2 अक्टूबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

60 पार उम्र में भी 18 की सोच रखता हूं: डॉ. सत्यनारायण

झालाना स्थित राजस्थान पत्रिका कार्यालय आए बिहारी पुरस्कार विजेता
2 min read
Google source verification
Jaipur News

जयपुर . शाहपुरा के पास एक छोटी सी ढाणी में जन्म हुआ था। वहां पढ़ाई का कोई खास माहौल नहीं था। पढ़ाई के लिए 10 किलोमीटर दूर जाने लगा, वहां साथी दोस्तों को पढ़ते देख आगे पढऩे की इच्छा हुई। यहां तक साहित्य में रुझान नहीं हुआ था, जब कॉलेज में लेट एडमिशन हुआ और वहां कोई दोस्त नहीं बना, तो अकेलेपन को दूर करने के लिए लाइब्रेरी जाने लगा। यहां पहली बार फणीश्वर नाथ रेणु की 'मेला आंचल' पढ़ी। यहां से साहित्यिक रूचि विकसित होने लगी और कविताओं, कहानियों से दिल लगने लगा। यह कहना है, बिहारी पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार डॉ. सत्यनारायण का। झालाना स्थित राजस्थान पत्रिका कार्यालय आए डॉ. सत्यनारायण ने कहा कि ग्रेजुएशन के आखिरी साल निर्मल वर्मा की कविता को पढ़ा और यहां से नए-नए विषयों पर आधारित साहित्य को पढऩे लगा।

गांव की घटनाएं, शहर के चरित्र

उन्होंने बताया कि देश-दुनिया के नामचीन कहानीकारों की कहानियों को पढऩा सबसे ज्यादा पसंद था, इसी के चलते कहानी लिखने की भी ठानी। गांव की घटनाओं के साथ शहर के चरित्र लेकर कहानियां गढऩे लगा। 1978 में पहली कहानी 'कंधों पर लाश' पत्रिका में प्रकाशित हुई और इस पर पाठकों से लेकर साहित्यकारों की जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। यहां से कहानी लिखने की परम्परा शुरू हो गई। इसके बाद डायरी, रिपोर्ताज और कविताएं लिखने लगा। हालही में रिपोर्ताज 'यह एक दुनिया' के लिए बिहारी पुरस्कार मिला है, यह सामान्य जनजीवन पर आधारित है। इस सम्मान का मिलना जीवन के लिए यादगार है।

कविता से ज्यादा कहानी को तवज्जो

डॉ. सत्यनारायण ने कहा कि यह सही है कि हमेशा से ही कविता के बजाए लोग कहानियों से ज्यादा कनेक्ट करते हैं। कहानी में पाठकों को लगता है कि इसमें उनके आस-पास की घटनाओं को शामिल किया गया है। फिल्मों में अलग तरह की कहानियों को शामिल किया जाता है, कहा जाए तो अभी तक फिल्मों में साहित्य सही तरह से समाया नहीं है। कुछ एक फिल्मकार, कहानीकारों की कहानियों पर फिल्म बनाते हैं, लेकिन यह परम्परा पूर्णतया: शुद्ध नहीं हुई है। फिल्मों की अपनी तकनीक मुहावरा है, जहां साहित्यकारों की कहानियां फिट नहीं बैठतीं। इसलिए कई फिल्में इतर नजर आती हैं।

एकेडमिक्स का मिला फायदा

उन्होंने बताया कि साहित्य और पत्रकारिता को पढ़ाने का मौका मिला। जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर साहित्य पर स्टूडेंट्स से चर्चा करने का मौका मिला। स्टूडेंट्स से साहित्य पर संवाद करना हमेशा आनंददायक रहा है। पुराने पाठ्यक्रम में आधुनिक साहित्यकारों का समावेश करवाया है, ताकि स्टूडेंट्स को वर्तमान की साहित्य सामग्री उपलब्ध होती रहे। उन्होंने बताया कि रिटायरमेंट के बाद कविताएं लिखना शुरू कर दी हैं और यह 60 पार व्यक्ति की सोच को दर्शाती है। मैं 60 साल पार कर चुका हूं और अभी मेरी सोच 18 साल के नवयुवक की तरह है, जिसे लोग जल्द कविता संग्रह '60 पार' में पढ़ सकेंगे।

बड़ी खबरें

View All

जयपुर

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग