
फेस्टिव सेल में लोग जरूरत से ज्यादा खर्च कर देते हैं। (PC: AI)
दिवाली की सेल में बड़ी छूट देखकर अक्सर हम ऐसी चीजें भी खरीद लेते हैं, जिनकी असल में जरूरत नहीं होती। कभी लगता है कि अभी नहीं खरीदा तो ऑफर हाथ से निकल जाएगा, तो कभी कुछ हजार रुपये बचाने के चक्कर में बजट से ज्यादा खर्च हो जाते हैं। दुकानदार और ई-कॉमर्स कंपनियां ग्राहकों की इसी सोच का फायदा उठाती हैं। इसके लिए कंपनियां सिर्फ कीमतें कम नहीं करतीं, बल्कि ग्राहकों की साइक्लोजी को ध्यान में रखकर ऑफर तैयार करती हैं। कहीं काउंटडाउन टाइमर दिखाकर जल्दी खरीदने का दबाव बनाया जाता है, तो कहीं कैशबैक, बैंक डिस्काउंट और नो-कॉस्ट EMI के जरिए महंगी खरीदारी को आसान दिखाया जाता है।
माइंडट्राइब की फाउंडर डॉ. प्रेरणा कोहली के मुताबिक, त्योहारों के दौरान माहौल खुशनुमा होता है। दिवाली जैसे मौके पर लोग खुद के लिए और परिवार के लिए खरीदारी करना पसंद करते हैं। मन अच्छा होने पर बिना ज्यादा सोचे खरीदारी करने की इच्छा भी बढ़ सकती है। इसके अलावा, 'सेल' शब्द भी ग्राहकों को आकर्षित करता है। अर्थशास्त्री रिचर्ड थेलर के मेंटल अकाउंटिंग से जुड़े काम के मुताबिक, किसी खरीदारी में ग्राहक को दो तरह की संतुष्टि मिल सकती है। पहली, सामान मिलने की खुशी और दूसरी, अच्छा सौदा मिलने का एहसास। सेल के दौरान ग्राहक कई बार सामान की जरूरत से ज्यादा इस बात पर ध्यान देते हैं कि उन्हें कितनी छूट मिल रही है। इसी वजह से खरीदारी का बजट बिगड़ सकता है।
ऑनलाइन शॉपिंग के दौरान आपने कई बार ऐसे मैसेज देखे होंगे, जैसे 'ऑफर सिर्फ 5 मिनट के लिए', 'सिर्फ 2 सामान बचे हैं' या 'आज आखिरी मौका'। इनका मकसद ग्राहक को जल्दी फैसला लेने के लिए प्रेरित करना होता है। मनोविज्ञान में इसे FOMO यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट कहते हैं। इसका मतलब है किसी मौके को खो देने का डर। सामान की कमी या ऑफर खत्म होने का दबाव ग्राहक को सोच-समझकर फैसला लेने के बजाय तुरंत खरीदारी करने की ओर धकेल सकता है।
कैसे बचें: काउंटडाउन या 'आखिरी मौका' जैसे संदेश देखकर जल्दबाजी न करें। दूसरी वेबसाइट पर कीमत जांचें और यह भी देखें कि सामान की आपको वास्तव में जरूरत है या नहीं।
मान लीजिए, किसी सामान की कीमत पहले 4,999 रुपये दिखाई जाती है और सेल में उसे 2,999 रुपये का बताया जाता है। ग्राहक का ध्यान सीधे 2,000 रुपये की बचत पर जाता है। लेकिन जरूरी नहीं कि 2,999 रुपये उस सामान की सबसे कम उपलब्ध कीमत हो। हो सकता है कि दूसरी वेबसाइट पर वही सामान पहले से कम दाम में मिल रहा हो। किसी उत्पाद की पहले दिखाई गई कीमत को आधार बनाकर उसकी नई कीमत को सस्ता दिखाने की इस तरकीब को प्राइस एंकरिंग कहा जाता है। ग्राहक अक्सर पहली कीमत को ही तुलना का आधार मान लेता है।
कैसे बचें: खरीदारी से पहले अलग-अलग वेबसाइट पर कीमत देखें। संभव हो तो पुराने दाम भी जांचें। केवल दिखाई गई छूट के आधार पर यह न मानें कि आपको अच्छा सौदा मिल रहा है।
कई ई-कॉमर्स वेबसाइट पर लिखा होता है कि 300 रुपये की और खरीदारी करने पर डिलीवरी फ्री हो जाएगी। ग्राहक डिलीवरी फीस बचाने के लिए अतिरिक्त सामान खरीद लेता है। इसे 'स्पेविंग' कहा जाता है। यह सेविंग और स्पेंडिंग को जोड़कर बना शब्द है। इसका मतलब है बचत के चक्कर में ज्यादा पैसा खर्च करना। मान लीजिए, आपको 50 रुपये की डिलीवरी फीस देनी है। इसे बचाने के लिए आप 300 रुपये का ऐसा सामान खरीद लेते हैं जिसकी जरूरत नहीं थी। इस स्थिति में आपने पैसे बचाने के बजाय अपना खर्च बढ़ा लिया।
