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40 लाख सालाना कमाई और BMW कार, फिर भी खुद को ‘गरीब’ मानता है गुरुग्राम का युवक; डॉक्टर ने बताई बेचैनी की वजह

BMW Owner Feels Poor 40 Lakh Package: लग्जरी कार और 40 लाख के पैकेज के बाद भी एक शख्स खुद को गरीब मानकर डिप्रेशन में है। गुरुग्राम के डॉ. सनी गर्ग ने बताया कि कैसे दूसरों से तुलना करने की बीमारी 'मॉडर्न पॉवर्टी' को जन्म दे रही है।
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गुडगाँव

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Imran Ansari

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Updated: 4 Jun 2026, 6:07 PM IST

BMW Owner Feels Poor 40 Lakh Package

गुरुग्राम के डॉक्टर की फोटो, BMW प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स- इंस्टाग्राम @drsunnygarg)

Gurgaon Doctor Video: दिल्ली से सटे गुरुग्राम में एक ऐसा शख्स है, जो 40 लाख रुपए सलाना कमाता है और BMW कार से घूमता है। इसके बावजूद भी वह अपने आप को गरीब समझता है और गरीबी की वजह से वह रात को सो नहीं पाता है। सुनने में यह भले ही अजीब लग रहा होगा, लेकिन आज के दौर के कामकाजी प्रोफेशनल्स के बीच यह एक कड़वी हकीकत बनती जा रही है। एवरहोप ऑन्कोलॉजी के को-फाउंडर और चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. सनी गर्ग ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा ही दिलचस्प वाकया साझा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे कमाई के साथ खर्च और उम्मीदें बढ़ना इंसान की अमीरी और गरीबी की परिभाषा को पूरी तरह बदल रहा है। डॉ. गर्ग के अनुसार, आज कई सफल लोग इसलिए गरीब महसूस नहीं करते क्योंकि उनके पास पैसे की कमी है, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास 'संतोष' की कमी है।

'डॉक्टर साहब, मैं बहुत गरीब हूं, रात को नींद नहीं आती'

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुग्राम के रहने वाले डॉ. सनी गर्ग बताते हैं कि पिछले हफ्ते उनकी मुलाकात 34 साल के एक शख्स से हुई, जो गुरुग्राम में ही एक 2BHK फ्लैट में रहता है, 40 लाख रुपए सालाना कमाता है और BMW कार चलाता है। डॉक्टर ने खुलासा किया कि 'वह मेरे सामने बैठा और बोला कि 'डॉक्टर, मुझे लगता है कि मैं बहुत गरीब हूं। मुझे रात में नींद नहीं आती।' मैं उसकी इस बात पर हंसा नहीं, क्योंकि यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह आज के भारतीय मिडिल-क्लास प्रोफेशनल की हकीकत है, जिसके बारे में शायद ही कोई खुलकर बात करता है।'

बदल गया है 'गरीबी' और 'अमीरी' का पैमाना

व्यक्ति को समझाते हुए डॉ. गर्ग ने कहा किअगर आंकड़ों के नजरिए से देखा जाए, तो यह 34 साल का शख्स भारत के टॉप 1% कमाने वाले लोगों में शामिल है। इसके बावजूद वह खुद को गरीब समझ रहा है, क्योंकि उसका 'रेफरेंस पॉइंट' (तुलना करने का आधार) बदल चुका है। डॉक्टर ने कहा कि पहले वह अपनी तुलना गांव के उस पड़ोसी से करता था जिसका बेटा क्लर्क की नौकरी करता था। लेकिन अब वह खुद की तुलना लिंक्डइन (LinkedIn) पर मौजूद उस 28 साल के युवक से करता है जिसने अपना स्टार्टअप बेच दिया और आज 80 करोड़ रुपए पर बैठा है। यही 'मॉडर्न पॉवर्टी' (आधुनिक गरीबी) है। आपकी आमदनी तो बढ़ी है, लेकिन आपकी अपेक्षाएं 10 गुना ज्यादा बढ़ गई हैं। हर साल यह अंतर और चौड़ा होता जा रहा है।'

डॉक्टर के वो सवाल, जिन्होंने खोल दीं आंखें

शख्स की मानसिक स्थिति को समझते हुए डॉ. गर्ग ने उससे तीन बेहद जरूरी सवाल पूछे, जिनके जवाब चौंकाने वाले थे। दरअसल, बातचीत करने के दौरान उन्होंने सवाल किया कि पिछले एक साल में तुमने कितनी बार खुद से यह कहा कि 'मैं और जो मेरे पास है, वो काफी है'? शख्स का जवाब था 'कभी नहीं।' इसके बाद डॉक्टर ने दूसरा सवाल किया कि तुम यह सारा पैसा आखिर किसके लिए कमा रहे हो? शख्स ने माना कि 'वह नहीं जानता', वह बस अंधी दौड़ में इसलिए भाग रहा है क्योंकि बाकी सब आगे बढ़ रहे हैं।

पैसा कमाने की मशीन बन गया है इंसान

डॉक्टर के मुताबिक, इन जवाबों से साफ हो गया कि वह शख्स आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि जीवन के अर्थ, अपनों से जुड़ाव और मानसिक शांति के मामले में गरीब था। डॉ. गर्ग ने चेतावनी देते हुए कहा, 'जब पैसा ही आपकी हर गतिविधि का पैमाना बन जाता है, तो आप इंसान नहीं रह जाते, बल्कि एक मशीन बन जाते हैं। केवल मोटी कमाई आपकी पहचान या उद्देश्य की कमी को पूरा नहीं कर सकती।'