
राजस्थान में 130 में से 43 महिलाएं 2 से 9 बार बनीं विधायक (फोटो पत्रिका नेटवर्क)
Women Reservation Reality in Rajasthan: राजस्थान की लोकतांत्रिक यात्रा के सात दशकों का इतिहास एक विरोधाभास पेश करता है। जहां एक ओर चुनावी उत्सव में महिलाओं की भागीदारी और मतदान प्रतिशत पुरुषों को पछाड़ रहा है। वहीं, सत्ता के गलियारों और नीति-निर्धारण वाले पदों पर उनका प्रतिनिधित्व अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पर जारी देशव्यापी बहस के बीच राजस्थान के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश की 200 विधानसभा सीटों के लिए 74 साल के इतिहास में अब तक केवल 130 महिलाएं ही विधायक पद तक पहुंच सकीं। वर्तमान 16वीं विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 21 (10.5%) है।
सक्रियता के बावजूद राजनीतिक दलों के भीतर भी महिलाओं के लिए शीर्ष पदों के रास्ते संकरे हैं। भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी में जहां 14% महिलाएं हैं। वहीं, कांग्रेस में यह आंकड़ा 17.5% के करीब है। प्रदेश की सियासत में 'जिताऊ' उम्मीदवार की तलाश अक्सर महिलाओं के टिकट पर भारी पड़ती है।
राज्य के गठन के 51 साल बाद राजस्थान को पहली महिला मुख्यमंत्री और 52 साल बाद पहली महिला विधानसभा अध्यक्ष मिलीं। उच्च शिक्षा में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है। अब हर 100 छात्रों पर 127 छात्राएं हैं। स्थानीय निकायों में आरक्षण के चलते नेतृत्व की स्थिति कुछ बेहतर हुई है।
वर्तमान सोलहवीं विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 21 है, जो कुल 200 सीटों का 10.5 प्रतिशत है। इनमें 8 महिलाएं पहली बार निर्वाचित हुई है, जबकि 12 पहले भी विधायक रह चुकी है।
एक महिला ने उपचुनाव में जीत दर्ज की। जबकि वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं ने जागरूकता दिखाते हुए पुरुषों से 0.19 प्रतिशत अधिक मतदान किया था। इसके बावजूद महिला विधायकों की संख्या वर्ष 2013 के 28 से घटकर 2018 में 24 रह गई और 2023 के चुनाव में यह घटकर 21 पर सिमट गई।
सोलहवीं विधानसभा में 21 महिला विधायकों में से 8 पहली बार चुनी गई हैं, जबकि शेष 12 पुनः निर्वाचित हुई हैं। भाजपा की वसुन्धरा राजे 6 बार, अनिता भदेल 5 बार तथा सिद्धि कुमारी 4 बार विधायक चुनी जा चुकी हैं। कांग्रेस की रीटा चौधरी और शोभारानी कुशवाह 3-3 बार निर्वाचित हुई हैं।
दूसरी बार जीतने वाली महिलाओं में भाजपा की कल्पना देवी, दीया कुमारी, दीप्ति किरण माहेश्वरी, मंजु बाघमार, शोभा चौहान और कांग्रेस की रमिला खड़िया शामिल हैं। इस चुनाव में 50 महिलाओं ने भाग्य आजमाया, जिनमें से 20 को सफलता मिली, जबकि एक महिला ने उपचुनाव में जीत दर्ज की।
प्रदेश में 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कोई महिला निर्वाचित नहीं हुई थी, लेकिन बाद में हुए उपचुनाव में दो महिलाएं विधायक बनीं। इनमें कांग्रेस की कमला बेनीवाल और प्रजा समाज पार्टी की यशोदा देवी शामिल थीं। कमला बेनीवाल कुल 7 बार विधायक रहीं और अंतिम बार 11वीं विधानसभा में चुनी गईं।
वहीं, यशोदा देवी ने मध्यप्रदेश में शराबबंदी आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसमें राजस्थान के हजारों भील शामिल हुए। उन्होंने 1951 में लगानबंदी के खिलाफ भी आंदोलन किया।
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राजस्थान से महिलाओं की भागीदारी समय के साथ बढ़ी तो है, लेकिन जीत का आंकड़ा सीमित ही रहा। वर्ष 1952 में विधानसभा चुनाव में केवल 2 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था, लेकिन जीत नहीं मिली।
वर्ष 1991 और 1996 के चुनावों में चार-चार महिला प्रत्याशी जीत दर्ज कर संसद पहुंचीं। यह आंकड़ा अब तक का सर्वाधिक है। हालांकि, बाद में यह आंकडा कम होता गया। वहीं 2024 में प्रदेश की 19 में से तीन महिलाएं ही लोकसभा पहुंच सकीं।
राज्य में अब तक चुनी गई महिला विधायकों में 43 ऐसी हैं, जो 2 से 9 बार तक निर्वाचित हुईं। इनमें सुमित्रा सिंह सर्वाधिक 9 बार और कमला बेनीवाल 7 बार विधायक रहीं। इसके अलावा 2 महिलाएं 6 बार, 3 महिलाएं 5 बार, 7 महिलाएं 4 बार, 7 महिलाएं 3 बार और 22 महिलाएं 2 बार विधायक चुनी गईं।
नगरीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी मजबूत हो रही है। वर्ष 2019 के बाद 196 शहरों में हुए चुनावों में 81 महिला पार्षद महापौर और चेयरपर्सन बनीं। लंबे समय से करीब एक तिहाई भागीदारी के चलते महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिल रहा है।
राजधानी जयपुर में भी अब तक 6 महिला महापौर बन चुकी हैं। वहीं, जोधपुर में 4, कोटा और अजमेर में 3-3 महिलाओं को महापौर व सभापति की जिम्मेदारी मिली, जो शहरी राजनीति में महिलाओं की बढ़ती सक्रियता और सशक्त उपस्थिति को दर्शाता है।
Updated on:
17 Apr 2026 10:29 am
Published on:
17 Apr 2026 10:26 am
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