यह वक्त चला जाएगा, लेकिन हमें जाति, धर्म, नस्लभेद से ऊपर उठकर इंसानियत का पाठ पढ़ा जाएगा। राजस्थान में होली के रंग भी नहीं भीगे, लेकिन ये रंग हमारे दिलों में उतरे हैं, इसलिए ये रंग फिर खिलेंगे, फिर राजस्थानी बीनणी बोरला माथे पे पहन नाचेगी, फिर काका पचरंगी पाग पहने गाएंगे, फिर बालाओं के हाथ मेहंदी रचेगी, फिर रसोई से पूए-पापड़ी की खुशबू महकेगी, फिर ऊंट झालर-झूमर पहनकर सजेंगे और फिर कोई लंगा मांगणियार की जैसलमेर के मरुस्थल से मीठी हरहराती आवाज आएगी और हम सुन लेंगे... थोड़ा रुक कर ही सही, हम दोहराएंगे, पधारो म्हारो देस...।