है। फिल्म यह सवाल उठाती है कि अगर कोई व्यक्ति भगवान में विश्वास करता है, तो उस विश्वास का असर उसके व्यवहार में कितना दिखाई देता है।

भक्ति का मतलब सिर्फ पूजा नहीं

फिल्म में नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़े कई प्रसंगों के जरिए सेवा और करुणा को भक्ति का अहम हिस्सा बताया गया है। जरूरतमंदों की मदद करना, शोषित महिला का साथ देना, परिवार में रिश्तों को समझना और गलतियों को माफ करना जैसे प्रसंग कहानी को धार्मिक होने के साथ-साथ मानवीय भी बनाते हैं।

फिल्म का संदेश सीधा है कि भगवान के प्रति प्रेम तभी सार्थक है, जब वह हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे। दूसरों के साथ दया, प्रेम और सम्मान से पेश आना भी भक्ति का ही एक रूप हो सकता है।

क्यों पसंद आ रही है युवाओं को?

आज जब पौराणिक फिल्मों में बड़े सेट, VFX और भव्य युद्ध दृश्यों पर काफी जोर दिया जाता है, ‘हनुमान अंश’ अपेक्षाकृत सरल और भावनात्मक रास्ता अपनाती है। फिल्म किसी कठिन धार्मिक दर्शन को समझाने के बजाय मां-बेटे का रिश्ता, भूख, परिवार, क्षमा और इंसानियत जैसी ऐसी भावनाओं को सामने रखती है, जिनसे हर उम्र का दर्शक जुड़ सकता है।

फिल्म में नीम करोली बाबा का किरदार शोभिनव सत्य ने निभाया है। ‘हनुमान अंश’ 7 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी और फिलहाल दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाए हुए है। आखिर में फिल्म के शीर्षक का अर्थ भी स्पष्ट हो जाता है- ये कहानी सिर्फ भगवान हनुमान की नहीं और सिर्फ नीम करोली बाबा की भी नहीं, बल्कि दोनों के बीच जुड़ी उस आस्था की कहानी है, जहां भक्ति का रास्ता इंसानियत से होकर गुजरता है।

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