चीथड़ों पर भविष्य गढ़ा जा रहा है
बीमार तो बच्चे है। आश्रम में सोने के लिए पर्याप्त बिस्तर नहीं है। समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। अधिकारियों की नजर में जिले की शिक्षा व्यवस्था बेहतर है। आश्रम का हल देखा तो लगा कि इस आश्रम में अधिकारियों ने कभी झांक कर भी नहीं देखा है, अधिकारी एक बार भी समय रहते आते तो बच्चे मुसीबत में नहीं जूझ रहे होते। बच्चों की रात ठिठुर कर कटती है। कंबल भी नहीं है, गद्दे फट चुके है। बच्चे खुद बोले कम्बल चाहिये और जैकेट सर्दी बहुत लगती है। इन शब्दों में दर्द था, एक आह भरी कराह भी। चिथड़ों पर देश के भविष्य को गढ़ा जा रहा है। इन मासूमो के दर्द को टटोलने कोई अधिकारी नहीं आया और न ही प्रशासन ने कभी जानकारी ली है। हालात बद बदत्तर है। बच्चे किसी तरह रह कर तालीम ले रहे है। इन बच्चों में से कई के पास तो ड्रेस तक नहीं हैं।