
मंडी में सोयाबीन की उपज के साथ किसान; समर्थन मूल्य पर पूरी ख़रीद की माँग ने भावांतर योजना पर नई बहस छेड़ दी है। (फोटो डिजाइन : ChatGPT)
सुबह की धूप अभी खेत की मेड़ों पर ही ठहरी है। किसान के सामने सोयाबीन की बोरियाँ रखी हैं। इनमें केवल अनाज नहीं, महीनों की मेहनत, उधार पर ख़रीदे बीज, खाद का ख़र्च और परिवार की उम्मीदें बंद हैं। लेकिन मंडी पहुँचते ही उसके सामने एक सवाल खड़ा हो जाता है-जब सरकार ने फ़सल का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर दिया, तो व्यापारी उससे कम क़ीमत क्यों लगा रहा है? यही सवाल मध्य प्रदेश में अब किसान आंदोलन की नई ज़मीन तैयार कर रहा है।
13 अक्टूबर 2026 को भारतीय किसान संघ ने मध्य प्रदेश सरकार की भावांतर भुगतान योजना का विरोध किया। प्रदेश अध्यक्ष कमल सिंह आंजना ने सोयाबीन, धान, मक्का, बाजरा, मूँग, उड़द और मूँगफली की पूरी उपज घोषित समर्थन मूल्य पर ख़रीदने की माँग की। संगठन ने फ़सल नुक़सान के मैदानी सर्वेक्षण, मुआवज़े, सिंचाई के लिए बिजली और खाद की उपलब्धता जैसे मुद्दे भी उठाए। किसानों का कहना है कि उन्हें सरकारी घोषणाओं के बजाय बिक्री के समय सुनिश्चित दाम चाहिए।
भावांतर योजना में सरकार किसान से सीधे फ़सल नहीं ख़रीदती। पात्र किसान अधिसूचित मंडी में उपज बेचता है और नियमों के मुताबिक़ न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा मान्य बिक्री या मॉडल भाव का अंतर उसके खाते में पहुँचता है। मॉडल भाव किसी एक किसान की बोली नहीं, निर्धारित प्रक्रिया से निकाला गया संदर्भ मूल्य होता है। यदि वास्तविक बिक्री मूल्य उससे कम रहे, तो योजना की गणना और मिलने वाली कुल राशि में अंतर उत्पन्न हो सकता है। इसलिए किसान पारदर्शी भाव निर्धारण की माँग करते हैं।
केंद्र सरकार कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर प्रमुख फ़सलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। लेकिन मूल्य घोषित करना और पूरी उपज ख़रीदना अलग व्यवस्थाएँ हैं। सरकारी ख़रीद निर्धारित फ़सलों, गुणवत्ता, अवधि, पंजीयन, स्वीकृत मात्रा और एजेंसियों के दायरे में होती है। गेहूँ और धान की ख़रीद व्यापक है, जबकि दलहन और तिलहन में अलग शर्तें लागू होती हैं। इसीलिए किसी फ़सल का समर्थन मूल्य तय होने से उसकी शत-प्रतिशत सरकारी ख़रीद स्वतः सुनिश्चित नहीं होती।
केंद्र सरकार ने 13 मई 2026 को खरीफ़ विपणन सत्र 2026-27 के समर्थन मूल्य घोषित किए। सोयाबीन का मूल्य पिछले वर्ष के 5,328 रुपये से बढ़ाकर 5,708 रुपये प्रति क्विंटल किया गया। दूसरे प्रमुख उत्पादों में भी वृद्धि हुई, लेकिन किसानों के लिए असली चुनौती इन दरों पर बिक्री सुनिश्चित होना है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य, खरीफ़ 2026-27 | रुपये प्रति क्विंटल
| फ़सल | 2025-26 | 2026-27 |
|---|---|---|
| सोयाबीन | 5,328 | 5,708 |
| धान (सामान्य) | 2,369 | 2,441 |
| मक्का | 2,400 | 2,410 |
| बाजरा | 2,775 | 2,900 |
| मूँग | 8,768 | 8,780 |
| उड़द | 7,800 | 8,200 |
| मूँगफली | 7,263 | 7,517 |
स्रोत: केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, पत्र सूचना कार्यालय, 13 मई 2026; सरकारी समर्थन मूल्य विवरण।