कैसे बचें: फ्री डिलीवरी पाने के लिए अतिरिक्त सामान खरीदने से पहले हिसाब लगाएं। अगर डिलीवरी फीस, अतिरिक्त खरीदारी की कीमत से कम है, तो सामान खरीदने के बजाय शुल्क देना ज्यादा समझदारी हो सकती है।
कई दुकानदार ग्राहकों के सामने एक जैसे काम आने वाले उत्पादों के तीन विकल्प रखते हैं। इनमें से एक विकल्प इस तरह चुना जाता है कि दूसरा महंगा उत्पाद ज्यादा आकर्षक लगने लगे। उदाहरण के लिए, किसी इलेक्ट्रॉनिक सामान के दो विकल्प 1,500 और 3,000 रुपये के हैं। ग्राहक सस्ता विकल्प चुन सकता है। लेकिन अगर 2,700 रुपये का तीसरा विकल्प भी सामने रख दिया जाए, तो 3,000 रुपये वाला उत्पाद थोड़ा ज्यादा खर्च में बेहतर सुविधा देने वाला लग सकता है। इसे 'डिकॉय इफेक्ट' कहा जाता है। इसमें ग्राहक को महंगा विकल्प ज्यादा फायदेमंद दिखाई देने लगता है, भले ही सस्ता सामान उसकी जरूरत पूरी कर सकता हो।
कैसे बचें: यह देखें कि महंगे उत्पाद में मिलने वाली अतिरिक्त सुविधाएं आपके काम की हैं या नहीं। सिर्फ थोड़े ज्यादा पैसे में बेहतर विकल्प मिलने के कारण बजट न बढ़ाएं।
कैशबैक, कूपन, क्रेडिट कार्ड डिस्काउंट और रिवॉर्ड पॉइंट्स खरीदारी को ज्यादा फायदेमंद दिखा सकते हैं। कुछ ऑफर में तय रकम से ज्यादा खरीदारी करने पर गिफ्ट या लकी ड्रॉ का मौका भी दिया जाता है। उदाहरण के लिए, 1,000 रुपये की खरीदारी पर कूपन या तय रकम का बिल बनाने पर सोने का सिक्का देने का ऑफर हो सकता है। ऐसे में ग्राहक उस लाभ को पाने के लिए अतिरिक्त सामान खरीद सकता है। लेकिन ऑफर के साथ न्यूनतम खरीदारी की शर्त, भुगतान का खास तरीका या दूसरे नियम भी हो सकते हैं। ऐसे में मिलने वाला फायदा अतिरिक्त खर्च के मुकाबले कम हो सकता है।
कैसे बचें: ऑफर की शर्तें पढ़ें और अंतिम भुगतान की रकम देखें। अगर ऑफर नहीं होता, तो क्या आप वही सामान उसी कीमत पर खरीदते? इस सवाल का जवाब आपके फैसले को आसान बना सकता है।
नो-कॉस्ट EMI के जरिए महंगे मोबाइल, टीवी, लैपटॉप और दूसरे उत्पादों को छोटी मासिक किस्तों में खरीदने का विकल्प मिलता है। इससे बड़ी रकम खर्च करने का दबाव कम महसूस होता है। बड़ी कीमत को छोटी-छोटी किस्तों में बांटने से महंगा सामान भी बजट के भीतर लगता है। हालांकि, नो-कॉस्ट EMI का मतलब यह नहीं कि खरीदारी से जुड़े सभी खर्च खत्म हो गए। प्रोसेसिंग फीस या दूसरे शुल्क लग सकते हैं। कुछ मामलों में EMI चुनने के कारण मिलने वाली दूसरी छूट का फायदा भी नहीं मिलता।
कैसे बचें: सिर्फ मासिक किस्त देखकर फैसला न करें। कुल भुगतान, प्रोसेसिंग फीस और दूसरी शर्तों को जोड़कर देखें। अगर पूरी कीमत चुकाना मुश्किल है, तो गैर-जरूरी खरीदारी टालना बेहतर हो सकता है।
आपने देखा होगा कि कई सामान की कीमत 1,999 रुपये, 4,999 रुपये या 9,999 रुपये रखी जाती है। इसका उद्देश्य कीमत को कम दिखाना हो सकता है। 1,999 रुपये की कीमत पहली नजर में 2,000 रुपये से कम लगती है, जबकि अंतर सिर्फ एक रुपये का है। ग्राहक अक्सर कीमत के बाएं तरफ लिखे अंक पर ज्यादा ध्यान देता है। इसे लेफ्ट डिजिट इफेक्ट कहा जाता है। इसी तरह, कीमतों को अलग ढंग से दिखाकर भी उत्पाद को सस्ता महसूस कराया जा सकता है।
कैसे बचें: 1,999 रुपये को करीब 2,000 रुपये मानकर अपना बजट तय करें। कीमत के छोटे अंतर के बजाय यह देखें कि सामान आपके लिए कितना जरूरी है और उसकी कुल लागत कितनी है।
Updated on:
26 Oct 2026, 3:16 PM IST
Published on:
26 Oct 2026, 3:15 PM IST
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