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फसल बीमा कराना कितना फायदेमंद? जानिए योजना की पूरी हकीकत

Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana: आप भी किसान हैं और आपकी फसल को सुरक्षित रखने के तरीके सोच रहे हैं, तो आपके लिए एक योजना है जो प्राकृतिक आपदाओं से बचा सकती है? जानिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना कैसे बदल सकती है आपके खेती के एक्सपीरियंस?
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Sanjana Kumar

•

Updated: 30 Oct 2026, 1:40 PM IST

Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana

Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana: (AI Photo)

फसल बर्बाद हुई तो कितना मिलेगा मुआवजा?

Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana: फसल की बर्बादी किसान की महीनों की मेहनत और कमाई, दोनों पर पानी फेर सकती है। कभी सूखा, कभी बेमौसम बारिश तो कभी कीट और बीमारियां खेती को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में फसल बीमा किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा का एक जरिया बन सकता है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) इसी उद्देश्य से शुरू की गई थी। लेकिन क्या कम प्रीमियम वाली यह योजना वाकई किसानों के लिए फायदेमंद है? इसके आंकड़े क्या बताते हैं और बीमा लेने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? आइए, इसे समझते हैं।

PMFBY की रूपरेखा और कवरेज

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत 18 फरवरी 2016 को की गई थी। इसका उद्देश्य किसानों को बुवाई से लेकर कटाई और कटाई के बाद तक फसल चक्र के अलग-अलग चरणों में होने वाले अधिसूचित प्राकृतिक जोखिमों से आर्थिक सुरक्षा देना है।

इस योजना के तहत सूखा, बाढ़, जलभराव, चक्रवात, ओलावृष्टि, कीट और फसल संबंधी बीमारियों से होने वाले नुकसान को निर्धारित शर्तों के अनुसार कवर किया जाता है।

प्रतिकूल मौसम के कारण बुवाई न हो पाने, स्थानीय आपदाओं और कटाई के बाद खेत में रखी फसल को कुछ विशेष परिस्थितियों में होने वाले नुकसान का भी प्रावधान है। हालांकि, हर तरह का नुकसान अपने आप बीमा के दायरे में नहीं आता। इसके लिए संबंधित राज्य की अधिसूचना और योजना की शर्तें लागू होती हैं।

प्रीमियम की दरें किसानों के लिए सीमित रखी गई हैं। खरीफ की खाद्यान्न और तिलहन फसलों के लिए किसान को बीमित राशि का अधिकतम 2%, रबी की खाद्यान्न और तिलहन फसलों के लिए 1.5% और वार्षिक व्यावसायिक तथा बागवानी फसलों के लिए अधिकतम 5% प्रीमियम देना होता है।

शेष प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकार सब्सिडी के रूप में देती हैं। सामान्य राज्यों में यह सब्सिडी 50:50 के अनुपात में और पूर्वोत्तर राज्यों में 90:10 के अनुपात में साझा की जाती है।

तकनीकी नवाचार और डिजिटल प्रक्रिया

PMFBY में डिजिटल प्लेटफॉर्म और तकनीकी नवाचारों का इस्तेमाल किया जा रहा है। नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल (NCIP) के माध्यम से किसान योजना से जुड़ी जानकारी, आवेदन और क्लेम की स्थिति देख सकते हैं।

इसके अलावा, YES-TECH यानी यील्ड एस्टीमेशन सिस्टम बेस्ड ऑन टेक्नोलॉजी के जरिए फसल की पैदावार का आकलन करने में तकनीक की मदद ली जाती है। वहीं, WINDS यानी वेदर इंफॉर्मेशन नेटवर्क एंड डेटा सिस्टम का उद्देश्य मौसम संबंधी आंकड़ों और जानकारी का नेटवर्क मजबूत करना है।

इन व्यवस्थाओं से फसल आकलन और बीमा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, तकनीक के इस्तेमाल से हर मामले में क्लेम भुगतान की देरी या विवाद खत्म होने की गारंटी नहीं है।

विस्तार और कवरेज का दायरा

केंद्र सरकार की ओर से 29 अगस्त 2026 को जारी आंकड़ों के अनुसार, खरीफ 2016 से रबी 2025-26 तक योजना के तहत 92.46 करोड़ से अधिक किसान आवेदन बीमित किए गए। इनमें से 26.33 करोड़ से अधिक आवेदनों पर 2.06 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के क्लेम का भुगतान किया गया।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि ये आंकड़े आवेदन और क्लेम के हैं, अलग-अलग किसानों की संख्या के नहीं। एक किसान अलग-अलग फसल मौसमों में कई बार आवेदन कर सकता है।