शत-प्रतिशत सरकारी ख़रीद में भंडारण, परिवहन, गुणवत्ता परीक्षण और उपज के निस्तारण पर भारी ख़र्च आता है। इसीलिए सरकारें प्रत्यक्ष ख़रीद के साथ भावांतर जैसी व्यवस्थाएँ अपनाती हैं। सितंबर 2024 में केंद्र ने मूल्य समर्थन योजना के तहत अधिसूचित दलहन-तिलहन की सामान्य ख़रीद सीमा राष्ट्रीय उत्पादन के 25 प्रतिशत तक निर्धारित की थी। हालाँकि, अरहर, उड़द और मसूर के लिए विशेष प्रावधान हैं। इसलिए यह कहना ग़लत होगा कि हर फ़सल की सरकारी ख़रीद एक प्रतिशत से भी कम होती है।
मान लीजिए, सोयाबीन का समर्थन मूल्य 5,708 रुपये है। किसान को मंडी में 4,500 रुपये मिले, जबकि मान्य मॉडल भाव 4,800 रुपये है। ऐसी स्थिति में मॉडल भाव के आधार पर 908 रुपये का अंतर मिलने से कुल प्राप्ति 5,408 रुपये होगी। यानी समर्थन मूल्य से 300 रुपये कम। यह केवल गणना समझाने का काल्पनिक उदाहरण है; वास्तविक भुगतान संबंधित योजना के नियमों और सीमाओं पर निर्भर करेगा। यही अंतर किसानों के अविश्वास की एक प्रमुख वजह है।
| व्यवस्था | तरीक़ा | मुख्य शर्त |
|---|---|---|
| समर्थन मूल्य | घोषित दर | ख़रीद स्वतः नहीं |
| मूल्य समर्थन | सीधी ख़रीद | पात्रता व गुणवत्ता |
| भावांतर | अंतर भुगतान | निर्धारित गणना |
| धान ख़रीद | सरकारी एजेंसी | केंद्र व अवधि |
| दलहन ख़रीद | विशेष प्रावधान | पूर्व पंजीयन |
| तिलहन ख़रीद | सीमित दायरा | स्वीकृत मात्रा |
| ई-नाम | ऑनलाइन व्यापार | ख़रीद गारंटी नहीं |
स्रोत: कृषि मंत्रालय, प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के दिशा-निर्देश; राज्यसभा में 27 मार्च 2026 का सरकारी उत्तर।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने 27 अक्टूबर 2025 को मध्य प्रदेश में 22 लाख 21 हज़ार 632 मीट्रिक टन सोयाबीन के लिए भावांतर व्यवस्था के अंतर्गत 1,775.53 करोड़ रुपये की वित्तीय स्वीकृति दी थी। यह प्रत्यक्ष सरकारी ख़रीद का आँकड़ा नहीं, बल्कि मूल्य-अंतर भुगतान से जुड़ी स्वीकृत मात्रा थी। राज्य के कृषि सचिव निशांत वरवड़े के अनुसार, 31 दिसंबर 2025 तक किसानों को लगभग 1,294 करोड़ रुपये वितरित किए गए थे। ये पिछले विपणन सत्र के आँकड़े हैं, अक्टूबर 2026 के ताज़ा भुगतान का दावा नहीं।
मध्य प्रदेश सरकार ने भावांतर योजना को किसानों को बाज़ार के उतार-चढ़ाव से राहत देने का माध्यम बताया है। जनवरी 2026 में राज्य के कृषि सचिव ने मूल्य हेरफेर और व्यापारियों की मिलीभगत के आरोपों को आँकड़ों के आधार पर ख़ारिज किया था। दूसरी ओर, किसान संगठनों की आशंका है कि बाज़ार भाव और मॉडल भाव में गड़बड़ी उनके वास्तविक लाभ को प्रभावित कर सकती है। इन आरोपों की स्वतंत्र जाँच और मंडीवार आँकड़ों की सार्वजनिक उपलब्धता भरोसा बहाल करने के लिए ज़रूरी है।
समाधान केवल समर्थन मूल्य बढ़ाना नहीं, उस मूल्य तक किसानों की वास्तविक पहुँच सुनिश्चित करना है। समयबद्ध पंजीयन, पारदर्शी नीलामी, सार्वजनिक मॉडल भाव, शिकायत निवारण और त्वरित भुगतान ज़रूरी हैं। ई-नाम मंडी कारोबार का मंच है, सरकारी ख़रीद की गारंटी नहीं। किसान के लिए आख़िरकार सबसे बड़ा सच वही है, जो उसकी बिक्री की पर्ची और बैंक खाते में दिखाई देता है। खेत में पसीने की क़ीमत तभी मिलेगी, जब घोषित दाम उम्मीद नहीं, हक़ीक़त बनेंगे।
तथ्य-संदर्भ: केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की 13 मई 2026 की समर्थन मूल्य घोषणा, 27 मार्च 2026 का संसदीय उत्तर, 27 अक्टूबर 2025 की सोयाबीन संबंधी स्वीकृति तथा मध्य प्रदेश मंडी बोर्ड के आधिकारिक आदेश। ख़रीफ़ 2026-27 की दरें नवीनतम घोषित दरों के अनुसार हैं।
Updated on:
14 Oct 2026 02:55 pm
Published on:
14 Oct 2026 02:54 pm
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