
गूजरी महल संग्रहालय में पुरावशेष संपदा को डिजिटल रूप देने का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है।
ग्वालियर. राज्य पुरातत्व विभाग के गूजरी महल की दीवारों में कैद इतिहास अब सिर्फ संग्रहालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में दुनिया के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति एक क्लिक पर यहां रखी सदियों पुरानी प्रतिमा को देख सकेगा, उसे अलग-अलग कोणों से समझ सकेगा और उसके इतिहास की पूरी जानकारी हासिल कर सकेगा। यानी गूजरी महल की विरासत अब सात समंदर पार डिजिटल सफर पर निकलने जा रही है। राज्य के संग्रहालयों की पुरावशेष संपदा को डिजिटल रूप देने की कवायद के तहत अब ग्वालियर के गूजरी महल में थ्री-डी स्कैनिंग और मेटाडेटा प्रिपरेशन का काम शुरू हो गया है। पहले चरण में यहां रखी करीब 600 प्रतिमाओं, बंदूकों और टेराकोटा कलाकृतियों को डिजिटल स्वरूप दिया जाएगा। इसके बाद करीब 1500 और पुरावशेषों को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।
मूर्ति को स्कैन कीजिए, पूरी कहानी सामने
इस पूरी प्रक्रिया की सबसे खास बात यह है कि पुरावशेष की केवल तस्वीर नहीं बनेगी, बल्कि उसका थ्री-डी डिजिटल मॉडल तैयार होगा। उसके साथ उसका मेटाडेटा यानी उससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी डिजिटल रूप में दर्ज होंगी। किस काल की प्रतिमा है, किस शैली में बनी है, उसका विषय क्या है, उसका आकार-प्रकार क्या है, वह किस सामग्री से निर्मित है और उससे जुड़ी दूसरी ऐतिहासिक जानकारियां-इन सबको एक डिजिटल रिकॉर्ड में संजोया जाएगा। भविष्य में यही रिकॉर्ड संरक्षण, प्रिजर्वेशन और रेस्टोरेशन के काम में भी उपयोगी होगा।
एक स्कैन, कई स्तर की जांच
काम केवल स्कैनिंग तक सीमित नहीं है। पहले पुरावशेष की थ्री-डी स्कैनिंग होगी। इसके बाद अलग-अलग सॉफ्टवेयर की मदद से स्कैन डेटा को प्रोसेस कर उसका थ्री-डी मॉडल तैयार किया जाएगा। फिर प्रत्येक पुरावशेष का मेटाडेटा तैयार होगा। इस जानकारी को सीधे ऑनलाइन नहीं डाल दिया जाएगा। तीन स्तर पर इसका सत्यापन होगा। देश के अलग-अलग हिस्सों के विद्वान और विषय विशेषज्ञ इसकी जानकारी की जांच करेंगे। इसके बाद संग्रहालय अधिकारी इसका सत्यापन करेंगे और अंत में डायरेक्टोरेट स्तर पर दोबारा जांच के बाद डेटा सर्वर पर अपलोड किया जाएगा।
भोपाल और उज्जैन के बाद ग्वालियर
मध्यप्रदेश के सभी संग्रहालयों में थ्री-डी स्कैनिंग का लक्ष्य रखा गया है। भोपाल और उज्जैन के संग्रहालयों में यह काम किया जा चुका है, जबकि अब ग्वालियर के गूजरी महल में इसकी शुरुआत हुई है। योजना के तहत आगे पांच-छह संग्रहालयों के पुरावशेषों का काम एक साथ किया जाएगा।
इस पूरी कवायद के लिए महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल से जुड़े करीब 10 विशेषज्ञों की टीम काम कर रही है। पहले चरण का काम करीब चार से पांच महीने में पूरा करने का लक्ष्य है।
संग्रहालय से मेटावर्स तक
पूरा कार्य होने के बाद पुरावशेषों का डिजिटल डेटा मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाएगा। इसके जरिए देश-विदेश में बैठे लोग संग्रहालय की कलाकृतियों तक ऑनलाइन पहुंच सकेंगे। यानी आने वाले समय में गूजरी महल में रखी कोई प्रतिमा केवल कांच के भीतर खड़ी एक पुरानी मूर्ति नहीं होगी। उसका अपना डिजिटल अस्तित्व होगा, जिसे देखा जा सकेगा, समझा जा सकेगा और भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सकेगा।
प्रथम चरण में 600 पुरावशेषों पर काम हो रहा
गूजरी महल में रखे पुरावशेषों की थ्री-डी स्कैनिंग और मेटाडेटा तैयार करने का उद्देश्य उन्हें डिजिटल रूप में सुरक्षित करना और उनकी प्रमाणिक जानकारी को व्यवस्थित करना है। प्रथम चरण में 600 पुरावशेषों पर काम किया जा रहा है। इससे भविष्य में इन पुरावशेषों के कंजर्वेशन, प्रिजर्वेशन और रेस्टोरेशन के काम में भी मदद मिलेगी।
Updated on:
03 Oct 2026 11:20 am
Published on:
03 Oct 2026 11:20 am
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