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Wada Test क्या है और क्यों किया जाता है? एपिलेप्सी फाउंडेशन से जानें

Wada Test For Epilepsy: क्या है वाडा टेस्ट (Wada Test)? क्लीवलैंड क्लिनिक और एपिलेप्सी फाउंडेशन (Epilepsy Foundation) से जानिए ब्रेन सर्जरी और मिर्गी के इलाज से पहले क्यों जरूरी है यह टेस्ट, कैसे जांचता है याददाश्त और बोलने की क्षमता।
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भारत

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Nidhi Yadav

•

Updated: 7 Sep 2026, 2:00 PM IST

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Wada Test क्यों किया जाता है- प्रतीकात्मक तस्वीर (Source- Freepik)

Wada Test For Epilepsy Hindi: जब किसी मरीज को दवाइयों से मिर्गी (Epilepsy) या दौरों पर आराम नहीं मिलता, तो डॉक्टर अक्सर दिमाग की सर्जरी (Brain Surgery) का सुझाव देते हैं। लेकिन दिमाग शरीर का सबसे नाजुक और अहम हिस्सा है। एपिलेप्सी फाउंडेशन (Epilepsy Foundation) के अनुसार,हमारी याददाश्त, सोचने की क्षमता और बोलने की ताकत सब दिमाग के अलग-अलग हिस्सों से कंट्रोल होती है। ऐसे में सर्जरी करने से पहले डॉक्टरों को यह पक्का करना होता है कि ऑपरेशन के बाद मरीज की बोली या याददाश्त पर कोई बुरा असर न पड़े। इसी खास काम के लिए डॉक्टर वाडा टेस्ट (Wada Test) करते हैं। यह एक ऐसा स्पेशल टेस्ट है जो दिमाग के काम करने के तरीके को बेहद बारीकी से समझता है। आइए जानते हैं कि वाडा टेस्ट आखिर क्या है, यह कैसे किया जाता है और सर्जरी से पहले इसका होना क्यों इतना जरूरी है।

वाडा टेस्ट (Wada Test) आखिर क्या है?

क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, वाडा टेस्ट दिमाग के एक हिस्से (हेमीस्फीयर) को कुछ मिनटों के लिए सुलाने या शांत करने का टेस्ट है। हमारा दिमाग दो हिस्सों में बंटा होता है दायां (Right) और बायां (Left)। आमतौर पर ज्यादातर लोगों में बोलने की क्षमता (Language) दिमाग के बाएं हिस्से में होती है, जबकि याददाश्त (Memory) दोनों हिस्सों में बंटी होती है। वाडा टेस्ट के जरिए डॉक्टर बारी-बारी से दिमाग के एक हिस्से को कुछ देर के लिए सुला देते हैं और फिर दूसरे हिस्से का टेस्ट लेते हैं कि वह अकेले कितना काम कर पा रहा है। इसे मेडिकल भाषा में इंट्राकैरोटिड सोडियम एमोबार्बिटल प्रोसीजर (Intracarotid Sodium Amobarbital Procedure) भी कहा जाता है।

यह टेस्ट क्यों किया जाता है?

वाडा टेस्ट का सबसे बड़ा मकसद मरीज को सर्जरी के बाद होने वाले नुकसान से बचाना है। यह टेस्ट दो मुख्य बातें पता लगाने के लिए किया जाता है;

  • मरीज के बोलने और भाषा समझने की ताकत दिमाग के किस हिस्से में ज्यादा मजबूत है।
  • याददाश्त की जांच (Memory Test)।

कैसे होता है वाडा टेस्ट?

बहुत से लोग सोचते हैं कि दिमाग का टेस्ट है तो बहुत दर्दनाक होगा, लेकिन यह प्रक्रिया काफी सुरक्षित तरीके से की जाती है;

  • एंजियोग्राफी की तरह शुरुआत- सबसे पहले जांघ (Groin) के पास एक छोटी सी सुई से खून की नली में पतली ट्यूब (कैथेटर) डाली जाती है, जो गले के रास्ते दिमाग तक पहुंचती है।
  • दिमाग के एक हिस्से को सुलाना- कैथेटर के जरिए एक खास तरह की दवा (जैसे एमोबार्बिटल या एटोमिडेट) डाली जाती है। यह दवा दिमाग के सिर्फ एक हिस्से को 3 से 5 मिनट के लिए सुला देती है।
  • शरीर में असर दिखना- जैसे ही दिमाग का एक हिस्सा सोता है, शरीर के उलटे तरफ का हाथ और पैर कुछ देर के लिए ढीला पड़ जाता है या काम करना बंद कर देता है (उदाहरण के लिए, बायां दिमाग सोने पर दायां हाथ ढीला पड़ जाएगा)।
  • डॉक्टर लेते हैं टेस्ट- जब दिमाग का एक हिस्सा सोया होता है, तब डॉक्टर मरीज से कुछ सवाल पूछते हैं, तस्वीरें दिखाते हैं, शब्द बोलने को कहते हैं और कुछ चीजें याद रखने को कहते हैं।
  • दूसरे हिस्से का टेस्ट- जब दवा का असर खत्म हो जाता है और हाथ-पैर सामान्य हो जाते हैं, तो ठीक यही प्रक्रिया दिमाग के दूसरे हिस्से के साथ दोहराई जाती है।

टेस्ट के दौरान और बाद में क्या ध्यान रखना होता है?

यह टेस्ट अस्पताल में ही न्यूरोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट की देखरेख में किया जाता है। टेस्ट के बाद मरीज को कुछ घंटों तक आराम करने की सलाह दी जाती है ताकि जिस जगह से ट्यूब डाली गई थी, वहां खून का थक्का सही से जम सके। यह टेस्ट पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है, हालांकि किसी भी मेडिकल प्रोसीजर की तरह इसमें भी हल्की-फुल्की घबराहट या थकावट महसूस हो सकती है।

डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ओपिनियन का विकल्प नहीं है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे कोई भी दवा, उपचार या नुस्खा अपनी मर्जी से ना आजमाएं। इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

डिस्क्लेमर
इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ओपिनियन का विकल्प नहीं है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे कोई भी दवा, उपचार या नुस्खा अपनी मर्जी से ना आजमाएं। इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

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