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Satluj Movie Controversy: गांव-गांव ‘सतलुज’ की स्क्रीनिंग करवा रहे अकाली दल का जसवंत सिंह से क्या है रिश्ता?

Satluj Movie, Akali Dal, Jaswant Singh Khalra: फिल्म 'सतलुज' को लेकर पिछले काफी समय से काफी बवाल चल रहा है। इसी बीच आपको बताते हैं कि अकाली दल का जसवंत सिंह से क्या रिश्ता है, चलिए जानते हैं।
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Satluj Movie Controversy

Satluj Movie Controversy (सोर्स- @IMDb)

Akali Dal Connection with Jaswant Singh: दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को लेकर सियासी बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। 90 के दशक के पंजाब आतंकवाद और पुलिसिया अत्याचार पर केंद्रित इस फिल्म को भारत के बाद दुनिया भर में OTT प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया है। इसका मतलब है कि फिल्म को अब कहीं भी आफिशियली देखा नहीं जा सकेगा। हालांकि, पंजाब के गांवों में सतलुज की स्क्रीनिंग की जा रही है।

हाल ही में पंजाब के शहर मोगा के एक गुरुद्वारे में भी फिल्म दिखाई गई। दरअसल, फिल्म रिलीज के एक ही दिन बाद OTT प्लेटफॉर्म जी5 से हटा ली गई थी, लेकिन इससे पहले कई लोगों ने उसे डाउनलोड कर लिया और अब वही एकमात्र जरिया है फिल्म देखने का।

अकाली दल से जुड़े थे जसवंत

शिरोमणि अकाली दल मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित इस फिल्म को पंजाब के घर-घर में पहुंचाने का ऐलान कर चुका है। पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल का कहना है कि केंद्र सरकार ने भले ही फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा दिया हो, लेकिन हम इसे लोगों तक पहुंचाने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर स्क्रीनिंग करेंगे।

वैसे, तो कांग्रेस और भाजपा की पंजाब इकाई के कुछ नेता भी फिल्म के सपोर्ट में हैं, लेकिन जिस तरह का ऐलान अकाली दल ने किया है, वैसा समर्थन दोनों पार्टी के नेताओं से देखने को नहीं मिला है। दरअसल, शिरोमणि अकाली दल और जसवंत सिंह खालड़ा के बीच एक खास रिश्ता था। पंजाब पुलिस के अत्याचार को दुनिया के सामने लाने वाले जसवंत सिंह शिरोमणि अकाली दल से जुड़े हुए थे।

अकाली दल को फायदे की उम्मीद

तमाम रिपोर्ट्स के अनुसार, जसवंत सिंह खालड़ा, शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव भी थे. इसलिए अकाली दल उनके जीवन पर आधारित इस फिल्म को बैन के बावजूद घर-घर पहुंचाने की कोशिश में लगी है। यह उसके लिए इस साल के अंत या अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले लोगों का समर्थन हासिल करने का एक मौका भी है।

कभी पंजाब की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला अकाली दल अब बेहद कमजोर हो गया है। पहले वो भाजपा गठबंधन का हिस्सा था, लेकिन किसान आंदोलन के मुद्दे पर उसने 2020 में भाजपा का साथ छोड़ दिया था। सतलुज ने 90 के दशक के पंजाब के जख्म को फिर से हरा किया है, फिल्म की स्क्रीनिंग में बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं और उस भयावह मंजर की खौफनाक यादें आंसू के रूप में सामने आ रही हैं। ऐसे में अकाली दल भावनात्मक माहौल का फायदा मिलने की उम्मीद लगाए बैठा है।

बिट्टू के बयान से बीजेपी में बेचैनी

90 के दशक में पंजाब और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन कांग्रेस फिल्म से बैन हटाए जाने के पक्ष में है। वहीं, भाजपा की पंजाब इकाई के नेता भी फिल्म के समर्थन में हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के रुख ने उनकी परेशानी बढ़ा दी है।

बिट्टू ने फिल्म पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि फिल्म में जिन 25,000 अज्ञात शवों का जिक्र है, क्या उसका कोई डेटा है? दिलजीत दोसांझ की इस फिल्म के साथ पंजाब के लोगों की भावनाएं जुड़ गई हैं। ऐसे में इसका विरोध चुनाव में भारी पड़ सकता है, यही बात बीजेपी की पंजाब इकाई को परेशान किए जा रही है। स्थानीय नेताओं ने केंद्र सरकार से फिल्म पर बैन की समीक्षा करने का भी आग्रह किया है।