
कपालभाति योग के हैं कई फायदे, PC- IANS
योग को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। नियमित योगाभ्यास से तनाव कम करने, श्वसन क्रिया बेहतर बनाने और शरीर को सक्रिय रखने में मदद मिल सकती है। योग की प्रमुख शुद्धिकरण क्रियाओं में कपालभाति का विशेष स्थान है। इसे अक्सर प्राणायाम कहा जाता है, हालांकि पारंपरिक योग में इसकी गणना षट्कर्म यानी शरीर की छह शुद्धिकरण क्रियाओं में होती है। कपालभाति के तीन पारंपरिक प्रकार बताए जाते हैं—वातक्रम, व्युत्क्रम और शीतक्रम। इनका संबंध श्वसन अभ्यास और नासिका मार्ग की सफाई से है। हालांकि, इनके सभी पारंपरिक स्वास्थ्य लाभ आधुनिक चिकित्सा अनुसंधान से प्रमाणित नहीं हुए हैं।
कपालभाति दो संस्कृत शब्दों 'कपाल' और 'भाति' से मिलकर बना है। कपाल का अर्थ सिर या खोपड़ी और भाति का अर्थ चमकना होता है। योग परंपरा में इसे सिर और श्वसन मार्ग की शुद्धि से जुड़ी क्रिया माना जाता है। इसके सबसे प्रचलित रूप में पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करते हुए सांस को तेजी से बाहर छोड़ा जाता है, जबकि सांस अपने आप भीतर आती है। आयुष मंत्रालय से संबद्ध मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान के अनुसार, यह अभ्यास श्वसन मार्ग की सफाई और पाचन अंगों की सक्रियता से जुड़ा है।
वातक्रम कपालभाति इसका सबसे प्रचलित रूप है। इसमें व्यक्ति आरामदायक स्थिति में रीढ़ सीधी रखकर बैठता है और पेट की मांसपेशियों को संकुचित करते हुए नाक से सांस बाहर छोड़ता है। सांस भीतर लेने के लिए अतिरिक्त जोर नहीं लगाया जाता। प्रत्येक सक्रिय श्वास छोड़ने के बाद सांस स्वाभाविक रूप से भीतर आती है। पारंपरिक योग ग्रंथों में इसे कफ संबंधी समस्याओं और पाचन क्रिया के लिए उपयोगी बताया गया है। कुछ अध्ययनों में श्वसन अभ्यासों से फेफड़ों की कार्यक्षमता और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े संकेतकों में सुधार देखा गया है। हालांकि, कपालभाति से अस्थमा, साइनोसाइटिस या अन्य बीमारियां ठीक होने का निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
व्युत्क्रम कपालभाति जल-आधारित पारंपरिक शुद्धिकरण तकनीक है। इसमें गुनगुने नमकयुक्त पानी को नासिका मार्ग से भीतर लेकर मुंह के रास्ते बाहर निकाला जाता है। योग परंपरा में इसका उद्देश्य नाक और ऊपरी श्वसन मार्ग की सफाई करना बताया गया है। चिकित्सा अनुसंधान के अनुसार, सुरक्षित तरीके से किए जाने वाले सामान्य सलाइन नेजल इरिगेशन से नाक में जमा बलगम और एलर्जी पैदा करने वाले कणों को हटाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, सामान्य नेजल इरिगेशन पर उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों को सीधे व्युत्क्रम कपालभाति के लाभों का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह तकनीक सामान्य नाक की धुलाई से अलग और अधिक जटिल है।
शीतक्रम कपालभाति व्युत्क्रम कपालभाति के विपरीत की जाने वाली पारंपरिक क्रिया है। इसमें पानी मुंह में लेकर नासिका मार्ग से बाहर निकालने का अभ्यास किया जाता है। योगिक मान्यताओं के अनुसार, इसका उद्देश्य नाक और सिर से संबंधित कफ की सफाई करना है।
पारंपरिक विवरणों में इसे चेहरे की चमक और त्वचा के स्वास्थ्य से भी जोड़ा जाता है। हालांकि, झुर्रियां कम करने, त्वचा में चमक बढ़ाने या श्वसन रोगों को समाप्त करने संबंधी दावों के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए शीतक्रम कपालभाति को सौंदर्य उपचार या किसी बीमारी के इलाज का विकल्प नहीं समझना चाहिए।
सर्दी-जुकाम और साइनस संबंधी समस्याओं में नासिका मार्ग की सफाई से कुछ लोगों को राहत मिल सकती है। अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के अनुसार, सामान्य सलाइन नेजल इरिगेशन पुरानी साइनस संबंधी समस्याओं में उपयोगी हो सकता है। तीव्र श्वसन संक्रमण के लक्षणों में भी कुछ राहत संभव है, हालांकि इसके प्रमाण निर्णायक नहीं हैं। विशेषज्ञ नाक की धुलाई के लिए केवल स्टेराइल, डिस्टिल्ड या उबालकर ठंडा किया हुआ पानी इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। बिना उपचार किए नल के पानी से गंभीर संक्रमण का खतरा हो सकता है।
कपालभाति को पारंपरिक रूप से पाचन और पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करने वाला अभ्यास माना जाता है। कुछ छोटे अध्ययनों में योग और प्राणायाम के स्वास्थ्य संबंधी लाभों के संकेत मिले हैं। हालांकि, केवल कपालभाति से ब्लड शुगर नियंत्रित होने, मोटापा घटने या डायबिटीज का उपचार होने के पर्याप्त उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाण नहीं हैं। वर्ष 2025 में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा में भी कपालभाति के श्वसन और तंत्रिका तंत्र संबंधी प्रभावों को लेकर अधिक विश्वसनीय अध्ययन की आवश्यकता बताई गई। डायबिटीज के मरीजों को योगाभ्यास के साथ चिकित्सक की निर्धारित दवाएं, खानपान और नियमित जांच जारी रखनी चाहिए।
आयुष मंत्रालय के सामान्य योग प्रोटोकॉल के अनुसार, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, चक्कर आने, मिर्गी, हर्निया, पेट के अल्सर और स्ट्रोक जैसी स्थितियों में तेज गति वाला कपालभाति अभ्यास नहीं करना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान भी इस अभ्यास से बचने की सलाह दी गई है। वहीं, व्युत्क्रम और शीतक्रम जैसी जल-आधारित क्रियाएं प्रशिक्षित विशेषज्ञ की देखरेख के बिना नहीं करनी चाहिए। गलत तरीके से पानी नाक में जाने पर संक्रमण और अन्य जटिलताओं का खतरा हो सकता है। किसी भी श्वसन संबंधी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को अभ्यास शुरू करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
Updated on:
2 Nov 2026, 3:25 PM IST
Published on:
2 Nov 2026, 3:25 PM IST
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