7 जुलाई 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बार-बार जोड़ खिसकना और त्वचा का ज्यादा खिंचना! एनएचएस से जानें कैसे ब्लीडिंग का कारण बन सकता है Ehlers-Danlos Syndrome

Ehlers-Danlos Syndrome Cause: शरीर का जरूरत से ज्यादा लचीलापन किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है। जानिए NHS के अनुसार Ehlers-Danlos Syndrome (EDS) के रूप, जो मामूली जोड़ों के दर्द से लेकर जानलेवा अंदरूनी ब्लीडिंग तक का कारण बन सकते हैं।
3 min read
Google source verification

भारत

image

Nidhi Yadav

Jul 07, 2026

ehlers danlos syndrome types and symptoms,hypermobile eds joint pain fatigue,vascular eds rare genetic conditions,

शरीर का जरूरत से ज्यादा लचीलापन किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है- प्रतीकात्मक तस्वीर (Source- gemini)

Ehlers-Danlos Syndrome Symptoms: हम अक्सर उन लोगों को देखकर हैरान होते हैं जिनका शरीर बहुत ज्यादा लचीला होता है, जो अपने हाथ-पैरों को अजीब तरीके से मोड़ लेते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जरूरत से ज्यादा लचीलापन हमेशा सेहत की निशानी नहीं होता?

एनएचएस (National Health Service) के अनुसार, अगर किसी के जोड़ बार-बार अपनी जगह से खिसक जाते हैं (dislocate हो जाते हैं) या त्वचा बहुत ज्यादा खिंचती है, तो यह इहलर्स-डैनलोस सिंड्रोम (EDS) नाम की एक दुर्लभ बीमारी का संकेत हो सकता है। आइए एनएचएस और नेशनल हेडेक फाउंडेशन से जानते हैं कि ये किन रूपों में हमारे शरीर पर असर डालता है।

क्या है यह Ehlers-Danlos Syndromes (EDS)?

हमारे शरीर में एक खास तरह का प्रोटीन होता है जिसे कोलाजन (Collagen) कहते हैं। यह प्रोटीन हमारे शरीर के अलग-अलग हिस्सों जैसे त्वचा, जोड़ों (joints), नसों और अंगों को आपस में जोड़कर रखने और उन्हें मजबूती देने का काम करता है। EDS की बीमारी में शरीर का यह कोलाजन कमजोर हो जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि शरीर के अंग, टिश्यूज और जोड़ उतने मजबूत नहीं रह पाते जितने होने चाहिए। यह एक जेनेटिक यानी आनुवंशिक बीमारी है, जो माता-पिता से बच्चों में आ सकती है।

1. हाइपरमोबाइल EDS (hEDS): सबसे आम रूप, जो थका देता है

नेशनल हेडेक फाउंडेशन के अनुसार, यह इस बीमारी का सबसे कॉमन टाइप है। इसमें मरीज के जोड़ बहुत ढीले और अस्थिर होते हैं, जो मामूली झटके से भी अपनी जगह से खिसक (dislocate) जाते हैं। इसके मरीजों को जोड़ों में दर्द और कटकट की आवाज आने के साथ-साथ हर वक्त भारी थकान (fatigue) महसूस होती है। सिर्फ यही नहीं, इसका असर पेट पर भी पड़ता है जिससे सीने में जलन और कब्ज जैसी दिक्कतें होती हैं, और खड़े होने पर चक्कर आने की समस्या भी हो सकती है।

2. क्लासिकल EDS (cEDS): जब त्वचा हो जाती है बेहद नाजुक

यह रूप हाइपरमोबाइल जितना आम तो नहीं है, लेकिन यह सीधे आपकी स्किन को निशाना बनाता है। इसमें त्वचा बहुत ज्यादा खिंचने वाली (stretchy) और मखमली तो हो जाती है, पर साथ ही वह इतनी नाजुक हो जाती है कि माथे, घुटने या कोहनी पर से आसानी से फट सकती है। इसमें चोट लगने पर घाव बहुत धीरे-धीरे भरते हैं और त्वचा पर चौड़े निशान (scars) छोड़ जाते हैं।

3. वैस्कुलर EDS (vEDS): सबसे दुर्लभ रूप

इसे इस बीमारी का सबसे गंभीर रूप माना जाता है। इसका कारण यह है कि यह त्वचा या जोड़ों से ज्यादा हमारे शरीर की रक्त वाहिकाओं (blood vessels) और अंदरूनी अंगों को प्रभावित करता है। इसके कारण नसें या अंदरूनी अंग इतने कमजोर हो जाते हैं कि वे अचानक फट सकते हैं, जिससे शरीर के अंदर जानलेवा ब्लीडिंग हो सकती है। इसके मरीजों की त्वचा बहुत पतली होती है जिससे छाती और पैरों की नसें साफ दिखाई देती हैं। साथ ही, इनके चेहरे के फीचर्स भी थोड़े अलग (जैसे पतली नाक और होंठ, बड़ी आंखें) हो सकते हैं।

4. कायफोस्कोलियोटिक EDS (kEDS): रीढ़ की हड्डी पर वार

यह भी एक बेहद दुर्लभ रूप है। इसमें मरीज की रीढ़ की हड्डी में बचपन से ही टेढ़ापन (curvature) आने लगता है, जो उम्र बढ़ने के साथ और खराब हो जाता है। बचपन में मांसपेशियां बहुत कमजोर होती हैं, जिससे बच्चे के बैठने या चलने में देरी हो सकती है। इसके अलावा, यह आंखों को भी नाजुक बना देता है जिससे उन्हें आसानी से नुकसान पहुंच सकता है।

डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।