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भारत-ताइवान के बीच बढ़ेगा तकनीकी सहयोग, युवाओं के लिए खुलेंगे नए अवसर

संगोष्ठी में ताइपेई आर्थिक एवं सांस्कृतिक केंद्र, दिल्ली के प्रतिनिधि डॉ. मूमिन चेन ने कहा कि चुनौतीपूर्ण भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद भारत और ताइवान के संबंध विभिन्न क्षेत्रों में विकसित हो रहे हैं। दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच शिक्षा, संस्कृति, भाषा और उद्योग के क्षेत्र में सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक आदान-प्रदान के साथ तकनीकी क्षेत्र में सहयोग को भी बढ़ाया जा सकता है।
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India-Taiwan Relations

जेयू में संगोष्ठी: शिक्षा, संस्कृति, भाषा और उद्योग में सहयोग बढ़ाने पर हुआ मंथन; ताइवान के विश्वविद्यालयों से एमओयू की तैयारी

ग्वालियर. भारत और ताइवान के बीच शिक्षा, तकनीक, संस्कृति और उद्योग के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं को लेकर बुधवार को जीवाजी विश्वविद्यालय के टंडन सभागार में संगोष्ठी आयोजित की गई। जीवाजी विश्वविद्यालय और सिंधिया शोध केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारत-ताइवान: आर्थिक एवं सांस्कृतिक संबंध, एशिया के विशेष संदर्भ में’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में दोनों पक्षों के बीच बढ़ते शैक्षणिक और तकनीकी संपर्क, युवाओं के लिए अवसर तथा संस्थागत सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई। संगोष्ठी में ताइपेई आर्थिक एवं सांस्कृतिक केंद्र, दिल्ली के प्रतिनिधि डॉ. मूमिन चेन ने कहा कि चुनौतीपूर्ण भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद भारत और ताइवान के संबंध विभिन्न क्षेत्रों में विकसित हो रहे हैं। दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच शिक्षा, संस्कृति, भाषा और उद्योग के क्षेत्र में सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक आदान-प्रदान के साथ तकनीकी क्षेत्र में सहयोग को भी बढ़ाया जा सकता है। डॉ. चेन ने बताया कि भारत में चीनी भाषा के अध्यापन से जुड़े करीब 40 शिक्षक ताइवान से हैं। वहीं बड़ी संख्या में भारतीय विद्यार्थी प्रतिवर्ष ताइवान में इंटर्नशिप के लिए जाते हैं। उन्होंने ताइवान को मोबाइल चिप निर्माण का प्रमुख केंद्र बताते हुए सेमीकंडक्टर और तकनीकी क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि ऐसे क्षेत्रों में सहयोग से दोनों देशों के विद्यार्थियों और युवाओं को व्यावहारिक अनुभव तथा रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं।

प्राचीन सांस्कृतिक संपर्कों का भी उल्लेख

इंडिया फाउंडेशन, दिल्ली के कार्यकारी उपाध्यक्ष डॉ. आलोक बंसल ने कहा कि भारत-ताइवान संबंधों को केवल वर्तमान आर्थिक और तकनीकी संदर्भ में देखने के बजाय इनके ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पक्ष को भी समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्राचीन चीनी यात्रियों के भारत भ्रमण से भारतीय इतिहास और संस्कृति के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध होती है। उन्होंने ताइवान की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की युवा शक्ति को संभावनाओं से जोड़ते हुए कहा कि तकनीकी क्षेत्र में सहयोग से भारतीय युवाओं को नई तकनीकों को सीखने और आर्थिक विकास के नए अवसर तलाशने में मदद मिल सकती है।

ताइवान के विश्वविद्यालयों से एमओयू पर जोर

जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने कहा कि विश्वविद्यालय भविष्य में ताइवान के शैक्षणिक संस्थानों के साथ एमओयू की दिशा में काम कर सकता है। ऐसे समझौतों के माध्यम से विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए शैक्षणिक आदान-प्रदान, संयुक्त अध्ययन, भाषा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा अन्य अकादमिक गतिविधियों के अवसर विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने हिंदी पखवाड़े का उल्लेख करते हुए कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी देश की सांस्कृतिक विरासत को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। भारत और ताइवान के बीच शैक्षणिक संबंधों में भाषायी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को भी स्थान दिया जा सकता है।

विशेषज्ञों ने रखे सहयोग के विभिन्न आयाम

कार्यक्रम संयोजक एवं प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला के विभागाध्यक्ष डॉ. शांतिदेव सिसोदिया ने अतिथियों का स्वागत किया। वक्ताओं ने शिक्षा और शोध के साथ उद्योग, तकनीक, भाषा तथा सांस्कृतिक अध्ययन में संस्थागत सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई। संगोष्ठी का संचालन मुकुल शर्मा और ऐश्वर्या भार्गव ने किया। आभार कुलसचिव डॉ. राजीव कुमार मिश्रा ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में अरुणांश गोस्वामी सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।