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अगर आप भी महसूस करते हैं ये लक्षण तो हो जाइये सावधान, यह डिप्रेशन हो सकता है

विश्व स्वास्थय संगठन के अनुसार दुनिया भर में डिप्रेशन की बढ़ती दर बेहद चिंताजनक है। वर्तमान में डिप्रेशन के साथ रहने वाले 30 करोड़ (300 मिलियन) लोगों में से 50 प्रतिशत लोगों को सही इलाज ही नहीं मिल पाता। यहां तक कि सबसे विकसित देशों में भी स्थिती बहुत अच्छी नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि कोई व्यक्ति डिप्रेशन से गुज़र रहा है इस बात की पहचान कर पाना मुश्किल होता है।
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जयपुर

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Mohmad Imran

•

Updated: 29 Jul 2020, 1:59 PM IST

अगर आप भी महसूस करते हैं ये लक्षण तो हो जाइये सावधान, यह  डिप्रेशन हो सकता है

अगर आप भी महसूस करते हैं ये लक्षण तो हो जाइये सावधान, यह डिप्रेशन हो सकता है

भारत में डिप्रेशन के मरीज़ों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 से पता चलता है कि लगभग 15% भारतीय वयस्कों को एक या अधिक मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों पर जूझ रहे हैं। इतना ही नहीं प्रत्येक 20 में से एक भारतीय अवसाद के किसी न किसी प्रकार से ग्रस्त है। डिप्रेशन से दुनियाभर में अनगिनत लोगों पीड़ित है, इसलिये प्रारंभिक चेतावनी, संकेतों और सूक्ष्म लक्षणों के बारे में बात करना महत्वपूर्ण हो जाता है जो अधिकतर अनदेखा किया जाता हैं। डिप्रेशन के दौरान, सामाजिक तौर पर अलग होना बीमारी को और बढ़ाता है। इसलिए यह एक लक्षण है जिसे प्राथमिकता के आधार पर पहचानना चाहिये और इलाज किया जाना चाहिये। डिप्रेशन के सात संकेत यहां दिए गए हैं जिन्हें आपको कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए:

सोने का असामान्य पैटर्न
नींद के दौरान होने वाली कठिनाई डिप्रेशन का प्रारंभिक संकेत है। नींद में कठिनाई, रात के दौरान बेचैनी और सुबह उठने की इच्छा नही होना शांतिपूर्ण दिमाग के लिए रोडब्लॉक हैं। निराश मरीजों के बीच अनिद्रा बहुत आम है। कई मामलों से पता चलता है कि अनिद्रा वाले लोगों के पास अच्छी तरह सोते लोगों की तुलना में अवसाद होने की दस गुना संभावना होती है। इसलिए, किसी के नींद के पैटर्न पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

भ्रम और अनिश्चितता की स्थिति
हर कदम पर भ्रमित होने की प्रवृत्ति, धीमी सोच, और बार-बार भूलने भी डिप्रेशन के सूक्ष्म संकेत साबित हो सकते है। हालांकि यह सच है कि निर्णय लेने में असमर्थता एक सामान्य मानव विशेषता है, लेकिन कई बार यह चिंताजनक साबित हो सकती है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि कोई संज्ञानात्मक तरीके से कैसे काम कर रहा है। हालांकि कोई अवसाद के भी बिना अनिश्चित हो सकता है, फिर भी हर छोटी घटना पर अचानक निराशा हो जाना धीरे धीरे अवसाद का कारण बन सकता है।

लगातार उधेड़बुन में रहना और तनाव
अत्यधिक चिंता और अधिक सोचने हर समय कम आत्म-सम्मान का कारण बन सकता है। निरंतर तनाव के परिणामस्वरूप नकारात्मक दृष्टिकोण और आसपास के लोगों के प्रति प्रतिक्रिया के एक ऐसे भंवर में फंस जाता है। इस निरंतर निवास को अवसादग्रस्त रोमन कहा जाता है। यह लगातार होने की वजह से व्यक्ति अपने आप से प्रश्न पूछता है: “मैं ही क्यों?”, “मुझे इतना बुरा क्यों लगता है?”, “मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता?” “मैं इससे बेहतर क्यों नही हो सकता? ” “मुझ ही इस तरह से क्यों व्यवहार किया जाता है? ” आदि। इसलिए, अपने आप को शांत रखना जरूरी है और सोचना पर ज़ोर नही देना चाहिये।

