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Rajasthan: 3 जगहों के बदले गए नाम, राजस्थान की सियासत में नया मोड़, जानें क्यों ऐन वक्त पर लिया गया अहम फैसला

राजस्थान में माउंट आबू का नाम आबू राज, जहाजपुर का ‘यज्ञपुर’ और कामां का ‘कामवन’ करने का फैसला हुआ। साथ ही पूर्ववर्ती योजनाओं के नाम भी बदले गए। सरकार इसे सांस्कृतिक पुनरुत्थान बता रही, जबकि विपक्ष इसे प्रतीकात्मक राजनीति कह रहा है।

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जयपुर

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Arvind Rao

Mar 01, 2026

Rajasthan Renames Mount Abu Jahazpur and Kaman Sparks Political Row Over Cultural Agenda

सीएम भजनलाल शर्मा और पीएम नरेंद्र मोदी (फोटो- पत्रिका)

Rajasthan Politics: राजस्थान की राजनीति में इन दिनों नाम को लेकर घमासान मचा है। सीएम भजनलाल शर्मा की सरकार ने प्रदेश के कई प्रसिद्ध शहरों, स्थानों और पिछली सरकार की जनहितकारी योजनाओं के नाम बदलने का बड़ा फैसला लिया है।

माउंट आबू अब 'आबू राज' कहलाएगा, जहाजपुर का नाम 'यज्ञपुर' होगा तो वहीं कामां को अब कामवन नाम से जाना जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ नाम बदलने से प्रदेश की तस्वीर बदल जाएगी? या फिर इसके पीछे कोई गहरा सियासी गणित छिपा है? आइए समझते हैं इस 'नामकरण' पॉलिटिक्स के असली मायने।

बताते चलें कि अजमेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेगा रैली के ठीक बाद भजनलाल सरकार का नाम बदलने का यह फैसला महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी 'चुनावी स्ट्राइक' माना जा रहा है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि पीएम की रैली से बने माहौल को भुनाने के लिए ऐन वक्त पर 'माउंट आबू' को 'आबू राज' और 'जहाजपुर' को 'यज्ञपुर' करने का दांव खेला गया है।

जानकारों के मुताबिक, बीजेपी इस कदम के जरिए अपने कोर वोट बैंक को 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का कड़ा संदेश देना चाहती है। पीएम मोदी के 'विरासत भी, विकास भी' के नारे को धरातल पर उतारते हुए सरकार ने प्रतीकों की राजनीति को धार दी है, ताकि आने वाले चुनावों में इसका सीधा सियासी फायदा उठाया जा सके।

आबू राज से कामवन तक

राजस्थान विधानसभा में हाल ही में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने बताया कि स्थानीय मांग और ऐतिहासिक संदर्भों को देखते हुए तीन प्रमुख स्थानों के नाम बदले जा रहे हैं। माउंट आबू- अब इसे 'आबू राज' के नाम से जाना जाएगा। जहाजपुर- इसका प्राचीन नाम 'यज्ञपुर' बहाल किया जाएगा और कामां- यह अब 'कामवन' कहलाएगा।

सरकार का तर्क है कि ये नाम थोपे नहीं जा रहे, बल्कि राजस्थान की गौरवशाली संस्कृति और इतिहास को पुनर्जीवित करने का एक प्रयास है। भाजपा का मानना है कि औपनिवेशिक या मुगलकालीन नामों के बजाय भारतीयता से जुड़े नाम जनता में स्वाभिमान जगाते हैं।

योजनाओं का बदला स्वरूप

सत्ता संभालते ही भजनलाल सरकार ने सबसे पहले गहलोत सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं के नाम पर कैंची चलाई। राजनीतिक गलियारों में इसे डी-ब्रांडिंग कहा जा रहा है। इंदिरा रसोई योजना (श्री अन्नपूर्णा रसोई योजना), चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना (मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना), राजीव गांधी शैक्षणिक उत्कृष्टता छात्रवृत्ति (मुख्यमंत्री उत्कृष्टता छात्रवृत्ति योजना) और राजीव गांधी खेल प्रतियोगिता (मुख्यमंत्री ग्रामीण एवं शहरी खेल प्रतियोगिता)। इन बदलावों के जरिए सरकार यह संदेश देना चाहती है कि योजनाएं किसी परिवार विशेष (गांधी परिवार) के नाम पर नहीं, बल्कि पद या सांस्कृतिक प्रतीकों के नाम पर होनी चाहिए।

जयपुर की सड़कों पर भी बदली पहचान

गुलाबी नगरी जयपुर में भी बदलाव की बयार तेज है। गहलोत सरकार ने राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' की याद में जयपुर में 'भारत जोड़ो उच्च स्तरीय सेतु' बनवाया था, जिसे अब सरकार ने बदलकर 'सरदार वल्लभभाई पटेल' के नाम पर कर दिया है।

इसी तरह सेंट्रल पार्क और टोंक रोड को पूर्व उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत की स्मृति से जोड़ने का निर्णय लिया गया है। इसे भाजपा की कोर विचारधारा और संघ के नायकों को सम्मान देने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

सियासत का 'सिक्सर' या सिर्फ 'प्रतीकात्मक' खेल?

कांग्रेस इस मुद्दे पर हमलावर है। पार्टी का कहना है कि सरकार धरातल पर काम करने के बजाय केवल नाम बदलकर लोगों को गुमराह कर रही है। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब सरकारें बुनियादी मुद्दों (बेरोजगारी, महंगाई) पर घिरती हैं, तो अक्सर 'प्रतीकों की राजनीति' का सहारा लिया जाता है ताकि जनता का ध्यान बंटा रहे।

आमजन का नजरिया

नाम बदलना भाजपा की मूल राजनीति का हिस्सा है। इससे पार्टी के हिंदूवादी आधार और पारंपरिक वोट बैंक को मजबूती मिलती है। आलोचकों का तर्क है कि नाम बदलने की प्रक्रिया में सरकारी दस्तावेजों, बोर्डों और मुहरों को बदलने में करोड़ों का सरकारी पैसा खर्च होता है, जिसका जनता को कोई सीधा लाभ नहीं मिलता। विशेषज्ञ मानते हैं कि नाम बदलने से इतिहास दुरुस्त नहीं होता, बल्कि काम की गुणवत्ता से फर्क पड़ता है।

क्या बदलेगा वोट बैंक का समीकरण?

राजस्थान में नाम बदलने की यह सियासत कोई नई नहीं है, लेकिन इस बार इसका दायरा काफी बड़ा है। बीजेपी इसे 'सांस्कृतिक पुनरुत्थान' कह रही है, तो विपक्ष इसे 'बदले की राजनीति'।

अंततः, जनता के लिए यह मायने रखता है कि अस्पताल में इलाज और रसोई में सस्ता खाना मिल रहा है या नहीं। क्या 'यज्ञपुर' और 'आबू राज' जैसे नाम पर्यटन या स्थानीय विकास में कोई क्रांतिकारी बदलाव ला पाएंगे? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।