
Heart Attacks Rising : अब युवा भी हार्ट अटैक की चपेट में, 60% मरीज इलाज का खर्च नहीं उठा पाते। तनाव और महंगाई बढ़ा रही मुश्किलें। (फोटो सोर्स: AI image@Gemini)
Heart Attack in Young Indians : हार्ट अटैक को पहले ओल्ड आगे और सेवानिवृत्ति के बाद की बीमारी माना जाता था लेकिन अब यह 30 या 40 की उम्र में भी पड़ सकता है। और जब ऐसा होता है, तो यह केवल एक चिकित्सा आपात स्थिति नहीं, बल्कि एक वित्तीय आपात स्थिति होती है।
टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा देश भर के लगभग 300 हार्ट डिजीज विशेषज्ञों पर किए गए एक नए सर्वेक्षण से एक चिंताजनक बदलाव सामने आया है: चार में से तीन हार्ट डिजीज विशेषज्ञों का कहना है कि उनके अधिकांश हृदय रोगी अब 50 वर्ष से कम आयु के हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि 36% डॉक्टरों का कहना है कि 31 से 40 वर्ष के बीच के मरीज पहले से ही हृदय संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जिससे प्रारंभिक हार्ट डिजीज एक बढ़ता हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन गया है।
लेकिन आंकड़ों में एक और समान रूप से चिंताजनक पहलू है भारतीय लोग वित्तीय रूप से खतरनाक रूप से कम तैयार हैं।
लगभग 60% हार्ट डिजीज विशेषज्ञों का कहना है कि उनके 40% से भी कम मरीज उन्नत हार्ट ट्रीटमेंट का खर्च उठा सकते हैं, जिसकी लागत अक्सर निजी अस्पतालों में एंजियोप्लास्टी, स्टेंट लगाने या बाईपास सर्जरी के लिए 4 लाख से 15 लाख के बीच होती है।
भारत की हार्ट संबंधी चुनौती चिकित्सा और वित्तीय दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण है। युवा लोगों में बढ़ती हृदय संबंधी समस्याओं का मतलब है कि परिवार अक्सर भावनात्मक और आर्थिक दोनों ही दृष्टि से तैयार नहीं होते। पिछले पांच वर्षों में, हृदय रोग उपचार की लागत लगभग 65% बढ़ गई है। इसलिए व्यापक स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से वित्तीय तैयारी निवारक देखभाल जितनी ही महत्वपूर्ण है।
सर्वेक्षण के अनुसार, अब 38% डॉक्टर 41-50 वर्ष की आयु के बीच के मरीजों को देखते हैं, जबकि सिर्फ एक दशक पहले, हृदय रोग के 87% मामले 41 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को प्रभावित करते थे। यह बदलाव इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे लाइफ स्टाइल संबंधी बीमारियां, तनाव और निष्क्रिय कार्यशैली कामकाजी उम्र के भारतीयों में हृदय संबंधी जोखिम को बढ़ा रही हैं।
एक-तिहाई से ज्यादा (36%) हार्ट डिजीज विशेषज्ञ तनाव को हार्ट से संबंधी समस्याओं का सबसे बड़ा कारण मानते हैं, इसके बाद खराब डाइट और व्यायाम की कमी का स्थान आता है। इसके अलावा, लंबे काम के घंटे, खराब नींद और बढ़ता शहरी प्रदूषण भी है और भारत के युवा पेशेवर हार्ट डिजीज के लिए अनुकूल परिस्थितियों में रह रहे हैं।
सर्वेक्षण में पाया गया कि 78% हृदय रोग विशेषज्ञों का मानना है कि मरीज सीने में दर्द को नजरअंदाज कर देते हैं, अक्सर इसे एसिडिटी या थकान समझकर टाल देते हैं। कई लोग सांस लेने में तकलीफ या चक्कर आने को भी नजरअंदाज कर देते हैं - ये ऐसे लक्षण हैं जो शुरुआती हृदय तनाव का संकेत दे सकते हैं।
जब तक वे मदद मांगते हैं, तब तक 60% से ज्यादा मरीजों के दिल को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है, जिससे इलाज महंगा हो जाता है और नतीजे कम अनुकूल होते हैं।
हृदय संबंधी घटनाओं के लिए निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च आसानी से 10 लाख से ज्यादा हो सकता है, और लंबी अवधि की दवा या अनुवर्ती देखभाल के कारण आवर्ती खर्च बढ़ जाते हैं। फिर भी सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 10 में से 6 मरीजों के पास कोई स्वास्थ्य कवरेज नहीं है या उनकी बीमा सीमा अपर्याप्त है।
उदाहरण के लिए, 3-5 लाख की स्वास्थ्य पॉलिसी - जिसे कभी पर्याप्त माना जाता था आज एंजियोप्लास्टी या आईसीयू के खर्च को मुश्किल से ही कवर कर पाती है। बीमा सलाहकारों के अनुसार शहरी परिवारों के लिए अब कम से कम 10-15 लाख कवरेज वाली एक व्यापक पॉलिसी जरूरी है साथ ही गंभीर बीमारियों के लिए राइडर्स भी जरूरी हैं जो दिल के दौरे या बाईपास सर्जरी जैसी बड़ी बीमारियों के लिए एकमुश्त भुगतान प्रदान करते हैं।
टाटा एआईजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्डियोलॉजी के इलाज की लागत पिछले पांच वर्षों में 65% बढ़ गई है इसके कारणों में चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों की बढ़ती कीमतें, उन्नत उपचार तकनीकें और अस्पताल के बुनियादी ढांचे की बढ़ती लागत शामिल हैं।
साथ ही भारत में चिकित्सा मुद्रास्फीति का अनुमान सालाना 14-15% है, जो वैश्विक स्तर पर सबसे ज़्यादा है - यानी स्वास्थ्य खर्च हर पांच से छह साल में दोगुना हो जाता है। एक युवा परिवार के लिए, यह चिकित्सा योजना को वैकल्पिक नहीं बल्कि जरूरी बनाता है।
लगभग 34% हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि अब महिला रोगियों को पुरुषों के समान हृदय संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन 16% का कहना है कि महिलाओं के लक्षण - अक्सर हल्के, जैसे थकान या मतली - अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं या गलत निदान किया जाता है, जिससे इलाज में देरी होती है।
Updated on:
07 Oct 2025 11:48 am
Published on:
07 Oct 2025 11:48 am
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