
आतंकी सरवर और शाहबाज (पत्रिका फोटो)
Jaipur Serial Bomb Blast: सुप्रीम कोर्ट ने साल 2008 के जयपुर सीरियल बम धमाका मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकी मोहम्मद सरवर आजमी उर्फ ढिल्ला पप्पू और शाहबाज अहमद की रिहाई से इनकार कर दिया है। इस बीच कोर्ट ने कहा कि मामला गंभीर है, इसे किसी सामान्य जमानत मामले की तरह नहीं देखा जा सकता। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और जनता की सुरक्षा को खतरे का विषय शामिल है।
न्यायाधीश एमएम सुंदरेश और न्यायाधीश प्रसन्ना वी वराले की पीठ ने सोमवार को दोनों आतंकी की अपील खारिज करते हुए यह आदेश दिया। इससे अपील पर सुनवाई के दौरान रिहाई से इनकार करने के हाईकोर्ट के आदेश पर दोनों को राहत नहीं मिल पाई। यह मामला चांदपोल बाजार में मिले जिंदा बम से जुड़ा है। तथ्यों के अनुसार, 13 मई 2008 को जयपुर में नौ जगह बम लगाए, जिनमें से 8 फट गए और एक जिंदा रह गया। विस्फोट में 70 लोगों की मौत हो गई, करीब 186 घायल हुए थे।
13 मई 2008 की वह खौफनाक शाम आज भी जयपुरवासियों के जेहन में ताजा है। शहर में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में 70 बेगुनाहों की मौत हुई थी और 185 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। उस भयावह मंजर के बीच यदि एक और नौवां बम समय रहते निष्क्रिय न किया जाता, तो मौतों का यह आंकड़ा और भी भयावह हो सकता था।
जिंदा बम को निष्प्रभावी करने वाले बम निरोधक दस्ते (बीडीएस) के सदस्य सुनील भाटिया ने बताया कि बम चांदपोल में सीतारामजी मंदिर के सामने बेहद व्यस्त और भीड़भाड़ वाले इलाके में रखा गया था। इसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि अधिक से अधिक जनहानि हो। यदि वह बम फट जाता तो कम से कम 20 से 25 लोगों की और जान चली जाती।
परकोटे के प्रमुख बाजारों में एक के बाद एक आठ धमाके हुए थे। एक तरफ पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां घायलों को संभालने और साक्ष्य जुटाने में व्यस्त थीं। वहीं, दूसरी तरफ जिंदा बम की सूचना मिलते ही बीडीएस टीम ने मौके पर पहुंचकर सूझबूझ के साथ उसे निष्क्रिय किया और एक बड़ी तबाही को रोक लिया।
आरोपियों को सजा सुनाए जाने के दौरान अदालत में कई पीड़ित मौजूद थे। अदालत में फैसला सुनते ही पीड़िता रमा देवी की आंखों से आंसू छलक पड़े थे। सुप्रीम कोर्ट की ओर से जिंदा बम मिलने के मामले में दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाने पर पीड़ित परिवारों ने इसे न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना है। 18 साल बाद आए इस फैसले ने जहां एक ओर पीड़ितों के पुराने जख्म ताजा कर दिए, वहीं दूसरी ओर चांदपोल में मिले बम को निष्क्रिय करना आज भी बीडीएस टीम के साहस की गवाही देता है।
अपीलार्थियों के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इसी घटनाक्रम से जुड़े अन्य आठ मामलों में राजस्थान हाईकोर्ट आजमी को पहले ही बरी कर चुका है। चूंकि सभी नौ बम एक ही आपराधिक साजिश का हिस्सा थे, इसलिए जब आठ मामलों में उसे निर्दोष माना जा चुका है, तो इस मामले में भी उसे हिरासत में रखना अनुचित है। इसके अतिरिक्त, उसने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसे गिरफ्तार करने और चार्जशीट दाखिल करने में 12 साल का लंबा समय लगाया गया। वह पूर्व में ही 15 साल से अधिक की जेल काट चुका है।
राज्य सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा ने कहा कि नौवें बम का यह मामला अन्य आठ मामलों से पूरी तरह भिन्न है। इसमें बरामद जिंदा बम और साक्ष्य शामिल हैं। एक दुकानदार ने आजमी की पहचान की है, जिसने उसे वह साइकिल बेची थी, जिसका उपयोग बम ले जाने के लिए किया गया था।
एएजी ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के पूर्व में दिए गए बरी के आदेशों के खिलाफ राज्य सरकार की अपीलें सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं, इसलिए उनका लाभ आरोपी को नहीं दिया जा सकता। देरी के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि विलंब से हुई गिरफ्तारी का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि मामला झूठा है।
साल 2025 में विशेष अदालत ने मोहम्मद सरवर आजमी, शाहबाज अहमद और अन्य को नौवां बम लगाने की साजिश में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद दोनों ने अपनी सजा के निलंबन के लिए राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन हाईकोर्ट की ओर से याचिका खारिज किए जाने के बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
Updated on:
08 Sept 2026 07:43 am
Published on:
08 Sept 2026 07:43 am
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