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‘गुरु ने नजर उतारी तो छलक आए शिष्य के आंसू’, सोनकच्छ पुष्पगिरि तीर्थ पर 2 दिवसीय पट्टविभूषण महोत्सव

Pattavibhushan Mahotsav : आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज का ऐतिहासिक पट्टविभूषण महोत्सव शुरू। देश के कई संत होंगे शामिल। आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज बोले- बहुत डर लग रहा था, कैसे गुरूदेव के बगल में इस आसान पर बैठू?
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Pattavibhushan Mahotsav

Pattavibhushan Mahotsav (सोनकच्छ पुष्पगिरि तीर्थ पर 2 दिवसीय पट्टविभूषण महोत्सव Photo Source- Input)

Dewas News :मध्य प्रदेश के देवास जिले के सोनकच्छ के पुष्पगिरि तीर्थ पर शनिवार से दो दिवसीय आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज का ऐतिहासिक पट्टविभूषण महोत्सव शुरू हुआ। जिसमें देश के कई संत शामिल हो रहे हैं, पुष्पगिरि तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज द्वारा श्रमण संस्कृति के अलौकिक संवाहक, तपस्वी शिरोमणी पूज्य अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज का ऐतिहासिक अद्भुत एवं दिव्य पदारोहण पर्व मनाया जा रहा है।

शनिवार सुबह प्रभातफैरी, ध्वजारोहण के साथ ही अन्य आयोजन हुए। वहीं, इस ऐतिहासिक महोत्सव में कई अद्भुत पल भी आए। सबसे खास और यादगार ऐतिहासिक और भावुक करने वाल पल था, जब पट्ट विभूषण संस्कार से पूर्व गुरु अपने शिष्य का हाथ पकड़ के उन्हें नवीन चौकी के समक्ष लाकर मंत्रोच्चार किया। गुरु ने शिष्य की नजर उतारी तो शिष्य के आंसू छलक उठे….। गुरु ने शिष्य के आंसू पोछकर उन्हें गले लगाया और उन्हें चौकी पर बैठाया व पट्ट विभूषण के संस्कार किए। ये दृश्य देख उपस्थित भक्त भाव विभोर हो गए। शिष्य गुरु के चरण पखारे और जल अपने मस्तक से लगाया।

इस दौरान अंतर्मना आचार्य श्री की गृहस्थ जीवन की माता जी शोभा मां और अन्य ने भी पट्ट विभूषित अंतर्मना आचार्यजी की पूजा की। इस अवसर पर भक्तों ने पट्ट विभूषण संस्कार के बाद एक साथ गुरु शिष्य के चरण प्रक्षालन किए व झूमते नाचते गुरुपूजा कर पुण्यजन किया।

बहुत डर लग रहा था, कैसे गुरूदेव के बगल में इस आसन पर बैठू

आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने पट्ट विभूषण के संस्कार के बाद कहा कि पट्टविभूषण शब्द बहुत प्यारा है, पर बहुत गहरा है, पट्टविभूषण गुरू के विश्वास के पद है, पट्टविभूषण जिन शासन की सेवा का पद है। पट्टविभूषण जान को आचरण में उतारने का पद है। पट्टविभूषण, तप त्याग, आचरण की सुगंध को अपने साथ जनमानस को पहुंचने का पद है। उन्होंने कहा कि दीक्षा को 37 साल हो गए हैं। कभी गुरूदेव के सामने नहीं बैठे। हमेशा नीचे ही बैठे। मुझे इस बात का बहुत ही डर लग रहा था कैसे गुरूदेव के बगल में इस आसान पर बैठू, जिन शासन का एक ही धर्म है, जो गूरू अपने शिष्य को अपने जैसा बनाता है, और अपने स्थान पर बैठाता है, ये जैन समाज में ही इतनी उदारता है।

मंत्री बोले- महाराज ने अंतर्मना आचार्य श्री के रूप में एक हीरा चुना

सिंहासन का लोकार्पण मनीष सपना गोधा, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इंदौर, और चंदन तिलक लगाने का सौभाग्य मनोज शिल्पा झांझरी हैदराबाद परिवार ने लिया। वहीं इस दौरान दोपहर में नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय भी तीर्थ में पहुंचे। उन्होंने कहा कि पुष्पगिरि तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज ने अंतर्मना आचार्य श्री के रूप में एक हीरा चुना है। दोनों ही संत समाज के हीरे है, आज हम एक साथ दोनों संतों को साक्षात देख रहे है, तपस्या साधना उपवास क्या होता है आप सामने अंतर्मना बैठे है।

ये धरती महापुरुष तीर्थंकरों की धरती

ये धरती महापुरुष तीर्थंकरों की धरती है, दुनिया में भारत ही का ऐसी धरती जहां महापुरुषों ने जन्म लिया है इस लिए धरती मां है, ये बात सुबह पुष्पगिरि तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर जी महाराज तीर्थ द्वारा संचालित मां जिनवाणी पब्लिक स्कूल द्वारा आयोजित स्वतंत्रता दिवस समाहरोह में उपस्थित बच्चों से कही।
इस अवसर पर 101 फिट के पोल पर 51 फिट का तिरंगा लहराया गया।

जानिए मुनि प्रसन्न सागर बनने की कहानी..

एक समय था जो पप्पू बचपन में कुत्तों को डंडे मारते थे। उसे गुरु पुष्पदंत सागर जी ने कहा था कुत्तों को बहुत डंडे मार लिए, अब मेरे साथ चल कर्मों को डंडे मारेगे, वही पप्पू आगे जाकर मुनि प्रसन्न सागर बने। अपने शिष्य की त्याग, तप, साधना और आराधना देख 2019 में आचार्य पुष्पदंत सागर जी ने अपने प्रसन्न सागर सहित अपने पांच शिष्यों को आचार्य पद से विभूषित किया, व खुद गणचार्य पुष्पदंत सागर बने।

अंतर्नमा आचार्य श्री संस्कार पद यात्रा के माध्यम से पूरे भारत वर्ष में 1 लाख किलोमीटर से भी अधिक की यात्रा कर चुके है। गौरलतब है कि, उन्होंने जैन धर्म के सबसे बड़े तीर्थ सम्मेद शिखर जी की स्वर्ण भद्र कूट की गुफा में जैन धर्म की सबसे बडे व्रत उत्कृष्ट सिंह निष्क्रिदिष्ट व्रत करते हुए 557 दिन की अखंड मौन साधना कर 557 दिन में 61 दिन आहार जल ग्रहण किया।

वर्तमान में तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के बाद उग्रतम तपस्या करने वाले जैन जगत के पहले संत हैं। इन्हीं सब त्याग तपस्या तप को देखते हुए गुरु गणचार्य पुष्पदंत सागर को उनके जन्मोत्सव पर पट्ट विभूषण (पट्टाचार्य) पद संस्कार करने की घोषणा की। जैन इतिहास में पहली बार गणचार्य ने अपने हाथों से अपने शिष्य की पट्ट विभूषित किया।