
पोर्टफोलियो में जरूरत से ज्यादा सोना न रखें। (PC: AI)
दिवाली और धनतेरस पर सोना खरीदना शुभ माना जाता है, लेकिन निवेश के लिहाज से हर बार ज्यादा सोना खरीदना जरूरी नहीं है। अगर आपके पास पहले से गहनों, सिक्कों, गोल्ड ETF या दूसरी योजनाओं के रूप में सोना मौजूद है, तो नई खरीदारी से पहले उसका पूरा हिसाब लगाना चाहिए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि पोर्टफोलियो में सोने की कितनी हिस्सेदारी होनी चाहिए, यह आपकी आर्थिक जरूरतों, निवेश की अवधि और पहले से मौजूद निवेश पर निर्भर करता है।
अधिकतर एक्सपर्ट्स के अनुसार, निवेशकों को पोर्टफोलियो का करीब 7 से 10 फीसदी हिस्सा सोने में रखने पर विचार करना चाहिए। इसमें घर में रखा फिजिकल गोल्ड यानी गहने और सोने के सिक्के भी शामिल होने चाहिए। ऑप्टिमा मनी एमडी पंकज मठपाल के मुताबिक, निवेशक के लक्ष्य और निवेश की अवधि के आधार पर सोने की हिस्सेदारी 5%, 10% या 15% तक हो सकती है। यानी सभी निवेशकों के लिए सोने में निवेश का एक ही फॉर्मूला सही नहीं है।
सोने में नया निवेश करने से पहले यह देखना जरूरी है कि आपके कुल निवेश में इसकी हिस्सेदारी कितनी है। इसके लिए केवल गोल्ड ETF या गोल्ड फंड में लगाए गए पैसे को नहीं गिनना चाहिए, बल्कि घर में रखे सोने का मूल्य भी जोड़ना चाहिए। मान लीजिए आपके पास गहनों, सिक्कों और गोल्ड ETF के रूप में पहले से काफी सोना है। ऐसे में केवल कीमत बढ़ने या त्योहार आने के कारण और सोना खरीदना जरूरी नहीं है।
महाजन का कहना है कि अगर पोर्टफोलियो में सोने की पर्याप्त हिस्सेदारी है, तो उसमें बिना जरूरत बढ़ोतरी करने से बचना चाहिए। धनतेरस या दिवाली पर खरीदारी की परंपरा निभानी हो, तो कम मात्रा में सोना खरीदने पर विचार किया जा सकता है।
इसी तरह, सोने की कीमत बढ़ने पर जल्दबाजी में मौजूदा निवेश बेच देना भी जरूरी नहीं है। पहले यह समझना चाहिए कि आपके पोर्टफोलियो में सोने की हिस्सेदारी आपके वित्तीय लक्ष्यों के हिसाब से सही है या नहीं।
पंकज मठपाल के मुताबिक, लंबे समय के निवेश पोर्टफोलियो में सोने की भी भूमिका हो सकती है। इसकी वजह यह है कि शेयर बाजार और सोने की कीमतें हमेशा एक जैसी दिशा में नहीं चलतीं। अलग-अलग निवेश विकल्पों का प्रदर्शन अलग-अलग समय पर बदल सकता है। हालांकि, सोने की कीमतों में तेजी देखकर निवेश करने से बचना चाहिए। कई बार निवेशक तेजी के दौरान यह सोचकर सोना खरीद लेते हैं कि कहीं वे मुनाफे का मौका न चूक जाएं। इसे FOMO यानी मौका छूट जाने का डर कहा जाता है।
मठपाल का कहना है कि केवल इसलिए सोना नहीं खरीदना चाहिए कि उसकी कीमत पहले ही काफी बढ़ चुकी है और आप पिछली तेजी में निवेश नहीं कर पाए। निवेश का फैसला अपने लक्ष्य और निवेश की अवधि को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
सोने में निवेश की रणनीति पर चर्चा ऐसे समय हो रही है, जब कई एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) ने अपनी कुछ गोल्ड फंड ऑफ फंड्स (FoFs) योजनाओं में नया निवेश लेने पर अस्थायी रोक या पाबंदियां लगाई हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, त्योहारों के दौरान सोने की मांग बढ़ने के बीच इस तरह के कदम का उद्देश्य अतिरिक्त मांग को सीमित करना और सोने के आयात तथा विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद करना है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जिन निवेशकों के पास पहले से पर्याप्त सोना है, उन्हें बाजार की अनिश्चितता के बीच जल्दबाजी में नया निवेश करने से बचना चाहिए।
अगर आप गोल्ड FoF के बजाय गोल्ड ETF में निवेश करना चाहते हैं, तो केवल सोने की कीमत देखकर फैसला न करें। ईटीएफ का बाजार भाव और उसकी iNAV अलग-अलग हो सकती है। गोल्ड ईटीएफ शेयर बाजार में खरीदे और बेचे जाते हैं। इसमें निवेशक आमतौर पर बाजार में मौजूद यूनिट्स का कारोबार करते हैं। ऐसे लेनदेन से जरूरी नहीं कि फिजिकल गोल्ड की नई मांग पैदा हो। हालांकि, खरीदारी का दबाव बढ़ने पर ईटीएफ का बाजार भाव उसकी iNAV से ऊपर जा सकता है।
(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी मात्र है। यह निवेश की सलाह नहीं है। शेयर मार्केट/म्यूचुअल फंड में निवेश जोखिम भरा होता है। कहीं भी पैसा लगाने से पहले अपने निवेश सलाहकार से परामर्श लें।)
Updated on:
17 Oct 2026 05:58 pm
Published on:
17 Oct 2026 05:58 pm
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