
सस्ते ईयरफोन, ख़राब चार्जर और छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बढ़ता कचरा पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है। (फोटो डिजाइन : ChatGPT)
घर की एक पुरानी दराज़ खोलिए। कहीं उलझे हुए चार्जर के तार मिलेंगे, कहीं एक कान से आवाज़ देना बंद कर चुका ईयरफोन। किसी कोने में टूटा मोबाइल चार्जर पड़ा होगा, तो कहीं ख़राब इलेक्ट्रॉनिक खिलौना। इन छोटी-छोटी चीज़ों को हम अक्सर बेकार समझकर भूल जाते हैं। मगर जिस सामान को हमने अपनी ज़िंदगी से बाहर कर दिया, वह धरती से बाहर नहीं जाता। धीरे-धीरे यही सामान ऐसे कचरे का पहाड़ बना रहा है, जिसकी क़ीमत प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है।
आज, 14 अक्टूबर 2026 को मनाए जा रहे नौवें अंतरराष्ट्रीय ई-कचरा दिवस का मुख्य विषय 'फ़ास्ट टेक' है। डब्ल्यूईईई फ़ोरम ने सस्ते, जल्दी ख़रीदे और कम समय में छोड़ दिए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर विशेष ध्यान दिया है। इनमें ईयरफोन, यूएसबी अडैप्टर, सजावटी एलईडी लाइटें, मिनी पंखे और इलेक्ट्रॉनिक खिलौने शामिल हैं। संस्था का संदेश स्पष्ट है—छोटे उपकरणों को सामान्य कूड़ेदान में फेंकने के बजाय अधिकृत संग्रह केंद्रों तक पहुँचाया जाए।
डब्ल्यूईईई फ़ोरम की ओर से बेलगार्ड साइंटिफ़िक कंसल्टिंग ने यूरोप के 12 देशों में 10,245 वयस्कों का अध्ययन किया। आज जारी रिपोर्ट के अनुसार, 87 प्रतिशत लोगों के पास कम-से-कम एक फ़ास्ट टेक उत्पाद है। 78 प्रतिशत ने पिछले वर्ष ऐसा सामान ख़रीदा। सर्वेक्षण में 58 प्रतिशत ख़रीदारों को कोई ऐसा उत्पाद याद था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने छह महीने से अधिक नहीं किया। इनमें 39 प्रतिशत को ऐसा सामान याद था जिसे बिना इस्तेमाल, एक बार इस्तेमाल करके या एक महीने के भीतर छोड़ दिया गया था। यह सभी उपकरणों की औसत उम्र का आँकड़ा नहीं है।
12 देशों के 10,245 वयस्कों पर आधारित सर्वेक्षण
| संकेतक | प्रतिशत | स्थिति |
|---|---|---|
| फ़ास्ट टेक स्वामित्व | 87% | बेहद आम |
| पिछले वर्ष ख़रीद | 78% | तेज़ माँग |
| सस्ती क़ीमत वजह | 55% | आकर्षण |
| छह माह तक उपयोग* | 58% | छोटी उम्र |
| घर में बेकार जमा | 29% | दराज़ में बंद |
| घरेलू कचरे में फेंका | 23% | ग़लत निपटान |
| ख़रीद घटाने का इरादा नहीं | 64% | बढ़ती चुनौती |
*58 प्रतिशत ख़रीदारों को कम अवधि में इस्तेमाल किया गया कम-से-कम एक उत्पाद याद था। अन्य आँकड़े उत्तरदाताओं के बताए व्यवहार पर आधारित हैं; कुछ उत्तर एक-दूसरे से जुड़े हो सकते हैं। स्रोत: डब्ल्यूईईई फ़ोरम, फ़ास्ट टेक उपभोक्ता सर्वेक्षण, 14 अक्टूबर 2026।
छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का ख़तरा केवल प्रदूषण तक सीमित नहीं है। वायरलेस ईयरबड और बैटरी वाले खिलौनों में लिथियम-आयन बैटरियाँ हो सकती हैं। कचरा गाड़ियों में दबने या छँटाई के दौरान क्षतिग्रस्त होने पर इनमें आग लग सकती है। डब्ल्यूईईई फ़ोरम के एक सर्वेक्षण में 36 प्रतिशत ई-कचरा संचालकों ने पिछले वर्ष बैटरी से संबंधित आग लगने की घटना बताई। यह ख़तरा सफ़ाईकर्मियों और पुनर्चक्रण केंद्रों के कर्मचारियों के लिए विशेष रूप से गंभीर है।
इलेक्ट्रॉनिक सामान में ताँबा, एल्युमिनियम, प्लास्टिक और अनेक उपयोगी पदार्थ होते हैं। कुछ उपकरणों में ख़तरनाक रसायन भी मौजूद हो सकते हैं। असुरक्षित ढंग से जलाने, तोड़ने या फेंकने पर हानिकारक पदार्थ पर्यावरण में पहुँच सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट चेताती है कि ई-कचरे में मौजूद पारे जैसे पदार्थ मानव मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को नुक़सान पहुँचा सकते हैं। इसलिए सुरक्षित पुनर्चक्रण केवल संसाधनों की बचत नहीं, मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा भी है।
संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार के उपलब्ध आँकड़े
| क्षेत्र / अवधि | आँकड़ा | अर्थ |
|---|---|---|
| विश्व, 2022 | 6.20 करोड़ टन | कुल ई-कचरा |
| विश्व, 2022 | 22.3% | औपचारिक पुनर्चक्रण |
| विश्व, 2030 | 8.20 करोड़ टन | अनुमान |
| भारत, 2022 | 41.37 लाख टन | वैश्विक आकलन |
| भारत, 2023–24 | 12.54 लाख टन | सरकारी आँकड़ा |
| भारत, 2024–25 | 13.98 लाख टन | सरकारी आँकड़ा |
| भारत, 2024–25 | 70.71% | प्रबंधित हिस्सा |
स्रोत: संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर 2024, भारत की देशवार सांख्यिकी और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के संसद में प्रस्तुत आँकड़े। भारतीय सरकारी आँकड़े अधिसूचित उपकरणों पर आधारित हैं; इसलिए उन्हें वैश्विक आकलन से सीधे तुलना योग्य नहीं समझना चाहिए। 70.71 प्रतिशत आँकड़ा एकत्र, विघटित, पुनर्चक्रित अथवा निपटाए गए हिस्से का है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पादक देशों में शामिल है। वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर ने 2022 के लिए भारत में लगभग 41.37 लाख टन ई-कचरे का अनुमान लगाया था। वहीं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वित्तवर्ष 2024–25 में अधिसूचित उपकरणों से लगभग 13.98 लाख टन कचरा बनने का आकलन किया। दोनों संख्याओं की पद्धति और दायरा अलग है। ऐसे में इन्हें जोड़कर या सीधे तुलना करके वृद्धि दर निकालना भ्रामक होगा।\
भारत सरकार ने दो से 31 अक्टूबर 2026 तक 'विशेष अभियान 6.0' शुरू किया है। इसमें सरकारी कार्यालयों में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का संग्रह, पृथक्करण और वैज्ञानिक निपटान प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। खान मंत्रालय ने महत्वपूर्ण खनिजों की पुनर्प्राप्ति के लिए अधिकृत पुनर्चक्रणकर्ताओं और संग्रह केंद्रों की व्यवस्था पर भी ज़ोर दिया है। सरकार के ई-कचरा प्रबंधन नियम, 2022 के अंतर्गत उत्पादकों की विस्तारित ज़िम्मेदारी और पंजीकृत पुनर्चक्रण की व्यवस्था लागू है।
पुराने चार्जर, ईयरफोन और ख़राब इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सामान्य घरेलू कचरे में नहीं डालने चाहिए। काम करने वाले उपकरणों को दोबारा इस्तेमाल या मरम्मत के लिए देना बेहतर है। अनुपयोगी सामान अधिकृत ई-कचरा संग्रह केंद्र या निर्माता की वापसी व्यवस्था को सौंपना चाहिए। ख़राब अथवा फूली हुई बैटरी को स्वयं खोलना, दबाना या जलाना ख़तरनाक है। खरीदारी करते समय टिकाऊपन, मरम्मत की सुविधा और उत्पाद के जीवन के अंत में सुरक्षित निपटान की व्यवस्था पर भी ध्यान देना ज़रूरी है।
जिस चार्जर को हम मामूली समझकर फेंक देते हैं, उसे बनाने में धरती के संसाधन, ऊर्जा और इंसानी मेहनत लगी होती है। पर्यावरण बचाने की शुरुआत केवल पेड़ लगाने से नहीं, अपनी ज़रूरतों और ख़रीदारी की आदत बदलने से भी होती है। हर नया उपकरण ख़रीदने से पहले एक छोटा सवाल पूछना होगा-क्या इसकी सचमुच ज़रूरत है? अगर हम कम ख़रीदें, लंबे समय तक इस्तेमाल करें और ज़िम्मेदारी से पुनर्चक्रण कराएँ, तो धरती पर बढ़ते ई-कचरे का बोझ कम किया जा सकता है। क्योंकि प्रकृति के पास हमारी तरह कोई अतिरिक्त धरती नहीं है।
Updated on:
14 Oct 2026 04:20 pm
Published on:
14 Oct 2026 04:16 pm
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