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छत्तीसगढ़ी परंपरा.. किसान इस वजह से मां अन्नपूर्णा को लगाते हैं चीला का भोग, विधि-विधान से करते है पूजा

CG News : छत्तीसगढ़ राज्य कृषि प्रधान राज्य है। यहां के ज्यादातर लोग खेती किसानी कार्य पर निर्भर होते हैं।
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गरियाबंद

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Kanakdurga jha

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Updated: 18 Sep 2023, 5:08 PM IST

छत्तीसगढ़ की अनोखी रिवाज, अन्नपूर्णा माता को मनाने.. किसान लगाते है चीला का भोग, विधि-विधान से करते है पूजा

छत्तीसगढ़ की अनोखी रिवाज, अन्नपूर्णा माता को मनाने.. किसान लगाते है चीला का भोग, विधि-विधान से करते है पूजा

CG News : छत्तीसगढ़ राज्य कृषि प्रधान राज्य है। यहां के ज्यादातर लोग खेती किसानी कार्य पर निर्भर होते हैं। आज भी यहां के किसान पारंपरिक तरीके से ही खेती करते हैं। हालांकि बदलते समय के साथ-साथ आज आधुनिक तकनीकों के माध्यम से किसान कृषि कार्य करने शुरू कर दिए हैं। लेकिन, कृषि कार्यो में पीढ़ियों से चली आ रही रीति- रिवाज या परंपरा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में कायम हैं। किसान आषाढ़ माह में खेतों में धान की बुआई तो लगभग पूर्ण कर लेते हैं।

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इसके बाद सावन माह में सवनाही पूजा के दिन से ग्रामीण क्षेत्रों में किसान इतवारी त्यौहार मनाना शुरू कर देते हैं। यह इतवारी त्यौहार कुछ गांवों में 5 रविवार तो कुछ गांवो में 7 रविवार को मनाते हैं। इस दिन किसान पूरी तरह कृषि कार्य बंद रखते हैं। जो पोला पर्व के बाद आखिरी रविवार को किसानों द्वारा अच्छे उत्पादन की कामना के साथ अपने खेतों में जाकर धूपबत्ती इत्यादि सामग्री से पूजा अर्चना कर चावल आटे व गुड़ से बनाए गए मीठा चीला को अन्नपूर्णा माता में भोग लगाया जाता है।

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गरीब भी चढ़ा सके इसलिए गुड़ व चावल आटे का चीला की परंपराइतवारी त्यौहार के संबंध में पं. उपकार शुक्ला ने बताया कि इतवारी त्यौहार पुराने समय में बनाया गया एक ग्रामीण व्यवस्था है। इस त्यौहार में चीला चढ़ाने की परंपरा बनाई गई थी। चीला मुख्य रूप से चावल आटा और गुड़ का मिश्रण होता है।

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अर्थात गुड़ चीला का अर्थ मिठाई से है। पहले के जमाने में सबके पास धन एक समान नहीं था, तो चीला और गुड़ को परंपरा में लाया गया। ताकि सभी वर्ग इस मिठाई को आसानी से बना सके। जिससे वर्ग भेद को मिटाया जा सके। इतवारी त्यौहार मुख्य रूप से फसल और आनंद से संबंधित है। जिसमें ग्रामीण मां अन्नपूर्णा को चीला अर्पित करके उसे भोग के रूप में लेकर इस विशेष दिन का आनंद लेवें।

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अन्नपूर्णा माता की गोदभराई की भी मान्यता

अंचल के कई गांवों में धान की फसल पर चीला चढ़ाने पुरानी पीढ़ी की परंपरा के चलते आज भी किसान इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए प्रचलन में रखे हुए हैं। जिसका प्रत्येक वर्ष बखूबी से निर्वहन किया जाता हैं। वहीं, कुछ गांवों में पोला पर्व के दिन धान की फसल पर गर्भ धारण होने के बाद गांवों में मनाए जाने वाला इतवारी त्यौहार के अंतिम रविवार को गोदभराई के रूप में भी मानते हैं।

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