
विलुप्त हो रहीं देसी मछलियां (Photo Source- Patrika Create)
Chhattisgarh Fish Species: छत्तीसगढ़ की नदियों, तालाबों, डबरियों और प्राकृतिक जलाशयों में कभी बड़ी संख्या में मिलने वाली देशी मछलियों का अस्तित्व अब संकट में है। प्रदेश के पारंपरिक जलस्रोतों में पाई जाने वाली कई मछली प्रजातियां लगातार कम हो रही हैं। इनमें कुछ ऐसी प्रजातियां भी हैं, जो स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण जीवन का हिस्सा रही हैं। मछलियों की पहचान भी कई जगह उनके पारंपरिक स्थानीय नामों से होती है। गंगरेल बांध समेत प्रदेश के कई जलस्रोतों में पहले दिखाई देने वाली कुछ प्रजातियां अब कम नजर आने लगी हैं।
छत्तीसगढ़ के महानदी, इंद्रावती और हसदेव जैसे नदी बेसिन देशी और सजावटी मछलियों की विविध प्रजातियों के लिए जाने जाते हैं। प्रदेश के अलग-अलग जलस्रोतों में कोतरी, खोखसी, टेंगना, बांबी, मोंगरी, सिंधी, चिन्हारी, सारंगी, डडवा, डेसरा, बोधस, इडुम, पढ़ेना, चंदेनी, लुड़वा, मेंदो, सोडहा, गिवना, केवई, विंगरी और तेलबया जैसी स्थानीय प्रजातियां पाई जाती हैं।
इसके अलावा बोराई, करोथ, बटा, कुरसा, चितला, पटोला और मुरेल जैसी प्रमुख स्वदेशी मछलियां भी प्रदेश के जलस्रोतों में मिलती हैं। कैटफिश वर्ग में बचरा, पंगाज, पाबदा और रीता जैसी प्रजातियां शामिल हैं। वहीं भोला, टिक्टो बार्ब, सरना बार्ब, चंदानामा, खसखसी और रसबोरा जैसी छोटी सजावटी देशी मछलियां भी जलीय जैव विविधता का हिस्सा हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र धमतरी की विषयवस्तु विशेषज्ञ मछली पालन मनीषा खापर्डे के अनुसार, डबरी और तालाबों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाली देशी मांगुर अब प्राकृतिक आवासों में विलुप्त हो चुकी है। इसके संरक्षण के लिए कोंडागांव में सीमित स्तर पर बीज उत्पादन और संरक्षण का प्रयास किया जा रहा है। उनके मुताबिक सिंघी, पाबदा, सरना, तोर-तोर, बाघ और आऊ जैसी प्रजातियां भी विलुप्ति की कगार पर हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक देशी मछलियों की संख्या घटने के पीछे कई कारण हैं। इनमें मछलियों के प्रजनन काल में मछली पकड़ने पर लगाए गए प्रतिबंध का प्रभावी पालन नहीं होना प्रमुख कारणों में शामिल है। इसके अलावा जल प्रदूषण और मछलियों के प्राकृतिक प्रजनन स्थलों का खत्म होना भी बड़ी वजह है। जलस्रोतों में मौजूद जलीय खरपतवार और वनस्पतियां कई देशी मछलियों के प्रजनन के लिए जरूरी होती हैं। जलाशयों और नदियों की सफाई के दौरान इन प्राकृतिक आवासों के हटने से भी मछलियों के प्रजनन पर असर पड़ता है। वहीं व्यावसायिक मछली पालन में कतला, रोहू, कॉमन कार्प, मृगल और तेलपिया जैसी प्रजातियों को अधिक बढ़ावा मिलने से स्थानीय प्रजातियों के लिए प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।
बारिश के मौसम में खेतों, छोटी डबरियों और कीचड़ वाले जलस्रोतों में अपने आप पनपने वाली कई देशी मछलियां भी तेजी से कम हो रही हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल का असर इन जलस्रोतों पर पड़ रहा है। इसके चलते देशी मोंगरी, सिंघी, केवई और पाबदा जैसी प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट बढ़ा है। इसके अलावा बांबी, रीता, कोटिया और पंगाज जैसी स्थानीय छोटी प्रजातियां भी लुप्तप्राय स्थिति में पहुंच रही हैं। इन मछलियों की संख्या में कमी सिर्फ मछली पालन से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह जलस्रोतों में मौजूद जैव विविधता में बदलाव का संकेत भी है।
मत्स्य विभाग के संचालक एनएस नाग के मुताबिक छत्तीसगढ़ में पाई जाने वाली देशी मछलियों की कोई भी प्रजाति पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई है। हालांकि उन्होंने माना कि धान के खेतों, डबरियों और गड्ढों के कीचड़ में पनपने वाली देशी मांगुर, सिंधी, डरई और कोतरी जैसी प्रजातियां संकटग्रस्त हैं। विभाग का कहना है कि इन प्रजातियों के संरक्षण के लिए अलग-अलग स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य प्राकृतिक जलस्रोतों में देशी मछलियों की संख्या और उनकी जैव विविधता को बनाए रखना है।
मत्स्य पालन विभाग के उपसंचालक एमएस कमल के अनुसार देशी मछलियों और जलीय जैव विविधता को बचाने के लिए मत्स्य पालन विभाग, वन विभाग और स्थानीय कृषि केंद्र मिलकर संरक्षण के प्रयास कर रहे हैं। प्रदेश में 16 जून से 15 अगस्त तक मछली पकड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया जाता है, ताकि प्रजनन काल में मछलियों को संरक्षण मिल सके। बस्तर की विशिष्ट बोध मछली को संरक्षण देने के लिए इसे राज्य मछली घोषित करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इसके साथ ही ग्रामीणों में जागरूकता बढ़ाने, देशी मछली बीजों का संरक्षण, कृत्रिम प्रजनन और तैयार बीजों को दोबारा नदियों में छोड़ने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।
देशी मछलियों के संरक्षण के लिए आक्रामक विदेशी प्रजातियों पर नियंत्रण के साथ स्थानीय समुदायों को भी इस अभियान से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। मछली पालन से जुड़े लोगों को वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और प्रजनन का प्रशिक्षण देने पर भी जोर दिया जा रहा है।विशेषज्ञों के मुताबिक यदि प्राकृतिक जलस्रोतों, प्रजनन स्थलों और प्रजनन काल के संरक्षण पर ध्यान दिया जाए तो प्रदेश की पारंपरिक मछली प्रजातियों को बचाने में मदद मिल सकती है। देशी मछलियां सिर्फ भोजन या रोजगार का साधन नहीं हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ के पारंपरिक जलस्रोतों और स्थानीय जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा भी हैं।
Updated on:
20 Sept 2026 12:48 pm
Published on:
20 Sept 2026 12:48 pm
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