खरीफ 2025 में 229.77 लाख किसानों को 269.38 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के लिए बीमा कवरेज मिला। वहीं, 27 अगस्त 2026 तक खरीफ 2026 में 241.38 लाख किसानों का बीमा हुआ था और 278.12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवरेज मिला था। इसके अलावा, खरीफ 2025 के लिए 60.89 लाख पात्र किसानों को 9,837.61 करोड़ रुपये के क्लेम का भुगतान किया गया।

राज्यों का रुझान और भागीदारी

कुछ राज्य पहले इस योजना से बाहर हो गए थे, लेकिन अब धीरे-धीरे वापस जुड़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश खरीफ 2022 में, झारखंड खरीफ 2024 में और पश्चिम बंगाल खरीफ 2026 में योजना में शामिल हुए। बिहार ने भी रबी 2026-27 से इस योजना को लागू करने का फैसला किया है।

पश्चिम बंगाल की वापसी और खरीफ 2026 में बढ़े नामांकन को योजना के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, किसी राज्य का योजना में वापस आना अपने आप में किसानों को बेहतर क्लेम मिलने का प्रमाण नहीं है। इसके लिए समय पर भुगतान, नुकसान का सही आकलन और किसानों की शिकायतों का समाधान भी उतना ही जरूरी है।

क्या यह समझदारी भरा कदम है?

कम प्रीमियम और प्राकृतिक जोखिमों से आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से PMFBY किसानों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकती है। योजना के तहत बड़ी संख्या में आवेदन बीमित हुए हैं और लाखों आवेदनों पर क्लेम का भुगतान भी किया गया है। तकनीकी नवाचार और राज्यों की भागीदारी इसे अधिक व्यापक बनाने की दिशा में मदद कर रहे हैं।

लेकिन इसकी कुछ चुनौतियां भी हैं। कई बार किसान आवेदन प्रक्रिया, फसल की अधिसूचना, बीमित राशि और क्लेम की स्थिति को लेकर असमंजस में रहते हैं। स्थानीय स्तर पर फसल नुकसान का आकलन, आंकड़ों में अंतर, क्लेम भुगतान में देरी और शिकायतों के समाधान जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।

इसलिए केवल योजना में नामांकन बढ़ना ही इसकी सफलता का पैमाना नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि नुकसान होने पर पात्र किसान को समय पर और सही मुआवजा मिल रहा है या नहीं।

अब क्या करें किसान?

  • किसान अपनी फसल और क्षेत्र के लिए योजना की अधिसूचना जरूर जांचें। खरीफ और रबी की फसलों के लिए आवेदन की अंतिम तारीख राज्य और फसल के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इसलिए समय पर पंजीकरण कराना जरूरी है।
  • आवेदन के लिए आधार कार्ड, बैंक खाते की जानकारी, जमीन से जुड़े दस्तावेज और खेती करने से संबंधित जरूरी प्रमाण तैयार रखें। बटाईदार और पट्टे पर खेती करने वाले किसान भी निर्धारित पात्रता और दस्तावेजों के आधार पर योजना में शामिल हो सकते हैं।
  • फसल को स्थानीय आपदा या कटाई के बाद के निर्धारित जोखिमों से नुकसान होने पर 72 घंटे के भीतर सूचना देना जरूरी हो सकता है। यह समय-सीमा हर तरह के फसल नुकसान पर समान रूप से लागू नहीं होती।
  • किसान नुकसान की सूचना बीमा कंपनी, संबंधित बैंक, कृषि विभाग या उपलब्ध आधिकारिक माध्यम से दें। योजना से जुड़ी शिकायतों और जानकारी के लिए कृषि रक्षक पोर्टल एवं हेल्पलाइन नंबर 14447 का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

कहना होगा कि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए प्राकृतिक जोखिमों से आर्थिक सुरक्षा पाने का एक महत्वपूर्ण विकल्प है। कम प्रीमियम पर बीमा कवरेज मिलना इसकी बड़ी खासियत है।

लेकिन इसका पूरा लाभ तभी मिलेगा, जब किसान अपनी फसल और क्षेत्र के लिए लागू नियमों को समझकर समय पर आवेदन करें और नुकसान होने पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन करें। खेती में जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन सही जानकारी और समय पर बीमा के जरिए उसके आर्थिक असर को कम करने की कोशिश जरूर की जा सकती है।

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