सोशल दूरी बनाना और अभिव्यक्ति न कर पाना
यदि व्यक्ति, जो पहले अत्यधिक सामाजिक रहे हैं और किसी भी कामों से अपने आप को वापस खींचना शुरू करते हैं, यह एक तरह का अलार्म हैं। अलगाव और सामाजिक वापसी अत्यधिक आम अवसादग्रस्त लक्षण हैं। डिप्रेशन के दौरान, सामाजिक तौर पर अलग होना बीमारी को और बढ़ाता है। इसलिए यह एक लक्षण है जिसे प्राथमिकता के आधार पर पहचानना चाहिये और इलाज किया जाना चाहिये।

भूख न लगना और चिड़चिड़ापन
डिप्रेशन के दौरान भूख बढ़ जाती है या कम हो जाती है यह आम बात है। यह एक व्यक्ति से दूसरे में भिन्न होता है. जबकि कुछ का वजन कम होने लगता है और कुछ का बढ़ने लगता है। जबकि कुछ स्थितियों में कई लोग पूरी तरह से भोजन से परहेज करते हैं, अन्य लोग पूरे दिन कुछ खाते रहते हैं। खासतौर पर उन खाद्य पदार्थों पर जो चीनी और वसा में उच्च होते हैं।

लगातार स्वास्थ्य में गिरावट
डिप्रेशन सीधे तौर पर दर्द और स्वास्थ्य में गिरावट ला देता है। इन मामलों में, सिरदर्द, पेट या पीठ दर्द की जैसी कुछ शारीरिक बीमारियां सामने आती है। ये खराब मानसिक स्वास्थ्य के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। यहां समस्या यह है कि कुछ लोग केवल शारीरिक पीड़ा के लिए अपने डॉक्टर के पास जाते हैं और इसलिए डिप्रेशन का निदान कभी नहीं हो पाता है।

बेवजह गुस्सा आना
बिना किसी वैध कारण के अत्यधिक गुस्सा भी मानसिक स्वास्थ्य गिरने का एक बड़ा संकेत होता है। एक साथी, सहकर्मियों, परिवार और मित्र, या यहां तक कि अजनबियों में निरंतर स्नैपिंग भी एक संकेत है। चिड़चिड़ापन या क्रोध भी आधे से अधिक लोगों के लिए एक गंभीर और दीर्घकालिक अवसाद का सामना करने का एक लक्षण है। इसके अलावा, अनैच्छिक जिद्दीपर एक और संकेत है, जो वयस्कों और बच्चों दोनों में देखा जा सकता है।

सोशल मीडिया पर राहत ढूँढना
विशेष रूप से सोशल मीडिया अपडेट के लिए लगातार देखना, इस उम्र और समय में सामान्य चीज़ की तरह लग सकती है। यह एक प्रमुख नकारात्मक पक्ष है। बगैर रुके सोशल मीडिया में रहना एक कारण है जो अनियंत्रित डिप्रेशन को बढ़ाता है। आज के समय को ध्यान में रखते हुए, यह दिखाई देता है कि हर बार जब कोई चीज़ अपडेट होती है तो एक निश्चित स्थिती पैदा होती है। हर किसी के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि इन आदतों को सीमा में रखने में ही फायदा है और इससे चिंता को टाला जा सकता है।

आज के समय में युवा अपने बारे में बात करने में शर्मिंदगी महसूस नहीं करते है। हालांकि, अभी भी कुछ पहलुओं पर बात करने की आवश्यकता है और जब डिप्रेशन को काबू में करने की बात आती है तो भावनात्मक और मानसिक संकट के समय बात की जानी चाहिये। अवसाद को आज भी कई लोग एक तरह से गलत तौर पर देखते है और यही वजह है कि लोग इससे निपटने की कोशिश नही करते है। हम सभी दूसरों के बारे में अपना राय जल्दी बनाते है। इसलिये यह जरुरी है कि हम एक दूसरे की मदद करें क्योंकि वार्तालाप मदद करता है और स्थिती को सुधारता है।

डिस्क्लेमर
इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ओपिनियन का विकल्प नहीं है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे कोई भी दवा, उपचार या नुस्खा अपनी मर्जी से ना आजमाएं। इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

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