4 नवंबर 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

पहाड़ी इलाकों में भी होगी करेले की खेती, सही तकनीक और उन्नत किस्मों से बढ़ सकती है किसानों की कमाई

समुद्र तल से 1,000 से 1,500 मीटर तक की ऊंचाई वाले अनुकूल क्षेत्रों में भी संभव है करेले की खेती। मचान पद्धति, ड्रिप सिंचाई और सही किस्मों के चयन से बेहतर उत्पादन की संभावना, लेकिन तापमान, मिट्टी और जल निकासी का ध्यान रखना जरूरी।
3 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

•

image

Avaneesh Kumar Mishra

•

Updated: 3 Nov 2026, 4:19 PM IST

कैसे करें करेले की खेती, PC- Chatgpt

कृषि क्षेत्र में बदलती तकनीकों और उन्नत किस्मों के विकास से अब पहाड़ी इलाकों के किसानों के लिए भी सब्जियों की व्यावसायिक खेती के नए अवसर सामने आ रहे हैं। आमतौर पर गर्म और समतल क्षेत्रों में उगाया जाने वाला करेला अब उपयुक्त परिस्थितियों में ऊंचाई वाले इलाकों में भी उगाया जा सकता है। कृषि विश्वविद्यालयों और तकनीकी मार्गदर्शिकाओं के अनुसार, सही तापमान, उपयुक्त मिट्टी, सिंचाई और फसल प्रबंधन से किसान पहाड़ी क्षेत्रों में भी करेले का उत्पादन कर सकते हैं। हालांकि, इसकी सफलता केवल ऊंचाई पर नहीं, बल्कि स्थानीय जलवायु और खेती की व्यवस्थाओं पर निर्भर करती है।

1,500 मीटर तक की ऊंचाई पर खेती की संभावना

केरल कृषि विश्वविद्यालय के अनुसार, करेले की खेती समुद्र तल से लगभग 1,000 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में की जा सकती है। वहीं, नेपाल की एक कृषि तकनीकी मार्गदर्शिका में अनुकूल परिस्थितियों के दौरान 60 से 1,500 मीटर तक की ऊंचाई पर इसकी खेती संभव बताई गई है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि इतनी ऊंचाई वाले प्रत्येक क्षेत्र में फसल सफल होगी। करेला गर्म मौसम की फसल है और पाला पड़ने तथा अत्यधिक ठंड से इसका विकास प्रभावित हो सकता है। इसलिए पहाड़ी किसानों को बुवाई से पहले अपने क्षेत्र के तापमान और मौसम का आकलन करना चाहिए।

तापमान और मिट्टी का सही चयन जरूरी

करेले की बेलों के विकास के लिए 24 से 27 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल माना जाता है। बीजों के अंकुरण के लिए सामान्यतः 18 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान आवश्यक होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में कम तापमान के कारण अंकुरण और पौधों की बढ़वार धीमी हो सकती है।

खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी में पर्याप्त जैविक पदार्थ होने चाहिए और पीएच मान लगभग 6.0 से 7.0 के बीच होना बेहतर रहता है। खेत में पानी जमा होने से जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।

इन उन्नत किस्मों से मिल सकता है बेहतर उत्पादन

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों ने करेले की कई उन्नत किस्में विकसित की हैं। भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु की अर्का हरित किस्म की उत्पादन क्षमता लगभग 12 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। इसके फल हरे, मध्यम आकार के और अपेक्षाकृत कम बीज वाले होते हैं।

भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी की काशी प्रतिष्ठा किस्म की संभावित उपज 280 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसके फल लंबी दूरी तक परिवहन के लिए उपयुक्त बताए गए हैं।

इसी संस्थान की काशी मयूरी किस्म की उत्पादन क्षमता 200 से 220 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसमें एन्थ्रेक्नोज, डाउनी मिल्ड्यू और मोजेक रोगों के प्रति सहनशीलता पाई गई है। हालांकि, इन किस्मों की पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष उपयुक्तता की पुष्टि स्थानीय परीक्षण के आधार पर ही की जानी चाहिए।

मचान पद्धति से बेहतर फल और आसान तुड़ाई

करेले की खेती में मचान या पंडाल पद्धति उपयोगी मानी जाती है। इसमें बेलों को जमीन पर फैलाने के बजाय खंभों और तारों की सहायता से ऊपर चढ़ाया जाता है। सामान्यतः लगभग 2 से 3 मीटर ऊंची संरचना का उपयोग किया जा सकता है।

इस तकनीक से फल जमीन के सीधे संपर्क में नहीं आते और उनकी तुड़ाई आसान हो जाती है। कुछ कृषि अध्ययनों में मचान या ट्रेलिस व्यवस्था से उपज और गुणवत्ता में सुधार पाया गया है। हालांकि, हर परिस्थिति में उत्पादन दोगुना होना सुनिश्चित नहीं है।

ड्रिप सिंचाई और परागण पर दें विशेष ध्यान

करेले की अच्छी पैदावार के लिए खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी है। ड्रिप सिंचाई से पौधों की जड़ों तक नियंत्रित मात्रा में पानी पहुंचाया जा सकता है। बारिश के मौसम में अतिरिक्त पानी निकालने की व्यवस्था आवश्यक है।

करेले में परागण के लिए मधुमक्खियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लगातार बारिश या बादल छाए रहने पर मधुमक्खियों की सक्रियता कम हो सकती है, जिससे फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

बेहतर उत्पादन के लिए बेलों की आवश्यकतानुसार छंटाई भी की जा सकती है। पौध विकास नियामकों, जैसे जीए3 या इथ्रेल, के उपयोग पर कृषि अनुसंधान में सकारात्मक परिणाम मिले हैं, लेकिन इनका प्रयोग केवल स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा और अनुमोदित निर्देशों के अनुसार करना चाहिए।

कीट और रोगों से बचाव भी जरूरी

करेले की फसल में फल मक्खी, सफेद मक्खी, पाउडरी मिल्ड्यू और मोजेक वायरस जैसी समस्याएं हो सकती हैं। किसानों को नियमित रूप से पौधों की निगरानी करनी चाहिए। प्रभावित फलों को हटाना, खेत की सफाई और अनुशंसित ट्रैप का उपयोग उपयोगी हो सकता है।

कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का प्रयोग बिना आवश्यकता और विशेषज्ञ सलाह के नहीं करना चाहिए।

लागत का आकलन करने के बाद शुरू करें खेती

पहाड़ी क्षेत्रों में करेले की खेती शुरू करने पर मचान, सिंचाई व्यवस्था, उन्नत बीज और फसल सुरक्षा पर अतिरिक्त खर्च हो सकता है। बेहतर प्रबंधन से उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार की संभावना रहती है, लेकिन वास्तविक लाभ बाजार भाव, उपज, परिवहन खर्च और कुल लागत पर निर्भर करेगा।

किसानों को बड़े क्षेत्र में खेती शुरू करने से पहले छोटे स्तर पर परीक्षण करना चाहिए। नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से स्थानीय मौसम के अनुसार किस्म, बुवाई के समय और फसल प्रबंधन की जानकारी लेना लाभकारी रहेगा।