
Ministers were the culprits in the Congress government - Vasundhara
- तिवाड़ी ने की मांग, कहा- मुख्यमंत्री खाली करेंगे १३ नम्बर बंगला
-पूर्व मुख्यमंत्रियों को सुविधा मामले में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे मिले हुए हैं
- दीनदयाल वाहिनी आज सिविल लाइंस फाटक पर गुरुवार को करेगी प्रदर्शन
जयपुर। दीनदयाल वाहिनी के प्रदेश अध्यक्ष व सांगानेर विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को नैतिकता के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की पालना करते हुए तुरंत सरकारी बंगलों को खाली करना चाहिए। राजस्थान में मुख्यमंत्री दो सरकारी बंगलों का उपयोग कर रही है। नैतिकता के आधार पर उन्हें १३ नम्बर बंगला खाली करना चाहिए, पूर्व मुख्यमंत्री के आधार पर उनको यह बंगला आवंटित किया गया। दीनदयाल वाहिनी गुरुवार को सिविल लाइंस फाटक पर इस मामले में प्रदर्शन करेगी। यदि मुख्यमंत्र बंगला खाली नहीं करेगी तो पूरे राज्य में प्रदर्शन किए जाएंगे। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब उनका भाजपा से कोई लेना देना नहीं है। भाजपा ने नोटिस तो दे ही रखा है, जो कार्रवाई करनी है कर ले।
तिवाड़ी ने बुधवार को अपने निवास पर पत्रकारों से कहा कि उत्तर प्रदेश मिनिस्टर्स एक्ट 1981 की धारा 4;3 को सुप्रीम कोर्ट ने को रद्द कर दिया। इसमें पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगला देने का प्रावधान था। बैंच ने उत्तर प्रदेश सरकार के कानून को रद्द करते हुए कहा कानून समानता के मौलिक अधिकार के खिलाफ है और मनमाना है। राजस्थान में इसी विधेयक की नकल करते हुए मंत्री वेतन विधेयक 2017 लाया गया था जो कि उक्त विधेयक से भी ज्यादा असंवैधानिक और मनमाना है। इस बिल में धारा 7.खख के अनुसार सरकारी बंगले के साथ ही अन्य सुविधाओं का आजीवन प्रबंध किया गया। इस के साथ ही 13 नंबर बंगले को पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से तथा 8 नंबर बंगले को वर्तमान मुख्यमंत्री की हैसियत से काम में लिया जा रहा है ताकि चुनाव हारने पर 13 नंबर बंगला बना रहे। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को दी जा रही सुविधाओं की वजह से हर माह डेढ से दो करोड़ रुपए सरकार पर अनावश्यक भार पड़ रहा है।
तिवाड़ी ने कहा कि राजस्थान विधानसभा में जब इस असंवैधानिक विधेयक का विरोध करने के बावजूद कोई ध्यान नहीं दिया गया तो राज्यपाल से समय मांगा लेकिन उन्होंने भी मुझे समय नहीं दिया। मजबूरन विधेयक पर हस्ताक्षर न करने के लिए राज्यपाल को पत्र लिखा। लेकिन दूसरे ही दिन राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को राजभवन में खाना खिलाकर और उस विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए। क्योंकि राज्यपाल स्वयं लखनऊ में इस सुविधा का उपभोग कर रहे हैं। वे नहीं चाहते थे कि कोई इस विधेयक का विरोध करें।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने भी इस विधेयक का विरोध नहीं किया। जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सरकारी बंगले का प्रावधान किया था तो मैंने उसका विरोध किया था, लेकिन उन्होंने कहा कि गुलाब चंद कटारिया कहेंगे तो लागू नहीं करूंगा। कटारिया ने इसका विरोध नहीं किया और उन्होंने मौन साध लिया। राजेंद्र राठौड़ ने बीच में उठकर कहा कि हमें इस पर कोई आपत्ति नहीं है। तब भी मैंने कहा था कि ये सब आगे की तैयारियां हो रही है जो कि आज हम सबकी आंखों के सामने है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मिलीभगत है।
मेरा भाजपा से कोई लेना देना नहीं
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अब उनका भाजपा से कोई लेना नहीं नहीं है। भाजपा ने नोटिस तो दे ही रखा है, आगे जो कार्रवाई करनी है खुद कर ले। वे बस अब तकनीकी रूप से भाजपा के विधायक रह गए हैं। प्रदेश अध्यक्ष के सवाल पर उन्होंने कहा कि पार्टी आलाकमान हमेशा आंख दिखाता है और उसके बाद मुख्यमंत्री की बात मान कर नेताओं का अपमान करवाता है। पहले जसवंत सिंह, भैरों सिंह शेखावत के मामले में भी हो चुका है और अब गजेन्द्र सिंह शेखावत के मामले में भी एेसा ही होता नजर आ रहा है। राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष कोई है ही नहीं। मुख्यमंत्री खुद ही प्रदेश अध्यक्ष है।
Published on:
09 May 2018 06:28 pm
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