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जबलपुर। सुरक्षा के लिहाज से इस समय वॉटरप्रूफ और फायरप्रूफ जैकेट चलन में हैं। बुलेटप्रूफ गाडिय़ां भी मार्केट में हैं। इनकी पहुंच चंद रसूखदार और रुतबेदार लोगों तक ही है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में सदियों पहले फायरप्रूफ टेक्नोलॉजी आ चुकी थी। होलिका और इसके बाद प्रह्लाद इसका उदाहरण हैं। बुरी नीयत के कारण होलिका तो फिर भी जल ही गई, लेकिन प्रहलाद आग में बैठकर भी सुरक्षित रहे। प्रहलाद का बचना और इसके पहले आग में होलिका का नहीं जलना, इस बात का प्रमाण है कि वह फायरप्रूफ तकनीकी की जानकार थी। यही कहा सकता है कि जलने के बाद वह फायरप्रूफ लेडी का अपना तमगा, प्रह्लाद को दे गई। होली का मौका है आइए आपको बताते हैं होलिका से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
रोचक है कहानी
प्राचीन काल में हुए अत्याचारी राक्षस राजा हिरण्यकशिपु की कहानी तो सभी जानते हैं। वह भगवान विष्णु से इस हद तक नफरत करता था कि विष्णु का नाम लेने वालों को भी मृत्यदंड की सजा सुना देता था। उसने अपने खुद के बेटे प्रह्लाद को भी यही सजा सुनाई। पहले उसने प्रह्लाद को जंगली जानवरों के आगे फेंक दिया, उसे पहाड़ी से नीचे फिंकवाया, लेकिन जब भक्त प्रहलाद जीवित बच गए तो उसने प्रह्लाद को मारने का जिम्मा अपनी बहन होलिका को सौंपा।
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ये था वरदान
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार होलिका ने ब्रम्हाजी की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर ब्रम्हाजी ने उसे वरदान दिया कि आग होलिका को जला नहीं सकती। एक तरह से वह फायरप्रूफ हो गई। अपने फायरप्रूफ होने की आजमाईश के लिए वह कई बार आग से खेलती थी। दुश्मनों पर आग के गोले बरसाती थी। हिरण्यकशिपुर अपनी बहन की यह खासियत जानता था। उसने बहन को फरमान सुनाया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए। इससे प्रहलाद जल जाएगा और होलिका सुरक्षित बच जाएगी।
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होलिका ने ये किया
शास्त्रों के जानकार पं. अखिलेश त्रिपाठी व प्रकाश दत्त शास्त्र अनुसार भाई के निर्देश पर होलिका ने भक्त प्रह्लाद को बहलाया, फुसलाया। लकड़ी और कंडों का ऊंचा आसन बनवाया और फाल्गुन शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को वह प्रह्लाद को लेकर व चादर ओढ़कर इसी आसन पर बैठ गई। हिरण्यकशिपु के आदेश पर सैनिकों ने होलिका के आसन पर आग लगा दी। आसन धू-धू कर जलने लगा। पर यह क्या... तेज लपटों में चीखते हुए होलिका खुद जल गई और भक्त प्रह्लाद वैसे ही मुस्कुराते बैठे रह गए। प्रह्लाद के सकुशल बचने की खुशी में लोगों ने अबीर, गुलाल उड़ाया। रंग बरसाए और इसी समय से होलिका दहन का पर्व मनाया जाने लगा। होली के दिन आज भी हर वर्ष प्रह्लाद को होलिका की गोद में बैठाया जाता है। आग में भी प्रह्लाद के जीवित बचने की खुशियां मनाने की तैयारियां इस बार भी खूब चल रही है।
भाई को भी था वरदान
पौराणिक कथाओं के अनुसार तत्कालीन राक्षसराज हिरण्यकशिापु ने भी तपस्या करके ब्रह्मा से वरदान पा लिया कि संसार का कोई भी जीव-जन्तु, देवी-देवता, राक्षस या मनुष्य उसे न मार सके। न ही वह रात में मरे, न दिन में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न घर में, न बाहर। यहां तक कि कोई शस्त्र भी उसे न मार पाए। यह वरदान पाकर वह निरंकुश हो गया। एक दिन उसने स्वयं भक्त प्रहलाद को मारने के लिए तलवार उठाई। उसकी तलवार को प्रहार इतना तेज था कि महल में लगा खंभा चूर-चूर हो गया। इसी खंभे से भगवान विष्णु नृसिंह के अवतार में प्रकट हुए और अंतत: अत्याचारी हिरण्यकशिपु का संहार कर दिया।
फायरप्रूफ थी चादर
मान्यता है कि तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रम्हाजी ने होलिका को एक चादर दी थी। इस चादर को ओढऩे से आग का प्रभाव नहीं पड़ता था। होलिका यही चादर ओढ़कर भक्त प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी। प्रभु-कृपा से वह चादर हवा में उड़कर बालक प्रह्लाद पर जा पड़ी और चादर न होने पर होलिका जल कर वहीं भस्म हो गई। इस प्रकार प्रभु भक्त प्रह्लाद को मारने के प्रयास में होलिका की मृत्यु हो गई। प्रह्लाद को फायरप्रूफ की विधा यानी चादर सौगात में मिल गई। विद्वानों का मानना है कि उस समय में होलिका के पास मौजूद चादर वास्तव में आज के युग की फायरप्रूफ जैकेट जैसी ही गुणवत्ता की थी। इसलिए उस पर आग को कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता था।
युद्ध कला में थी माहिर
ज्योतिषाचार्य पं. जनार्दन शुक्ल का कहना है कि होलिका बेहद पराक्रमी थी। आग में नहीं जलने का वरदान पाने के बाद उसने कई लड़ाईयों में हिस्सा लिया। वह अस्त्र-शस्त्र चलाने में पारंगत तो थी है, आग से मुकाबला करने की विशेष खासियत की वजह से हिरण्य कशिपु उसे हमेशा युद्ध में रखता था। वह शत्रु की सेना पर भारी पड़ती थी। विपक्षी सेना के बीच घुसकर वह अग्नि यंत्र चलाती थी। इसके कारण सैनिक या तो मैदान छोड़कर भाग जाते थे, या फिर जल कर भस्म हो जाते थे।
Published on:
28 Feb 2018 02:49 pm
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