
ग्वालियर। कुपोषण और पिछड़ेपन की पहचान रखने वाले श्योपुर के कराहल ब्लॉक अब आम के उत्पादन के लिए भी जाना जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि कराहल ब्लॉक के दो दर्जन गांवों के किसानों ने अपने खेतों में आम की बगिया विकसित की है,जिसमें महज दो साल की अवधि में ही आम आने लगे हैं। विशेष बात यह है कि केसर और राजभोग प्रजाति के इन आमों के पल्प (गूदे) को विदेशों में भी सप्लाई किया जाएगा। कराहल के कई क्षेत्रों में पानी के अभाव में किसान पर परंपरागत खेती नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिला प्रशासन के आजीविका मिशन कार्यक्रम के तहत आम के बगीचे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
इसी के तहत लगभग दो साल पूर्व कराहल के दो दर्जन से अधिक गांवों में किसानों ने दो-दो बीघा के रकबे में 528 आम के बगीचे स्थापित किए हैं, जिनमें केसर और राजभोग प्रजाति के पौधे लगाए गए। इनमें इसी वर्ष महज दो साल की अवधि में ही आम आने भी लगे हैं। हालांकि तीन वर्ष की अवधि में ही इन पेड़ों में पूरा फलाव होता है, लिहाजा आजीविका मिशन के माध्यम से ही अगले वर्ष कराहल में पल्प निकालने का प्लांट स्थापित किया जाएगा।
जिसमें किसानों के आम खरीदकर, पल्प निकालकर और पल्प पैकिंग कर विभिन्न कंपनियों के मार्फत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व अन्य देशों में सप्लाई किया जाएगा। चूंकि इस वर्ष आवक कम रहेगी, लिहाजा किसान स्थानीय स्तर पर ही इनका विक्रय करेंगे।
महज ढाई से छह फीट के ही हैं पेड़
आम की केसर और राजभोग प्रजाति के इन पेड़ों की ऊंचाई भी महज ढाई से छह फीट तक ही रहती है, फलाव भी दो साल की अवधि से ही शुरू हो जाता है। यही वजह है कि वर्तमान में किसानों की इन बगियाओं में उगे छोटे छोटे पेड़ों में ही आम आने लगे हैं। विशेष बात यह है कि इन पेड़ों के बीच 10-10 मीटर की दूरी रखी गई है, ताकि किसान परंपरागत खेती भी कर सके।
"कराहल ब्लॉक में 528 हितग्राहियों ने आम के बगीचे स्थापित किए हैं। जिसमें दो साल मेंं ही आम आने लगे हैं। हम अगली साल प्लांट लगाकर इस आम का गूदा निकालेंगे और विदेशों में सप्लाई करेंगे, जहां इस आम के पल्प की मांग रहती है।"
डॉ. एसके मुदगल, डीपीएमी, एनआरएलएम श्योपुर
Published on:
16 Apr 2018, 2:35 PM IST
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