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जब पीएम मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की तारीफ कर कही थी ये बड़ी बात

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pm modi on atal bihari vajpayee

जयपुर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने परमाणु परीक्षण को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की प्रशंसा की थी। पीएम मोदी ने कहा था कि पोखरण परमाणु परीक्षण के लिए अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व वैज्ञानिक डॉ अब्दुल कलाम आजाद काे हमेशा याद किया जाएगा।

नरेंद्र मोदी डॉट इन वेबसाइट पर एक लेख में पीएम मोदी का पहले दिया गया एक भाषण है, जिसमें उन्होंने कहा था, दुनिया पोखरण परीक्षण के बारे में अच्छी तरह जानती है। अटल जी के नेतृत्व में सफलतापूर्वक परीक्षण किए गए और पूरे विश्व ने भारत की ताकत को देखा।

बिना डरे परीक्षण को सफल बनाया

देश के वैज्ञानिकों ने हमें गौरव के क्षण दिए। पीएम मोदी ने परमाणु परीक्षण को याद करते हुए कहा कि इस परीक्षण को लेकर दुनिया ने हम पर प्रतिबंध भी लगाए। लेकिन साल 1998 में अटल जी ने सफलतापूर्वक परीक्षण कर अपनी साहस को दिखा दिया। साथ ही कहा कि अगर कोई कमजोर पीएम होता या होती तो वह पीछे हट गए होते, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने बिना डरे परीक्षण को सफल बनाया

सेव की पेटियों में छिपाए थे परमाणु बम
पूर्व राष्ट्रपति कलाम ने 2005 में जयपुर के करीब 600 स्कूली बच्चों के साथ संवाद के दौरान कहा था कि रेत के धोरों में पूर्णिमा की रात मुझे अच्छी लगती है। मैं पूरे चांद वाली इस रात कुछ पल अकेले बिताना चाहता हूं...और मैं पोकरण को प्यार करता हूं क्योंकि यह कुछ करने और स्वच्छंदता का एक बेहतर मंच है।

कलाम की इस बात में एक गहरा राज छिपा था। यह सभी जानते हैं कि कलाम ने भारत को परमाणु ताकत के रूप में प्रतिष्ष्ठापित करने में अहम भूमिका निभाई थी और दोनों की परमाणु परीक्षण पोकरण की धरती पर हुए थे, लेकिन पोकरण के प्रति कलाम का प्यार परमाणु अभियान से लगातार 24 वर्षो तक जुड़े रहने का नतीजा था।

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1974 के बाद जब 1998 में बुद्ध फिर 'मुस्कराए' तो ये कलाम का ही कमाल था कि 1995 में भारत की परमाणु परीक्षण तैयारियों को पकड़ लेने वाले अमरीकी उपग्रहों तक को भनक नहीं लग सकी। कलाम ने जैसे ही प्रधानमंत्री वाजपेयी को हॉटलाइन पर 'बुद्ध फिर मुस्कराए' का संदेश देकर लाइन काटी और इसकी आधिकारिक घोषणा हुई तो पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई।

कई बरसों से चल रही थी तैयारी
कलाम ने ही परमाणु दो की परिकल्पना को साकार किया था। हालांकि 1998 में हुए पांच परमाणु विस्फोटों की तैयारी कई बरसों से चल रही थी, लेकिन मई 1998 में जिस तरह से 'ऑपरेशन शक्ति' को अंजाम तक पहुंचाया गया, उसके कोड ने अल्फा, ब्रावो, चार्ली...आदि कलाम के अलावा किसी को पता नहीं थे।

ऑपरेशन शक्ति की शुरुआत सेव की पेटियां भारतीय वायुसेना के मालवाहन विमान एएन-32 में रखने के साथ हुई थी। एक मई को तड़के तीन बजे मुम्बई के सांताक्रुज हवाई अड्डे से जैसलमेर तक का हवाई सफर और जैसलमेर से पोकरण तक सेना के ट्रकों में सेव की पेटियों के साथ इस यात्रा की कमान मेजर जनरल नटराज (आर. चिदम्बरम) और 'मामाजी' (अनिल काकोडकर) के पास थी।

लेकिन जैसे ही ट्रकों का कारवां सेव की पेटियां लेकर खेतोलाई गांव में बनाए गए 'डीयर पार्क' (परीक्षण नियंत्रण कक्ष) के प्रार्थना हॉल तक पहुंचा, कमान मेजर जनरल पृथ्वी राज (कलाम) के हाथ आ गई। दरअसल, लकड़ी के बक्सों में सेव नहीं, बल्कि भाभा ऑटोमिक रिसर्च सेंटर में बनाए गए परमाणु बम थे, जिन्हें बड़ी गोपनीयता के साथ मुम्बई से पोकरण लाया गया था।

कुआें काे दिया गया अजीब नाम
परमाणु परीक्षण के लिए देह झुलसाने वाले गर्मी में महीनों से काम कर रहे कलाम ने सारा काम इस गोपनीयता से अंजाम दिया कि किसी को पता नहीं चल सका कि भारत इतना बड़ा धमाका करने वाला है। उन्होंने अल्फा कम्पनी की मदद से पांच गहरे कुए खुदवाए थे। इनके नाम भी अजीब थे।

इनमें से दो सौ मीटर गहरे जिस कुएं में हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया गया, उसे व्हाइट हाउस का नाम दिया गया था, जबति फिसन बम के कुए को ताजमहल और पहले सबकिलोटन बम वाले कुएं को कुम्भकर्ण का नाम दिया गया। बाकी दो कुए एनटी-1 व एनटी-2 दूसरे दिन किए गए परीक्षणों के लिए आरक्षित रखे गए थे।

फौजी बनकर घूमते थे
पूरे अभियान के दौरान कलाम व अन्य वैज्ञानिक न सिर्फ फौजी नाम से रहे, बल्कि उन्होंने पूरे अभियान के दौरान फौज की वर्दी ही पहने रखी। पोकरण के बस स्टैण्ड पर कई बार ये वैज्ञानिक फौज की गाडियों में घूमने आते थे, लेकिन इनकी हस्ती लोगों को भी तभी पता चली, जब दूसरे परमाणु परीक्षण की खबरें सामने आई। यूं तो भारत 1995 में ही परमाणु बम का परीक्षण करना चाहता था लेकिन अमरीका के जासूसी सैटेलाइट ने इस तैयारी को पहले ही पकड़ लिया और भारत को दुनिया के दबाव के सामने झुकना पड़ा।

1996 में जब पहली वाजपेयी सरकार बनी तो परमाणु परीक्षण का राजनीतिक निर्णय तो ले लिया गया लेकिन चुनौती थी अमरीकी सैटेलाइटों को मात देना। जिम्मा दिया गया एपीजे अब्दुल कलाम को। इस दौरान पहली वाजपेयी सरकार गिर गई। जब फिर से वाजपेयी की सरकार बनी तो डीआरडीओ प्रमुख कलाम और परमाणु ऊर्जा आयोग के चेयरमैन राजगोपाल चिंदमबरम को हरी झंड़ी दे दी।

मिसाइल मैन अब्दुल कलाम ने इस जिम्मेंवारी को बखूबी निभाया। अभियान को लेकर सतर्क ने अमरीकी सैटलाइट से बचने के लिए वह फौजी ट्रक में और फौज की वर्दी में ही पोकरण आते-जाते थे। 11 मई 1998 में एक के बाद एक पांच विस्फोट पोकरण में किए गए तो फिर दुनिया की आंखें फटी की फटी रह गई और आपेरशन शक्ति में एक नहीं पांच बार बुद्ध मुस्कुराए।